लेखक परिचय

आशीष कुमार ‘अंशु’

आशीष कुमार ‘अंशु’

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया हमपर किसी खुदा की इनायत नहीं रही, हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग रो-रो के बात कहने कि आदत नहीं रही।

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मीडिया चौपाल से लौटकर आशीष कुमार ‘अंशु’ 

जब भोपाल से मीडिया चौपाल का ई-मेल मिला था तो आम तौर पर किसी नए आयोजन को लेकर जैसे होता है, इस आयोजन को लेकर भी मन में कुछ सवाल थे और एक रूपरेखा थी। वैसे अनिल सौमित्रजी कार्यक्रम में शामिल होने वाले वर्चुअल मीडिया के नए रंगरूटों और नए से थोड़े पुराने सक्रिय स्वयंसेवकों से जिस प्रकार लगातार संपर्क में थे, उससे इतना तय था कि अपेक्षित लोगों के संख्या पक्ष को लेकर किसी प्रकार की कमी नहीं रहनी है। कार्यक्रम की रूपरेखा को लेकर जरूर थोड़ा संशय था कि एक दिवसीय भोपाल आयोजन में भोजन-बतकही-विश्राम के अलावा क्या रहना है? कार्यक्रम की संरचना को लेकर अपने तरह का इसे पहला आयोजना कहना, थोड़ा स्‍टीरियो टाइप हो जाएगा लेकिन टीवी और अखबारी पत्रकारिता की दुनिया से बाहर जो एक वर्चुअल स्पेस/ आभासी दुनिया की दुनिया की पत्रकारिता है, उनकी आपसी मुलाकात किसी ब्लॉगर मीट के नाम पर होती थी या फिर पोर्टल मॉडरेटर्स की मीटिंग में। लेकिन भोपाल की चौपाल में विभिन्न विधाओं में इंटरनेट पर सक्रिय लोगों को आमंत्रित किया गया। इसलिए सोचने और विचारने की विविधता स्पष्ट नजर आई। जो समय समय पर एक दूसरे मित्रों से असहमति के रूप चौपाल की कार्यवाई में दर्ज भी हुई। यह अच्छा ही हुआ कि मौजूद लोगों में से कइयों ने अपने अखबार और चौनल के परिचय की जगह अपना ब्लॉग-वेबसाइट वाला परिचय देना बेहतर समझा।

जिन लोगों को भोपाल चौपाल में बुलाया गया था, उनकी चयन की प्रक्रिया पर कोई बात हो, उससे पहले ही आयोजकों की तरफ से स्पष्टीकरण आ गया- इस आयोजन में बहुत से लोग और शामिल हो सकते थे, ऐसा हमें भी लगता है लेकिन हमारे पास संसाधन सीमित हैं। इस स्पष्टीकरण के साथ उनकी तरफ से यह आश्वासन जरूर आया कि आने वाले समय में हर एक नए चौपाल के साथ, पुराने मित्रों के साथ-साथ कुछ नए मित्र जुड़ते जाएंगे।

गिरीश पंकज, संजय बेंगाणी, रवि रतलामी, सुरेश चिपलूनकर, आवेश तिवारी, अनुराग अन्वेषी, अनिल पांडेय, संजीव सिन्हा, चंडीदत शुक्ल, पंकज झा, जयराम विप्लव, रविशंकर, आशुतोष और भी कई नाम, सभी इंटरनेट पर सक्रिय।

भोपाल चौपाल में बातचीत के लिए देश भर से लगभग सौ लोगों का जुटान रविवार, 12 अगस्त को भोपाल के विज्ञान भवन में हो चुका था। पहला सत्र शुरू होने से पहले ही मित्रों की चर्चा में यह चुटकी भी शामिल थी, चर्चा में आए सौ-जन, अनिल सौमित्र के सौ-मित्र हैं। यह बात चर्चा के दौरान एक दो वक्ताओं ने भी अपने-अपने तरिके से दोहराई।

इस चौपाल में दिल्ली, मुम्बई, इंदौर, उज्जैन, रायपुर, अहमदाबाद, कन्याकुमारी और लन्दन तक से प्रतिभागी अपनी कुछ बात कहने और दूसरों की बातें सुनने आए थे। यहा थोड़ी चुक आयोजकों की तरफ से हुई, उज्जैन से आए एक पुराने ब्लॉगर और इन दिनों फेसबुक पर सक्रिय एक सज्जन को लोग सुनना चाहते थे लेकिन पुरे दिन के आयोजन में उन्हें एक शब्द बोलने का मौका नहीं मिला। आमतौर पर इस तरह के आयोजन में एक औपचारिक परिचय सत्र होता है, जिसमें सभी प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का थोड़ा मौका मिल ही जाता है।

चौपाल को लेकर इस बात की आशंका थी कि यहा शिक्षकों के हाथों जब सत्र का संचालन होगा तो वे इस अवसर का लाभ लेते हुए, वे पत्रकारिता के सिद्धान्त ना समझाने लगे। प्रकार, सावधानी, निदान की चर्चा ना करने लगे। यह हुआ भी, पत्रकारिता के प्रकार बताए गए, यह भी बताया गया कि किस प्रकार ब्लॉग, वेवसाइट, टूयूटर, फेसबुक अनर्गल बातचीत का अड्डा बनता जा रहा है। यह माध्यम कैसे बेलगाम हो गया है। अच्छी बात यह रही कि उसके बाद चर्चा को अनौपचारिक बातचीत और बहस के लिए खोला गया। खुली चर्चा से जो बातें निकल कर आई, वह पूरे दिन की उपलब्धि ही कही जाएगी। इसी दौरान कई सारी योजनाओं पर चर्चा हुई। वेवसाइट और ब्लॉग अपने लिए रिवेन्यू मॉडल कैसे विकसित करें, इसे विचार बिन्दूओं में शामिल किया गया। गूगल द्वारा भारतीय भाषाओं के साथ किए जाने वाले भेदभाव को लेकर एक पत्र चौपाल की तरफ से गूगल प्रबंधन को लिखने की बात तय हुई। भड़ास फॉर मीडिया के यशवंत सिंह और उन जैसे दूसरे पीडि़त पोर्टल मालिकों के मामले में चौपाल की तरफ से एक निन्दा प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हुआ।

कुल मिलाकर भोपाल का मीडिया चौपाल अपनी कुछ कमियों और इतने सारे श्रेष्ठ जनों को एक मंच पर लाने के सार्थक प्रयास के साथ पूरा हुआ।

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