लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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वाल्मीकि रामायण में भगवान राम से कहलवाया गया है..अपि स्वर्णमयी लंका, न में लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी…यानी हे लक्ष्मण, लंका भले ही सोने की है लेकिन मुझे बिलकुल पसंद नहीं क्‍योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है. ऐसे ही अपने जन्मभूमि से लौट कर सतीश सिंह जी द्वारा वर्णित वाकया पढ़ कर इस लिक्खर को भी अपने बिहार की याद आ गयी. अपने हाल की बिहार के सालना “हज” के दौरान ऐसे ही मिले-जुले वाकये से अपना साबका भी हुआ. विभाग चाहे केंद्र का हो या राज्य का अंततः बिहार में होने पर सब बिहारी ही हो जाता है. भाई को दरभंगा से पटना जाकर दिल्ली के लिए ट्रेन पकडनी थी, ऐन मौके पर पता चला कि मुजफ्फरपुर से आगे बस नहीं जा पा रही है. फिर पता चला के दरभंगा से पटना की ओर जाने वाली गरीब रथ आज लेट है सो वहाँ कोशिश की जा सकती है. ट्रेन मिली भी इस ट्रेन में अग्रिम आरक्षण कराने पर ही बैठना संभव हो पाटा है सो डब्बे में टीटी महोदय को अपनी समस्या बता कर एवं उनकी अनुमति लेकर साधारण टिकट के साथ उनको बैठा दिया गया. कुछ देर के बाद ही भाई का फोन आता है कि टीटी ने बिना कोई रसीद दिए उतार देने की धमकी देकर उनसे २५० रुपया की वसूली कर ली.

अब आप जैसा कि सतीश जी ने लिखा है..अगर आप संगठित हो तो क्युकर ऐसे ट्रेन को रोक ना लिया जाय और टीटी से जुर्माना सहित अपनी राशि वापस पायी जाय? समस्या सबसे बड़ी केवल नौकरशाही की है. और बिहार भी इससे ज्यादे ही ग्रस्त दिखाई दे रहा है. निश्चित ही नीतिश कुमार बिहार के लिए काफी कुछ कर रहे हैं. सही ही बिहार को देश में आज सबसे तेज़ी से रफ़्तार पकडती अर्थव्यवस्था घोषित किया गया है. ज़मीन पर आपको विकास की किरनों को देखने का अवसर भी मिलेगा. लेकिन पिछले पन्द्रह बरस के लालू दम्पात्ति राज और उससे पहले के कांग्रेस राज द्वारा नष्ट-भ्रष्ट कर दी गयी व्यवस्था में रातों-रात आप कितने परिवर्तन की उम्मीद कर लेंगे? लेकिन सबसे बड़ी बात ये कि वास्तव में जैसा उस वर्णन में भी कहा गया है, हालत को सुधारने बिहारियों को ही आगे आना पड़ेगा. पर यक्ष प्रश्न तो यह है कि आखिर वो आगे आयें कैसे. पिछले पचास वर्षों के अराजकता से निराश हो कर देश और दुनिया के कोने-कोने में जा अपनी रोजी-रोटी ढूंढ लेने वाले अनिवासियों से क्या हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वो अपना सब कुछ समेट कर वापस बिहार आ जाए. उस बिहार में जहां की जातिवादी रंगदारी, लूट और गुंडागर्दी से आहत हो कर उन लोगों को अपना बोरिया बिस्तर ले कर किसी अनजाने ठिकाने पर चला जाना पड़ा था. या उस बिहार में जहां पर लालू के पुनः पदारूढ़ होने की आशंका से फिर भी काँप रहे हैं लोग. निश्चित ही अपनी माटी अपने लोगों से भावनात्मक प्यार रखने वाले लोगों को भी ऐसा कोई फैसला लेना आत्महत्या के सामान ही लगेगा. तो आखिर विकल्प क्या है. शायद वही जो इस लेखक ने वहाँ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी जकर रहे छात्रों से की.

लेखक के एक मित्र जिन्होनें अपने जिंदगी का कीमती दस वर्ष इन प्रतियोगिताओं को देकर भी वे पूर्णतः सफल नहीं हो पाए वो मधुबनी में इसकी तैयारी के कोचिंग चला रहे हैं. वहाँ प्रतिस्पर्द्धियों की काफी संख्या है. वही कक्षा में दो सत्र में कुछ देर छात्रों के साथ बिताने का मौका मिला. जो निवेदन वहाँ के छात्रों से था वही यहाँ भी कहना चाहूँगा कि “पलायन” बिहारियों का एक मात्र विकल्प है. जैसा कि किसी शायर ने कहा है…”सूरज की मानिंद सफर पर रोज निकालना पड़ता है. बैठे-बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना.” निश्चित रूप से देश के कोने-कोने में (और विदेशों में भी) जाय. जाकर अपने मिहनत एवं प्रतिभा का डंका भी बजाएं. लेकिन मन में ये भावना अवश्य रहे कि बिहार का हर व्यक्ति अपने अपने राज्य का राजदूत रहे. उनकी कोशिश ये रहना चाहिए कि जिस तरह उनकी प्रतिभा का देश लोहा मानता है वैसे ही उनकी अच्छाइयों, भलमनसाहत का भी नाद हो. दुर्भाग्य से कुछ तो मित्रों की कृपा और कुछ हम लोगों की कारस्तानी काफी नकारात्मक छवि निर्मित हुई है. खैर..भविष्य को तलाश करने वाली आज की पीढ़ी निश्चित ही भाग्यशाली है इस मामले में कि फिलहाल उसको एक सौम्य नेतृत्व मिला है. साथ ही इस मामले में भी कि आज लाखों की संख्या में अवसर छात्रों के पास है. जिस शिक्षक से वे कोग पढ़ रहे हैं उस पीढ़ी को लड़ना पड़ता थ रेल के १०० पोस्ट तो बैंक क्लर्क के २०० पोस्ट के विरुद्ध. वो पीढ़ी इतना भाग्यशाली नहीं थी, लेकिन आज एक-एक संस्थान २०-२० हज़ार की संख्या में वेकेंसी निकाल रहे हैं. फिर राज्य में भी अवसरों में वृद्धि हुई है. बहरहाल….उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार विकास के रफ़्तार पर जिस सरपर तरीके से दौर रहा है नयी पीढ़ी उस रफ़्तार में और वृद्धि कर बिहार को अपना पुराना गौरव वापस दिलाने में मददगार होंगे..चाहे वो जहां भी निवासरत हो. इस मायने में ही लोगों को आगे आने की ज़रूरत है.

-पंकज झा

7 Responses to “बिहार: जो घर जारे आपने चले हमारे साथ”

  1. nikash parmar

    अपनी धरती के प्रति आपका सहज प्रेम दिल को छूने वाला है. बिहार की छवि आप जैसी सोच रखने वालों के कारण बदलेगी. इसके लिए शुभकामनायें. वैसे इस सोच की ज़रुरत छत्तीसगढ़ को भी है. यहाँ भी भ्रष्टाचार और हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं.
    मेरा बिहार के कुछ लोगों से परिचय है. मैं उनके जुझारूपन से बहुत प्रभावित हूँ. मुझे लगता है छत्तीसगढ़ की नयी पीढ़ी को यह गुण सीखना चाहिए.

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  2. Ranjana

    पिछले महीने आकस्मिक रूप से दिल्ली से कोलकाता जाना हुआ और सफ़र से कुछ ही घंटे पहले टिकट कराया तो एकमात्र विकल्प रूप में पूर्वा एक्सप्रेस के द्वितीय ए सी श्रेणी में तत्काल में टिकट मिला…नियत समय पर ट्रेन चली..परन्तु अगले दिन भोर में जैसे ही ट्रेन ने बिहार सीमा में प्रवेश किया, सबसे पहले तो इसमें आरक्षण जैसी कोई बात न रह गयी..पूरा डब्बा ही बेटिकट यात्रियों से भर गया और फिर पैसेंजर ट्रेन से भी बदतर स्थिति इसकी हो गयी.बिहार सीमा में रहते भर में ट्रेन सात घंटे लेट हो गयी….जाकर टी टी बाबू को खोज कर निकाल जब इन यात्रियों की शिकायत की तो उन्होंने उल्टा मुझे ही शांत रहने का आश्वासन दे दिया और कहा ये कुछ ही देर में उतर जायेंगे,यदि इन्होने किसी प्रकार की असुविधा की तो मैं उनसे कहूँ फिर वो उचित कार्यवाई करेंगे…
    इधर बेटिकट सज्जन गण पूर्ण मनोयोग से बिहार तथा देश की राजनीति पर चर्चा परिचर्चा चलाये हुए थे…बहुत देर तक उनकी बातें सुनने के बाद मुझसे न रहा गया तो मैंने उनसे कहा कि बिहार का कुछ इसलिए नहीं होने वाला है क्योंकि यहाँ का प्रत्येक नागरिक राजनीति तथा अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक तो है,परन्तु अपने कर्तब्यों के प्रति उतना ही उदासीन है..बड़ी बड़ी बातें करना और बात है,परन्तु रोजमर्रा के कार्य व्यवहारों में निष्ठा तथा इमानदारी बरतना और बात है…भ्रष्ट राजा के शाशनकाल में भ्रष्टाचार इतने अन्दर तक आमजनों के प्रवृत्तियों में शामिल हो गयी है कि इतना सरल नहीं किसी भी सुशासक के लिए उसे हंसी हंसी में कुछ वर्षों में तंत्र से निकाल फेंकना…आखिर तंत्र भी तो मनुष्य ही न चलाता है…

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    पंकज जी बहुत धन्यवाद। बाहर रहते हुए, और बिहारसेहि क्यों, सारे भारतके हर प्रदेशसे समान प्रेम, रखते हुए, मै निम्न विधान करता हूं। बिहारकी समस्या अकेले बिहारकीहि,नहीं मानी जानी चाहिए।
    भ्रष्टाचार जब एक परंपरा बन जाती है, तो नदीके प्रवाहके समान एक संवेग या गतिमानता (Momentum) प्राप्त कर लेती है। उसे छुटपुट, और इक्के दुक्के उदाहरणोंसे रोका नहीं जा सकता। व्यक्तिको आत्म संतोष शायद प्राप्त हो, कि उसने कोई अन्याय नहीं किया। फिर भी रिश्वत लेनेवाला, देनेवालेसे कई गुना, अधिक अपराधी है।
    इसका हल, सामुहिक रीतिसे सोचा जाए। प्रदुषण की तरह भ्रष्टाचारभी (१) एक (व्यक्ति, या विभागसे) बिंदुसे प्रसारित (२) किसी कामके लिए, शासन या शासनका कर्मचारी(रिश्वतकी अपेक्षासे) विलंब करते हुए, तंग करे, ऐसा। (३) प्रदेश में फैला हुआ, जैसे हर व्यापारी उंचे भावसे वस्तुओंके दाम मांगे, ऐसा।
    नम्रतासे कहूंगा, कि नरेंद्र मोदीके गुजरातके उदाहरणोंसे बिहारका शासनभी सीख ले सकता है। उनसे स्पष्ट पूछा जाए, कि गुजरातने क्या किया?
    और एक अति महत्वपूर्ण विशेष सुझाव:—–>(अ) एक चिंतकोंका, जो समाजमें घुल मिलकर रहते है, समस्याओंसे अवगत है, और साथमे देश भक्त भी है, कोरे विद्वान नहीं है; ऐसे लोगोंकि एक परिषद बैठे।(आ) सामुहिक हलपर कृतिवाले विचार (केवल भ्रष्टाचार का पुराण नहीं) रखें।(इ) फिर, एक दिन (जैसे १ जनवरी २०१२) सुनिश्चित किया जाए। जिसका प्रचार सारे भारतमे, (केवल बिहारमें नहीं) वृत्तपत्रों द्वारा बडे बडे विज्ञापन और ढोलताशे, सहित किया जाए।(ई) हर शासकीय और अन्य, विभागके छोटेसे बडे कर्मचारी से, लेखित हस्ताक्षर सहित एक वचन पत्र, लिया जाए।(उ) और उस दिनके बाद घोषित रूपसे भ्रष्टाचारीके साथ कडी से कडी कार्यवाही की जाए।(ऊ) सामुहिक धरने/घेरे भ्रष्टाचारी अफसरोंके सामने बैठे।
    अंतमें, भारतका सूर्य उगने जा रहा है, पर ७७% जनता जब गरीबी रेखाके नीचे जी रही है, तो भारतके G N P या अन्य सूचकांकोका कोई अर्थ नहीं है। इस बिंदुपर गहनसे गहन, मुक्त चिंतन, लेखन. आंदोलन चलाया जाए । पर अंतमें “ठोस कार्यवाही” (Action oriented approach) हि हमारे भविष्यका और सर्वांगिण उन्नतिका रास्ता है।
    और यदि यह नहीं बन पाता, तो भारतका सूरज चमकानेका भी कोई अर्थ नहीं।आप कितना भी प्रयास कर ले, भ्रष्टाचारकी दीमक उसे चाट जाएगी।गुजरातसे कुछ पाठ अवश्य सीखे जाए। चाहे आप मोदीके विरोधी भी हो, पर देशके तो हितैषि हि हो, ना?

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  4. आर. सिंह

    R.Singh

    1.Bahut saal pahle ki baat yaad aati hai.Us samay Patna Ranchi ke beech ek Express train chalti thee.Usme bahut bhid rahti thee .Rail Bibhaag se approach kiya gayaa to pataa chalaa ki Railway ke record ke anusaar jo ki ticketon ki bikri par aadhaarit hota hai,wah train hamesha khaali jaati thee. Aab to khair do trains ho gayee hai,par pata nahi aaj bhi kitne log usme ticket lekar sawar hote hain.
    2.Pichhle dino Rajio Chowk Metro station par ek hadsaa huaa jsme train ke beech mein phans kar ek aurat ke dono aur ek mard ke ek pair kat gaye. Kaarn kewal ye tha ki mard pichhe se line tod kar aurat ko dhkaa mraarte hue tarain par chadhne ki koshish kar raha thaa. Wah mard yani yuvak Bihar se pehli baar Delhi aayaa thaa.

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  5. gautam chaudhary

    hom to aysa mante ha ki bihar ke sath kewal agarego ne anay nahi kiya aajadi ke bad bihar ke sath ghor anay kiya gaya ha. vajpeyi ji ke samay se bihar me vikas par log lamband hone lage ha. bihariyo ko es bat par bhi gambhirta se vichar karna chahiye ki bihar ke janpad vistrit bharat ka kendra raha ha. mithala, magadh, vayshali ko jagane ke liye bihariyo ko uprashtriy manovriti apni hogi.

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  6. Divya

    …”सूरज की मानिंद सफर पर रोज निकालना पड़ता है. बैठे-बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना.” …..

    Lets hope for the best.

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  7. Rajesh Kumar

    रेस्वत बिहार के लिए कोई नयी बात नहीं, यह बहुत पुराणी है . नितीश सर्कार ने विगिलांस लाकर इसक दर badha दिया है. येस जर से ख़तम करने के लिए नोकरसही परिवरत करना होगा.

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