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    Homeराजनीतिपूर्व अनुमानों में भाजपा को बढ़त

    पूर्व अनुमानों में भाजपा को बढ़त

    प्रमोद भार्गव
    पांच राज्यों में पूर्ण हुए मतदान के बाद समाचार चैनलों ने एग्जिट पोल यानी निकटता के करीब पहुंचने वाले नतीजों ने भाजपा की तीन राज्यों में और आप की पंजाब में जीत निश्चित कर दी है, वही कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। उत्तर-प्रदेश तीन दशक पुरानी राजनीतिक परंपरा को तोड़ता दिखाई दे रहा है। यहां दूसरी बार बंपर बहुमत से भाजपा सत्ता में वापसी कर रही है। वहीं पंजाब में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस व अन्य दलों की उम्मीदों पर झाडू फेरते हुए आम आदमी पार्टी सत्ता के सिंहासन पर सवार होती दिख रही है। ऐसा होता है तो आप भविष्य में तेजी से अन्य राज्यों में वर्चस्व जमाती दिखेगी, जिसका नुकसान कांग्रेस को होगा। उत्तराखं डमें भाजपा और कांग्रेस में बराबरी के मुकाबले का अंदाज है। अंततः भाजपा फिर से सरकार बना लेगी। मणिपुर में पूर्ण बहुमत से भाजपा की जीत लगभग तय है। दरअसल केंद्र में जब से नरेंद्र मोदी की सरकार है, तब से अलग-थलग पड़े पूर्वोत्तर का शेष भारत में विकास के साथ-साथ तेजी से समावेशन हो रहा है। नतीजतन पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में भाजपा प्रभावशील होती जा रही है। गोवा में त्रिशंकु नतीजे आने का अनुमान है, ऐसे में भाजपा जोड़-तोड़ करके सरकार बनाने में सफल हो सकती है।
    इन चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण उत्तर-प्रदेश है। क्योंकि यहीं से दिल्ली पर सत्तारूढ़ होने का रास्ता निकलता है। इसलिए मतदान के पहले अंतिम दो दिन नरेंद्र मोदी को वाराणसी में डेरा डालना पड़ा था। यह राज्य आबादी में सबसे बड़ा राज्य होने के साथ अस्सी लोकसभा सदस्य भी देता है। बीते दिनों इस राज्य में लंबे समय तक चले किसान आंदोलन ने कुछ ऐसे हालात पैदा कर दिए थे, जिससे यह लग रहा था कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कुर्सी डावांडोल है। पंजाब व हरियाणा में चले किसान आंदोलन का भी इस राज्य के मतदाताओं पर असर दिखाई दे रहा है। लेकिन लगभग सभी चैनलों एवं सर्वेक्षण एजेंसियों ने भाजपा को 250 सीटें दी हैं। कुछ प्रतिष्ठित चैनलों ने 326 तक सीटें भाजपा की झोली में डाली है। फिलहाल भाजपा जीत दोहराती है, तो यह इतिहास रचने जैसी बात होगी, क्योंकि यहां करीब तीन दशकों से किसी भी सत्तारूढ़ दल की वापसी नहीं हुई है। भाजपा को इतनी सीटें मिलने का अनुमान इसलिए भी थोड़ा आश्चर्यजनक लगता है, क्योंकि 2017 की तुलना में सभी सातों चरणों में मतदान का प्रतिषत कम रहा है। मतदान का कम होना अकसर सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध माना जाता है। अतएव भाजपा लौटती है तो साफ है, किसानों में जाट, सिख रहे हों यादव, उन्होंने अखिलेष यादव और प्रियंका गांधी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया। साथ ही सपा में मुस्लिमों के प्रभाव के चलते भी हिंदू मतदाताओं का रूख भाजपा के पक्ष में रहा है। अयोध्या में राम मंदिर और वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प ने भी हिंदू मतदाताओं का जबरदस्त धु्रवीकरण किया है। ठोस कानून व्यवस्था ने महिलाओं को खासतौर से भयमुक्त रखा, इसलिए उनका झुकाव व विश्वास योगी के प्रति रहा। यदि वाकई भाजपा 300 के पार सीटें लाने में कामयाब होती है तो यह मानने के लिए विवष होना पड़ेगा कि मतदाता लोक-लुभावन वादों के रूप में दी जाने वाली घूस के लालच में भी नहीं आया।
    इन पूर्व अनुमानों ने भाजपा और आप को छोड़ अन्य दलों के रणनीतिकारों के पसीने छुड़ा दिए है। कांग्रेस, सपा और अकाली दल के प्रमुखों के माथों पर चिंता की लकीरें एकाएक गहरा गई है। हालांकि ये लोग इन अनुमानों को अपने-अपने ढंग से परिभाशित करते हुए गलत ठहरा रहे हैं। दरअसल पंजाब में आप को चालीस प्रतिषत मत और 100 सीटें मिलती दिखाई हैं। जबकि 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पुर्वानुमानों के आंकड़े वास्तविक चुनाव नतीजों के करीब भी नहीं थे। इन नतीजों में सी-वोटर ने भाजपा-आकाली को तीन-13, कांग्रेस को 41-49, आप को 59-67 सीटें दी थीं। एक्सएमआरसी ने अकाली-भाजपा को 0-7, कांग्रेस और आप को 55-55 सीटें दी थीं। इसी तरह टुडे-चाणक्य ने अकाली-भाजपा को 9, कांग्रेस को 54 और आप को भी 54 सीटें दी थीं। लेकिन जब असली नतीजें आएं तो कांग्रेस 77 सीटें मिलीं और आप 20 सीटों पर सिमट कर रह गई। हालांकि अकाली-भाजपा को अनुमानित सीटें ही मिली थीं। इसलिए अनुमानों पर प्रष्न चिन्ह लगाए जा रहे हैं। बावजूद इस मर्तबा पंजाब में अनुमान इसलिए सटीक बैठ सकते हैं, क्योंकि वहां केंद्रीय नेतृत्व की निरंतर गलतियों के चलते कांग्रेस अंतरकलह का शिकार होकर लगभग चौपट हो गई है। ऐसे में आप ने मुख्यमंत्री के रूप में भगवंत सिंह मान का चेहरा देकर बाजी मार लेने की चाल चली है, जो कामयाब होती दिख रही है।
    फिलहाल हमारे देश में चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण एक नया विषय है। यह ‘सेफोलाॅजी’ मसलन जनमत सर्वेक्षण विज्ञान के अंतर्गत आता है। भारत के गिने-चुने विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम के तहत सेफोलाॅजी को पढ़ाने की शुरुआत हुई है। जाहिर है, विषय और इसके विशेषज्ञ अभी अपरिपक्व अवस्था में हैं। सर्वेक्षणों पर शक की सुई इसलिए भी जा ठहरती है कि पिछले कुछ सालों में निर्वाचन-पूर्व सर्वेक्षणों की बाढ़ सी आई हुई है। इनमें तमाम कंपनियां ऐसी हैं, जो धन लेकर सर्वे करती हैं, नतीजतन परिणाम सटीक नहीं निकलते हैं। वैसे भी किसी भी प्रदेश के करोड़ों मतदाताओं की मंशा का आकलन महज कुछ हजार मतदाताओं की राय लेकर सटीक नहीं किया जा सकता ? कभी-कभी ये अटकलें संयोगवश ठीक बैठ जाती हैं। इसलिए चुनाव सर्वेक्षणों के प्रसारण व प्रकाशन पर रोक लगाई जाने की मांग भी उठ रही है। ओपिनियन पोल मतदाता को गुमराह कर निष्पक्ष चुनाव में बाधा बन रहे हैं। वैसे भी ये सर्वेक्षण वैज्ञानिक नहीं हैं, क्योंकि इनमें पारदर्षिता की कमी है और ये किसी नियम से बंधे नहीं हैं। साथ ही ये सर्वे कंपनियों को धन देकर कराए जा सकते हैं। बावजूद इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने ढोया जा रहा है। जबकि ये पेड न्यूज की तर्ज पर ‘पेड ओपोनियन पोल‘ में बदल गए हैं। इसीलिए इनके परिणाम भरोसे के तकाजे पर खरे नहीं उतरते। सर्वे कराने वाली एजेंसियां भी स्वायत्त होने के साथ जवाबदेही के बंधन से मुक्त हैं। गोया, इन पर भरोसा किस बिना पर किया जाए ?
    दरअसल चुनाव आयोग ने 21 अक्टूबर 2013 को सभी राजनीतिक दलों को एक पत्र लिखकर, चुनाव सर्वेक्षणों पर राय मांगी थी। दलों ने जो जवाब दिए, उससे मत भिन्नता पेश आई। वैसे भी बहुदलीय लोकतंत्र में एकमत की उम्मीद बेमानी है। जाहिर है, कांग्रेस ने सर्वेक्षण निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले बताए थे। बसपा ने भी असहमति जताई थी। माकपा की राय थी कि निर्वाचन अधिसूचना जारी होने के बाद सर्वेक्षणों के प्रसारण और प्रकाषन पर प्रतिबंध जरुरी है। तृणमूल कांग्रेस ने आयोग के फैसले का सम्मान करने की बात कही थी। जबकि भाजपा ने इन सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाना संविधान के विरुद्ध माना था। दरअसल ज्यादातर चुनाव सर्वेक्षण भाजपा के पक्ष में आते रहे हैं। उसने तथ्य दिया था कि सर्वेक्षणों में दर्ज मतदाता या व्यक्ति की राय वाक्, भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार क्षेत्र का ही मसला है। तय है, दलों के अलग-अलग रुझान, भ्रम और गुमराह की मनस्थिति पैदा करने वाले थे, इसलिए आयोग भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रह गया।

    जो राजनीतिक दलों और सर्वेक्षण कंपनियों के पैरोकार इन सर्वेक्षणों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने जारी रखने की बात कह रहे हैं, उन्हें सोचने की जरुरत है कि संविधान के अनुच्छेद 19-1 ;अद्ध में दर्ज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी के मौलिक अधिकारों के प्रावधानों का दुरुपयोग भी हुआ है। हर एक चुनाव में पेेड न्यूज के जरिए दलों और उम्मीदवारों का मीडिया ने कितना आर्थिक दोहन किया, यह सक्रिय राजनीति और पत्रकारिता से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है। दरअसल संविधान की मूल भावना, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की ओट में ही मीडिया का उम्मीद से ज्यादा व्यवसायीकरण हुआ है। मीडिया में मीडिया से इतर व्यवसाय वाली कंपनियों ने बड़ी पूंजी लगाकर प्रवेष किया और देखते-देखते मीडिया के अनेक निष्पक्ष स्वायत्त घरानों, मंचों, पत्रकार समितियों व संस्थानों पर कब्जा कर लिया। नतीजतन मीडिया पर स्वामित्व मुट्ठी भर लोगों का हो गया। इसी का परिणाम है कि भूमाफिया, खनिज माफिया, शराब माफिया और चिटफंड कंपनियों का भारतीय मीडिया पर एकाधिकार हो गया है। जाहिर है, पेड न्यूज के सिलसिले में तो मीडिया पहले ही अपना विश्वास खो चुका है और अब पेड ओपीनियन पोल खालिस मुनाफाखोरी की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    प्रमोद भार्गव
    प्रमोद भार्गवhttps://www.pravakta.com/author/pramodsvp997rediffmail-com
    लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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