लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

ईश्वर का नाम लेने में न तो कोई बुराई है और न ही किसी का अनिष्ट होने कि कोई संभावना है.मानव सभ्यता के विभिन्न दौर में प्राकृतिक आपदाओं और वैयक्तिक कष्टों से निज़ात पाने या संघर्ष क्षमता हासिल करने कि चेष्टा में प्रबुद्ध मानवों ने वैज्ञानिक आविष्कारों कि तरह ही मानसिक ,चारित्रिक ,सामाजिक ,आर्थिक और धार्मिक उन्नोंयन में महारत हासिल कि है .यह कार्य हर युग में , हर देश में ,हर द्वीप में और हर कबीले या मानव समूह में अनवरत चलता रहा है .कोई देश विशेष,समाज विशेष,जाति विशेष या सम्प्रदाय विशेष जब ओरों कि बनिस्पत अपनी रेखा को – दर्शन या मजहब के मद्देनजर बढ़ा दिखाने के फेर में असत्याचरण करते हुए ,प्रभुत्व का इस्तमाल करते हुए आक्रामक हो जाये तो समझो कि वो धरम या मजहब छुई -मुई भर है ,उसका कोई सत्यान्वेषण संभव नहीं,उसके मानने वालों का कोई नैतिक या चारित्रिक उत्थान संभव नहीं ,ऐसी कौम को मानवीयता के इतिहास में सदैव संदेह का सामना करना पड़ता है ,कई अग्नि परीक्षाएं भी उसके स्खलन को रोक नहीं पातीं .

भारत दुनिया का एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्रात्मक -धर्मनिरपेक्ष -गणतंत्र है ;जहाँ सभी धर्मों ,सभी जातियों ,और सभी विचारधाराओं को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है ,हालाँकि भारतीय संविधान कि प्रस्तावना में ही उसके नीति निर्देशक सिद्धांतों कि महानता स्पष्ट उद्घोषित होती है ‘हम भारत के जन गण यह संकल्पित करते हैं कि हम सर्व प्रभुत्व सम्पन्न ,लोकतंत्रात्मक ,धर्मनिरपेक्ष ,समाजवादी गणतंत्र कि स्थापना हेतु बचन बध्ध होंगे …….”हालाँकि तीसरा संकल्प याने समाजवाद अभी भी दूर कि कौड़ी है ,अभी तो पहले दो सिद्धांत याने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता ही डांवाडोल होते नजर आ रहे हैं इसके लिए सिर्फ सत्ता ही जिम्मेदार हो ऐसी बात नहीं ,जनता के वे हिस्से जिनके हितों का ताना -बाना भृष्ट आचरण से जुड़ गया वे भी इस इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं. बहुसंख्यक सम्प्रदायवादी जितने जिम्मेदार हैं ;अल्पसंख्यक सम्प्रदायवादी -कट्टरपंथी भी उतने ही जिम्मेदार हैं .विदेशीशत्रु जितने जिम्मेदार हैं आंतरिक तथाकथित अंध राष्ट्रीयतावादी भी उतन्रे ही जिम्मेदार हैं .

देश कि बहुसंख्यक साम्प्रदायिक राजनीत में यदि ढपोरशंखियों को सर माथे लिए जायेगा और विकाश कि -धर्म निरपेक्षता कि .समाजवाद कि बात करने वालों को हासिये पर धकेला जायेगा तो संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों कि बखत ही क्या रहेगी?अल्पसंख्यक समूह कि उदारवादी कतारों को हासिये पर धकेला जायेगा तो कट्टरपंथ हावी होगा ही फिर उससे से जूझने के लिए उदारचेता समदृष्टि उभय हितेषी कौन बचेगा ?

पहले अयोध्या काण्ड फिर गोधरा काण्ड उसके उपरान्त गुजरात कांड ,मुंबई काण्ड ,मालेगांव .अजमेर .हैदरावाद और समझौता एक्सप्रेस से लेकर अब स्वामी असीमानंद कि अपराध स्वीकारोक्ति के निहतार्थ हैं कि अल्पसंख्यकों को उदारवादी ट्रेक पर चल पड़ना चाहिए किन्तु हतभाग्य ऐसा हो नहीं पा रहा है .कतिपय उच्च शिक्षित उदारमना हिन्दू खुलकर अल्पसंख्यकों का पक्ष पोषण करते रहते हैं ,वाम जनतांत्रिक कतारों में सदैव अल्पसंख्यकों के हितों की पेरवी के लिए शिद्दत से काम होता रहा है कांग्रेस ,समाजवादी पार्टी ,बहुजन समाज पार्टी ही नहीं बल्कि भाजपा भी सिकंदर वख्त से मुख्तार अंसारी तक यह जताने के लिए जी जान से जुटी रही की वह अल्पसंख्यक विरोधी नहीं .आर एस एस ने भी बाज मर्तवा जाहिर किया की हिंदुत्व का मतलब ये नहीं वो नहीं -मतलब देश में छोटे भाई की तरह रहो तुम भी खुश हम भी खुश .हालाँकि सत्ता के लिए जब ये गंगा जमुनी मार्ग जमीन पर नहीं बन सका तो रथारूढ़ होकर ,हाथ में त्रिशूल लेकर हिन्दू जनता के सामने राम लला के नाम पर छाती कूटकर जल्द बाज़ी में ‘दोउ गंवाँ बैठे …माया …मिली न राम ….इसी तरह अल्पसंख्यकों की उदारवादी कतारों को परे हटाते हुए इस्लामिक कट्टरपंथी भी बिना आगा पीछा सोचे भारत राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक स्वरूप को विच्छेदित करने में लगे हैं.

दारुल -उलूम -देवबंद के कुलाधिपति या वाईस चांसलर मौलाना गुलाम मोहम्मद वास्तन्वतीके जबरिया इस्तीफे से साफ़ है कि भारत में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें विवेक और सद्भाव कि आवाजों को मुखर नहीं होने देना चाहतीं . इसमें किसी को भी शक नहीं कि गुजरात के २००२ में हुए दुखांत दंगों में मुस्लिम समुदाय के निर्दोष लोगों को जान माल का भारी नुक्सान हुआ था किन्तु क्या निर्दोष हिन्दुओं को भी इसी तरह कि बीभत्स तस्वीर का सामना नहीं करना पड़ा था ?साम्प्रदायिक दंगों कि आग में अधिकांश मजदूर और वेरोजगार ही क्यों मारे गए ?क्या यह सर्वहारा वर्ग को साम्प्रदायिक आधार पर विखंडित करने कि पूंजीवादी -साम्राज्यवादी कुचाल नहीं ?किंतुं इन नर संहारों में सबसे ज्यादा छति धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत कि हुई इसके वावजूद यदि मौलाना वास्तान्वती इस गंगा जमुनी एकता को पुख्ता करने के लिए मुसलमानों से गुजारिश करते हैं कि अतीत की कालिमा को भूलो आगे बढ़ो तो इसमें ऐसा क्या गजब हो गया कि उन्हें त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया गया . मौलाना वास्तान्वती सिर्फ इस्लामी आलिम ही नहीं वे एम् वी ए भी हैं और गुजरात खास तौर से सूरत उनकी कर्म भूमि भी रही है वे गुजरात या शेष भारत में मुस्लिमों के साथ तथाकथित भेद भाव की अवधारणा से परे प्रोग्रेसिव विचा रों के हामी हैं .उनकी यह समझ भी है कि क्षेत्रीय और भाषाई कारणों से देश के मुसलमान सार्वदेशिक तौर पर एक सी सोच नहीं रखते .अर्थात यह जरुरी नहीं कि यु पी या बिहार का मुस्लिम चीजों को जिस नज़र से देखता है गुजरात का मुस्लिम भी वही नजरिया धारण करे.हो सकता है कि गुजराती मुसलमानों के जख्म अभी भी न भरे हों किन्तु मानव जीवन यात्रा में जो सकारात्मकता जरुरी है वो जनाब वास्तान्व्ती ने व्यक्त कि थी .अब दारुल उलूम की मजलिसे शूरा ने उन्हें मनाने का फैसला तो किया किन्तु कट्टरपंथी छात्र समूह की हरकतों से एक महान विद्वान् एक सर्वश्रेष्ठ उलेमा इस्तीफ़ा वापिस लेने को तैयार नहीं .उनके पदारूढ़ होने से देवबंद में शिक्षा के नए द्ववार खुलने ,देश में इस्लामी तालीम को रोजगार मूलक बनाने और रोशन ख़याल हमवतनो की आवाज बुलंद होने के सपने साकार करने की उम्मीदें बनी थीं कट्टरपंथियों की हरकतों से ये अधुनातन कपाट बंद होते से लग रहे हैं .आज जबकि दुनिया भर में इस्लामी कट्टरवाद और इस्लामिक उदारवाद के बीच जंग छिड़ी है तब देश और दुनिया के उदारवादी आवाम की एकजुटता सहिष्णुता और उदारवाद की पक्षधरता जरुरी है .उसके पूर्व भारत में बहुसंख्यक कट्टरवाद पर तगड़ी लगाम जरुरी है और वास्तन्वती जैसे इस्लामिक शिक्षा शाश्त्रियों को भरपूर सहयोग तथा समर्थन जरुरी है .यह एक के बस का काम नहीं सभी की थोड़ी थोड़ी आहुति जरुरी है …..

2 Responses to “अंध-आस्था से लेस सांप्रदायिकता ही कट्टरवाद की जननी है…..”

  1. GGShaikh

    आपकी संवेदनाओं को नमन.
    कुछ तो कहीं तो बात बनेगी,
    वैसा आलेख…
    कुतर्कों में पड़े बिना वैसा ही सोचना होगा,
    जैसी सद्भावनाओं यहाँ दर्ज हुई है.

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    तिवारीजी आपका विचार तो सही है,पर ऐसी विचारधारा वाले हर मजहब में अल्पसंख्यक हैं,क्योंकि उनकी विचारधारा में वह आक्रमकता नहीं है है जो कट्टर पन्थियों में है.यही कारण है की राजनैतिक पार्टियाँ भी अपनी वोट बैंक का ख्याल रखते हुए उनको ज्यादा तवजो नहीं देती. आवश्यकता है ऐसे लोगों को आक्रमण की परवाह किये बिना एकजुट होने की.इस दिशा में जबतक हर मजहब या धर्म के उदारवादी लोग एकसाथ नहीं खड़े होंगे तबतक यह कट्टरपंथ का बाज़ार योही चलता रहेगा.छिटपुट लोग जो आवाज उठाएंगे उन्हें भी दबा दिया जायेगा. या उनकी आवाज नकारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जायेगी.

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