लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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हैदराबाद विश्वविद्यालय के आत्महत्या करनेवाले छात्र रोहित वेमुला की मां और भाई ने कल बौद्ध धर्म में दीक्षा ले ली। यदि वे सचमुच बौद्ध बन जाएं तो वे बेहतर मनुष्य बन सकते हैं, क्योंकि बौद्ध-धर्म अनेक पाखंडों और कर्मकांडों से मुक्त है। वह सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर की सत्ता नहीं मानता। नास्तिक होने के बावजूद बौद्ध धर्म आत्मा की अमरता और कर्मफल सिद्धांत को मानता है। मानव-मात्र की समानता में उसका अडिग विश्वास है। निर्वाण-प्राप्ति ही उसका लक्ष्य है।
यहां मूल प्रश्न यही है कि क्या रोहित की मां और भाई ने निर्वाण-प्राप्ति के लिए धर्म-परिवर्तन किया है? निर्वाण प्राप्ति के लिए तो भीमराव आंबेडकरजी ने भी धर्म-परिवर्तन नहीं किया था।

वे बौद्ध बने थे, गुस्से में। उन्हें हिंदुओं की जाति-प्रथा से नफरत थी। उनका दिल घृणा से भरा हुआ था। उस घृणा को प्रकट करने के लिए वे बौद्ध क्या, कुछ भी बन सकते थे। इसी घृणा ने उन्हें गांधी विरोधी और अंग्रेजपरस्त बनाया। इसी घृणा के कारण उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया। उनके लिए स्वाधीनता संग्राम से बड़ी लड़ाई थी- अछूतोद्धार की। जातिवाद का विरोध करते-करते वे हिंदू विरोधी बन गए और देखिए कि उनका कितना दुखद अंत हुआ? वे देश में जातिवाद के सबसे कट्टर मसीहा बन गए। जिस बुराई के खिलाफ वे लड़ना चाहते थे, वे आज उसके ही सबसे बड़े संरक्षक बना दिए गए हैं।

रोहित की मां और भाई यदि सोच-समझकर बौद्ध बने हों तो यह स्वागत योग्य घटना होगी। क्योंकि करोड़ों लोग बिना सोचे-समझे ही हिंदू, मुसलमान, यहूदी, सिख, बौद्ध और जैन बनते जाते हैं। वे पैदा होते ही किसी न किसी धर्म का ठप्पा अपने माथे पर लगवा लेते हैं। लेकिन उन्होंने अपना धर्म उसी गुस्से में बदला है, जिसमें आंबेडकरजी ने बदला था तो उन्हें निर्वाण तो मिलने से रहा। काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह से ग्रस्त व्यक्ति को निर्वाण मिल ही नहीं सकता, यह महात्मा बुद्ध की शिक्षा है।

क्रोध या दुख में डूबकर बौद्ध बनना तो बौद्ध धर्म की गरिमा को गिराना है। खुद को डुबाना है। आंबेडकरजी की नकल करते हुए हमारे लाखों दलित भाई बौद्ध बन गए लेकिन क्या जातिवाद से उनका पिंड छूटा? उन पर दोहरा ठप्प लग गया। अछूत होने के साथ-साथ अब वे विधर्मी भी हो गए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इतना संतोष जरुर है कि वे विदेशी विधर्मी (मुसलमान या ईसाई) नहीं बने, स्वदेशी विधर्मी (बौद्ध) बन गए। मेरा मूल प्रश्न यही है कि बौद्ध बनने से क्या उन्हें भारतीय समाज में बराबरी का दर्जा मिल गया? अच्छा होता कि हमारे दलित भाई-बहन आंबेडकरजी की अंधी नकल करने की बजाय उनके बताए रास्ते पर चलते और जातिवाद के समूलनाश की कोशिश करते।

 

One Response to “बौद्ध बनने की अंधी नकल”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    आपका कहना कुछ हद तक सही है.पर कभी कभी निराशा के अंधकार में जुगनू की चमक भी मार्ग दर्शक बन जाती है.रोहित की माँ और भाई को भी शायद ऐसा ही लगा हो.रही बौद्ध को विधर्मी मानने की बात ,तो मेरी समझ में यह नहीं आता कि एक तरफ तो बौद्ध विधर्मी करार किये जाते हैं,दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध को नौवां अवतार माना जाता है.तुर्रा यह कि बुद्ध का जब जन्म हुआ था,तब कलयुग का प्रारम्भ हो चुका था,फिर भी दसवें अवतार के रूप में कल्कि अवतार का अभी भी इंतजार है.बौद्ध धर्म को अपनाने से कम से कम इन पाखण्डों से तो उन्हें छुटकारा मिल जायेगा,मोक्ष भले ही न मिले.

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