राजनीति

ब्रिक्स : कूटनीति के खेल में भारत की अहम भूमिका

प्रमोद भार्गव

दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुपक्षीय बैठकों के जरिए वैश्विक अनिश्चितताओं और अस्थिरताओं के बीच बड़ी साफगोई से विश्व को नई दिशा देने का काम किया है। जबकि सम्मेलन में आतंकवाद और परमाणु नीति अपनाने वाले देश चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग मौजूद थे। पश्चिम एशिया संघर्ष पर ईरान, सऊदी अरब और यूएई परस्पर विपरीत रुख अपनाने वाले देश भी थे। यूक्रेन युद्ध के चलते अमेरिका और यूरोप के देश रूस के विरुद्ध तीखे तेवर अपनाए हुए हैं। बावजूद भारत ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को बातचीत से हल निकालने का शांति-पाठ पढ़ाया। साथ ही जिस गर्मजोशी और उत्सुकता से पुतिन और जिनपिंग की मुलाकात मोदी ने कराई, उसे भारत, चीन और रूस के त्रिपक्षीय समूह के बीच समन्वय और गतिशीलता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। इन मुलाकातों के बाद आपसी सहमति से जो घोषणा-पत्र जारी हुआ है, उसे भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

कभी-कभी पूर्वानुमान हकीकत की कसौटी पर खरे उतरते हैं। 2008 में जब दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही थी, तब ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड ने अपने देश के राजनयिकों से कहा था कि वे ‘विश्व संदर्भ में अपना दृष्टिकोण बदलें, क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था के साथ, भारत और चीन के मजबूती से जुड़ जाने के कारण भविष्य में शक्ति केंद्र पश्चिम से हस्तांतरित होकर पूरब का रुख करने की तैयारी में है।‘ यह बात ब्राजील के समुद्रतटीय शहर फोर्टालेजा में ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन संपन्न होने के बाद कही थी। अब दिल्ली में आयोजित हुए सम्मेलन में यह तथ्य मजबूती से उभरा है कि विश्व के नए शक्ति केंद्र का उदय एशिया में हो सकता है, इसका संकेत साझा घोषणा पत्र से मिल गया है।

ब्रिक्स सम्मेलन में पहली बार ऐसा अजूबा देखने में आया है कि अलग-अलग रणनीतिक, सामरिक और आर्थिक हितों वाले देशों का आपसी सहमति से संयुक्त घोषणा पत्र बन पाया और फिर जारी भी हो गया। भारत की यह बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। इसमें भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका की दावेदारी का समर्थन भी दोहराया गया है। घोषणा पत्र में उल्लेख किया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् को अधिक लोकतांत्रिक, प्रभावी और विकासशील देशों की बुलंद आवाज बनाना जरूरी है। इसलिए इसमें अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए। यह तब संभव हुआ, जब चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग स्वयं मौजूद थे। घोषणा पत्र में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की खुली निंदा की गई। साथ ही आतंकवाद के सुरक्षित ठिकानों और सीमा पर आतंकी आवाजाही के खिलाफ कार्रवाई का संकल्प लिया गया। यही नहीं ब्रिक्स नेताओं ने आतंकवाद के सभी रूपों से निपटने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए आतंकियों की सीमापार आवाजाही प्रतिबंधित करने, आतंकवाद का वित्त पोषण करके उसे प्रोत्साहित करने वाले नेटवर्क को तोड़ने और आतंकियों के लिए सुरक्षित पनाहगाहों से निपटने की जरूरत पर भी गंभीर सुझाव दिए। आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता और शब्दिता से नहीं जोड़ने पर भी सहमति बनी है। इस कड़ी में आतंकी गतिविधियों में भागीदार लोगों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराने की भी बात कही गई है। गौरतलब है कि चीन खासतौर से आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई देता है। पहलगाम के मुद्दे पर भी चीन पाकिस्तान की तरफ झुका दिखाई दिया था। किंतु अब इस घोषणा पत्र के जरिए आतंकवाद को जड़मूल से प्रभावित करने वाले प्रावधान भारत के लिए आतंक के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है।

इस सम्मेलन में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ प्रतिबंधों पर भी चिंता जताते हुए विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) को भी कठघरे में खड़ा किया गया। क्योंकि मनचाहा टैरिफ लगाना विकासशील देशों की आर्थिक अनिश्चितता को बढ़ाने का काम करते हैं। इससे व्यापारिक असंतुलन बढ़ता है और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच खासतौर से विकासशील देशों को अपनी अर्थव्यवस्था संतुलित बनाए रखने के लिए नई चुनौतियों से जूझना पड़ता है। यह स्थिति वैश्विक दक्षिण के देशों को बहुत अधिक प्रभावित करती है। जबकि ये देश अब केवल नियमों का अनुकरण करने वाले नहीं रह हैं, बल्कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में साझेदारी करने के लिए खड़े हो रहे हैं। अतएव इनके विशेषाधिकारों की चिंता करने की जरूरत समूची दुनिया की है। ब्रिक्स करेंसी लाने का प्रस्ताव ब्रिक्स के पिछले सम्मेलनों में आता रहा है, लेकिन इस बार इस प्रस्ताव पर कोई बात नहीं बनी। फिलहाल व्यापारिक लेन-देन और लागत घटाने के लिए स्थानीय मुद्राओं में भुगतान को बढ़ावा देने और भुगतान प्रणाली अधिक मजबूत बनाने पर जरूर फोकस डाला गया है।

अमेरिका-ईरान-इजरायल तथा रूस-यूक्रेन की लंबी लड़ाई के चलते परमाणु हथियारों की सुरक्षा और परमाणु युद्ध के खतरे दुनिया को बड़े विनाशकारी संकट के रूप में दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका बार-बार ईरान के सुरक्षित परमाणु हथियारों पर हवाई हमले कर रहा है। ईरान पर परमाणु हमले की भी आशंका बनी हुई है। पाकिस्तान भी भारत को परमाणु हमले की गीदड़-भभकी देता रहता है। इस देश में आतंकवादियों का जबरदस्त बोलबाला है, इसलिए वाईदवे इनके हाथ पाक के परमाणु शस्त्र लग जाते हैं तो कुछ भी संभव हो सकता है? इसलिए परमाणु हथियार नियंत्रण और परमाणु अप्रसार व्यवस्था मजबूत करने के साथ पश्चिम एशिया को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाने की अपील भी की गई है। इस परिप्रेक्ष्य में सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत है। यह कहना अब पर्याप्त नहीं रह गया है। अब इस मुद्दे पर बातचीत आधारित लिखित सहमति की जरूरत है। इससे तात्पर्य है कि देशों के प्रमुख अब केवल उद्बोधन देकर पुरानी स्थितियों को नहीं दोहराते हुए, वास्तविक लिखित प्रस्ताव रखकर उस पर बातचीत से निष्कर्ष निकालते हुए अमल करें। खासतौर से प्रधानमंत्री मोदी की मुद्दागत दो टूक बातें और सदस्य देशों के बीच बनी सहमतियों के बाद जारी घोषणा पत्र ने यह जरूर जता दिया है कि भारत ब्रिक्स देशों को यह जताने में सफल रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संगठन को यदि सशक्त बने रहना है तो उसे आपसी मतभेदों को भुलाना होगा? हालांकि इस परिप्रेक्ष्य में फिलहाल स्थायी सदस्यों की सहमति के बिना कोई मार्ग खुलेगा, यह कहना कठिन है?