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    Homeसाहित्‍यकवितातितली है खामोश !

    तितली है खामोश !

    बदल रहे हर रोज ही, हैं मौसम के रूप !
    ठेठ सर्द में हो रही, गर्मी जैसी धूप !!
    सूनी बगिया देखकर, तितली है खामोश !
    जुगनूं की बारात से, गायब है अब जोश !!
    दें सुनाई अब कहाँ, कोयल की आवाज़ !
    बूढा पीपल सूखकर, ठूंठ खड़ा है आज !!
    जब से की बाजार ने, हरियाली से प्रीत !
    पंछी डूबे दर्द में, फूटे गम के गीत !!
    फीके-फीके हो गए, जंगल के सब खेल !
    हरियाली को रौंदती, गुजरी जब से रेल !!
    नहीं रहें मुंडेर पर, तोते-कौवे -मोर !
    लिए मशीनी शोर है, होती अब तो भोर !!
    सूना-सूना लग रहा, बिन पेड़ों के गाँव !
    पंछी उड़े प्रदेश को, बांधे अपने पाँव !!
    हरे पेड़ सब कट चलें, पड़ता रोज अकाल !
    हरियाली का गाँव में, रखता कौन ख्याल !!
    वाहन दिन भर दिन बढ़ें, खूब मचाये शोर !
    हवा विषैली हो गई, धुंआ चारों ओर !!
    बिन हरियाली बढ़ रहा,अब धरती का ताप !
    जीव-जगत नित भोगता, प्राकृतिक संताप !!
    जीना दूबर है हुआ, फैलें लाखों रोग !
    जब से हमने है किया, हरियाली का भोग !!

    डॉ. सत्यवान सौरभ
    डॉ. सत्यवान सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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