धर्म-अध्यात्म सर्वव्यापक कर्मों का साक्षी परमात्मा मुनष्य को बुरे काम करने पर रोकता क्यों नहीं? January 22, 2016 by मनमोहन आर्य | 2 Comments on सर्वव्यापक कर्मों का साक्षी परमात्मा मुनष्य को बुरे काम करने पर रोकता क्यों नहीं? ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरुप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, जीवों के प्रत्येक कर्म का साक्षी व फल प्रदाता है। जीवात्मा सत्य व चेतन, सूक्ष्म, एकदेशी, अल्पज्ञ, अनादि, अविनाशी, नित्य, अजर, अमर आदि गुणों वाली सत्ता व पदार्थ है। जीवात्मा को पूर्वजन्म के अभुक्त कर्मों, पाप-पुण्य वा प्रारब्ध के आधार पर भिन्न भिन्न योनियों में से किसी एक योनि […] Read more » सर्वव्यापक कर्मों का साक्षी परमात्मा मुनष्य को बुरे काम करने पर रोकता क्यों नहीं?
धर्म-अध्यात्म ईश्वर व जीवात्मा विषयक यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति का सरल उपाय January 21, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment ईश्वर के सत्य स्वरूप का ज्ञान विद्वानों के उपदेशों को सुनकर अथवा वेद वा वैदिक साहित्य के अध्ययन से प्राप्त होता है। पूर्ण नहीं अपितु कुछ मात्रा में यह ज्ञान वैदिक धर्मी माता-पिताओं की सन्तानों को भी परम्परा व संगति से प्राप्त हो जाता है। आजकल के धार्मिक कथाकारों के उपदेशों व प्रवचनों पर दृष्टि […] Read more » Featured ईश्वर व जीवात्मा विषयक यथार्थ ज्ञान यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति का सरल उपाय
धर्म-अध्यात्म ईश्वर मनुष्यों सहित सभी प्राणियों का सदा सर्वदा का साथी और रक्षक है January 20, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment तर्क और युक्ति के आधार से यह सिद्ध किया जा सकता है कि इस संसार का रचयिता और पालक ईश्वर है। जो लोग इस विचार से सहमत न हों, उनका यह दायित्व बनता है कि वह इसका प्रतिवाद वा वैकल्पिक उत्तर युक्ति व तर्क पूर्वक दें। हमारा अनुमान है कि इसका अन्य कोई उत्तर नहीं […] Read more » ईश्वर मनुष्यों सहित सभी प्राणियों का सदा सर्वदा का साथी और रक्षक है
धर्म-अध्यात्म मनुष्य जन्म की पृष्ठभूमि, कारण एवं परम उद्देश्य January 19, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठतम प्राणी है। इसका कारण मनुष्यों में सत्य व असत्य का विवेक कराने वाली बुद्धि होती है जबकि अन्य प्राणियों के पास विवेक कराने वाली बुद्धि नहीं होती। मनुष्य अन्य प्राणियों से कुछ भिन्न एक जाति है जिसमें स्त्री व पुरुष सम्मिलित हैं। आजकल जो जातिसूचक शब्दों का प्रयोग […] Read more » मनुष्य जन्म की पृष्ठभूमि
धर्म-अध्यात्म ईश्वर का प्रमाणिक विवरण कहां से प्राप्त हो सकता है? January 19, 2016 by मनमोहन आर्य | 2 Comments on ईश्वर का प्रमाणिक विवरण कहां से प्राप्त हो सकता है? संसार के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो सबसे पुराना इतिहास भारत का ही उपलब्ध होता है। भारत का इतिहास 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 115 वर्ष पुराना है। लगभग 5,200 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था। इससे देश का महाविनाश हुआ। इसमें सैनिक व राजा तो मरे ही, […] Read more » ईश्वर का प्रमाणिक विवरण कहां से प्राप्त हो सकता है?
धर्म-अध्यात्म जिसका जन्म उसकी मृत्यु और जिसकी मृत्यु उसका जन्म होना अटल है January 18, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु ध्रुव अर्थात् अटल है और जिसकी मृत्यु होती है उसका पुनर्जन्म वा जन्म होना भी ध्रुव सत्य है। हम अपने जीवन में यदाकदा अपने परिचितों व अपरिचितों की मृत्यु का समाचार सुनते रहते हैं। जिस व्यक्ति से हमारा सम्पर्क व सम्बन्ध […] Read more » Featured जिसका जन्म उसकी मृत्यु जिसकी मृत्यु उसका जन्म होना अटल है
धर्म-अध्यात्म महर्षि दयानन्द के मुम्बई में वर्ष १८८२ में दिए गए कुछ ऐतिहासिक व्याख्यान January 17, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment महर्षि दयानन्द (1825-1883) ने मुम्बई में जनवरी से जून, 1882 के अपने प्रवास में वहां की जनता को उपदेश दिये थे जो आर्यसमाज, काकड़वाड़ी, मुम्बई के मन्त्री द्वारा नोट कर उन्हें आर्यसमाज के कार्यवाही रजिस्टर में गुजराती भाषा में लिख कर सुरक्षित किया गया था। आज के लेख में महर्षि दयानन्द के उन 24 उपलब्ध […] Read more » महर्षि दयानन्द महर्षि दयानन्द के मुम्बई में वर्ष १८८२ में दिए गए कुछ ऐतिहासिक व्याख्यान
धर्म-अध्यात्म जीवात्मा का पूर्वजन्म, मुत्यु, पुनर्जन्म व परजन्म January 17, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment आज का विज्ञान ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व व स्वरुप से पूर्णतया व अधिकांशतः अपरिचित है। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों का अध्ययन ही करता है व उनके विषय में यथार्थ जानकारी उपलब्ध कराता है। विज्ञान का भौतिक पदार्थों का अध्ययन व उसके आधार पर उपलब्ध कराया गया ज्ञान व सुविधायें सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। इसका […] Read more » death of a soul reincarnation of a soul जीवात्मा का पूर्वजन्म परजन्म पुनर्जन्म मुत्यु
धर्म-अध्यात्म वैदिक समाज व्यवस्था का सार है मनुस्मृति January 17, 2016 by अशोक “प्रवृद्ध” | 1 Comment on वैदिक समाज व्यवस्था का सार है मनुस्मृति अशोक “प्रवृद्ध” पुरातन ग्रंथों के अनुसार स्वयंभू मनु संसार के पहले मनुष्य हैं और सम्पूर्ण पृथ्वी पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु का नाम समाहित है। अर्थात मनु के नाम से ही मनुष्य शब्द बना है । संस्कृत में मनुस्मृति […] Read more » manusmriti is the soul ofvaidik societal arrangements वैदिक समाज व्यवस्था का सार है मनुस्मृति
धर्म-अध्यात्म ब्रह्मचर्य का स्वरुप व उसके पालन से लाभ January 13, 2016 by मनमोहन आर्य | 3 Comments on ब्रह्मचर्य का स्वरुप व उसके पालन से लाभ सभी मनुष्य सुख की ही कामना करते हैं, दुःख की कामना कोई मनुष्य नहीं करता। सुख प्राप्त हों और जीवन में दुःख न आयें, इसके लिए प्रयत्न करना होता है। सुख व दुःख का आधार शरीर है। यदि हमारा शरीर दुर्बल व रोगी है तो यह दुःख का धाम बन जाता है और यदि यह […] Read more » ब्रह्मचर्य का स्वरुप
धर्म-अध्यात्म श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय January 13, 2016 / January 17, 2016 by मनमोहन आर्य | 4 Comments on श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय संसार के इतिहास में सबसे प्राचीन इतिहासिक ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि रामयण है। इस ग्रन्थ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सहित भरत जी के पावन जीवन का भी चरित्र चित्रण है। राम के अनुज भरत जी ने भी भ्रातृत्व वा भ्रातृ-प्रेम की ऐसी मर्यादायें स्थापित की हैं कि उसके बाद संसार के इतिहास में अन्य कोई […] Read more » भरत जी श्री राम श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय
धर्म-अध्यात्म संन्यास आश्रम की महत्ता पर संन्यासी स्वामी दयानन्द का उपदेश January 11, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment महर्षि दयानन्द के प्रसिद्ध ग्रन्थों में से एक ग्रन्थ संस्कारविधि है। इस ग्रन्थ में उन्होंने वेदों पर आधारित 16 संस्कारों का व्याख्यान किया है। इस व्याख्यान में सभी संस्कारों के स्वरूप का वर्णन करने के साथ उनकी विधि वा पद्धति भी दी गई है। संस्कारविधि से ही हम उनके संन्यास आश्रम पर उपदेश को पाठकों […] Read more » संन्यास आश्रम संन्यास आश्रम की महत्ता संन्यास आश्रम की महत्ता पर संन्यासी संन्यासी स्वामी दयानन्द का उपदेश स्वामी दयानन्द का उपदेश