आलोचना साहित्यिक मजमेबाजी के प्रतिवाद में December 6, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on साहित्यिक मजमेबाजी के प्रतिवाद में -जगदीश्वर चतुर्वेदी एक जमाना था हिन्दी साहित्य में य़थार्थ का चित्रण होता था। विचारधारात्मक बहसें होती थीं। नए मानकों पर आलोचना लिखी जाती थी। इन दिनों हिन्दी साहित्य को तमाशबीनों और मेले-ठेले की संस्कृति ने घेर लिया है। पहले साहित्य में उत्सव गौण हुआ करते थे अब प्रधान हो गए हैं। यह साहित्य में तमाशबीन […] Read more » Literary साहित्यिक
आलोचना अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता November 22, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता -जगदीश्वर चतुर्वेदी स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख गए हैं जिसके कारण […] Read more » communalism साम्प्रदायिकता
आलोचना उत्तर आधुनिकतावाद के विभ्रम और अस्मिता November 21, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी इन दिनों वास्तव और अवास्तव, व्यक्ति और अव्यक्ति, जीवन और मृत्यु, उपस्थित और अनुपस्थित आदि के बारे में सवाल नहीं किए जाते। जो कुछ भी कहा जाता है वह खास सीमा में रहकर ही कहा जाता है। इसी प्रसंग में देरिदा की प्रसिद्ध किताब ‘स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स’ का जिक्र करना समीचीन होगा। इस […] Read more » modernism उत्तर आधुनिकतावाद
आलोचना चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह October 10, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह -जगदीश्वर चतुर्वेदी सवाल टेढ़ा है लेकिन जरूरी है कि चेग्वेरा क्यों नहीं बन पाए नामवर सिंह। उन्होंने क्रांतिकारी की बजाय बुर्जुआमार्ग क्यों अपनाया ? क्रांति का मार्ग दूसरी परंपरा का मार्ग है। जीवन की प्रथम परंपरा है बुर्जुआजी की। नामवरजी को पहली परंपरा की बजाय दूसरी परंपरा पसंद है। सवाल यह है कि दूसरी परंपरा […] Read more » Namwar Singh चे ग्वारा नामवर सिंह
आलोचना नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम October 9, 2010 / October 9, 2010 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 5 Comments on नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम -जगदीश्वर चतुर्वेदी भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से […] Read more » नागार्जुन
आलोचना नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता October 9, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता -जगदीश्वर चतुर्वेदी नागार्जुन पर जो लोग शताब्दी वर्ष में माला चढ़ा रहे हैं। व्याख्यान झाड़ रहे हैं। नागार्जुन के बारे में तरह-तरह का ज्ञान बांट रहे हैं ऐसे हिन्दी में 20 से ज्यादा लेखक नहीं हैं। ये लेखक कम साहित्य के कर्मकाण्डी ज्यादा लगते हैं। आप इनमें से किसी को भी फोन कीजिए ये लोग […] Read more » hindi नागार्जुन हिन्दी
आलोचना कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान October 7, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान -जगदीश्वर चतुर्वेदी बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती है? लेकिन हिन्दी के […] Read more » Makhanlal Chaturvedi Patrakarita Vishwavidyalay महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
आलोचना कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष – कौन पा रहा है, कौन खो रहा है? October 7, 2010 / December 21, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष – कौन पा रहा है, कौन खो रहा है? -जगदीश्वर चतुर्वेदी वर्धा में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कवि चतुष्टयी जन्मशती पर आलोचक नामवर सिंह ने जो कहा वह कमाल की बात है। अब हमारे गुरूवर बिना परिप्रेक्ष्य के सिर्फ विवरण की भाषा बोलने लगे हैं। परिप्रेक्ष्यरहित आख्यान और रिपोर्टिंग का नमूना देखें- “इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी […] Read more » University महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
आलोचना सैलीबरेटी नामवर सिंह September 20, 2010 / December 22, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 8 Comments on सैलीबरेटी नामवर सिंह -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह लंबे समय से ‘गायब’ हैं। कोई नहीं बता रहा वे कहां चले गए। वैसे व्यक्ति नामवर सिंह साक्षात इस धराधाम में हैं और मजे में हैं। गड़बड़ी यह हुई है कि ‘आलोचक नामवर सिंह’ गायब हो गए हैं। उनका गायब होना एक बड़ी खबर होना चाहिए था। […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
आलोचना कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल September 20, 2010 / December 22, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 4 Comments on कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल -जगदीश्वर चतुर्वेदी अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना के सम-सामयिक वातावरण को […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
आलोचना छिनाल के आगे की बहस August 8, 2010 / December 22, 2011 by डॉ. सुभाष राय | 9 Comments on छिनाल के आगे की बहस -डा. सुभाष राय उत्तर भारत के हिंदीभाषी ग्रामीण इलाकों का एक बहुप्रचलित शब्द है छिनाल। इस शब्द ने हाल ही में हिंदी जगत में बड़ा बवाल मचा दिया। इसका प्रयोग अमूमन उन महिलाओं के लिए किया जाता है, जो अपने पति के प्रति वफादार नहीं होती और उसकी जानकारी के बिना तमाम पुरुषों से देह […] Read more » Narayan Rai छिनाल विभूति नारायण राय
आलोचना चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश July 3, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश -जगदीश्वर चतुर्वेदी उदयप्रकाश पर लिखना मुश्किल काम है। इसके कई कारण हैं पहला यह कि वह मेरे दोस्त हैं। दूसरा उनका जटिल रचना संसार है। उदयजी को मैं महज एक लेखक के रूप में नहीं देखता। बल्कि पैराडाइम शिफ्ट वाले लेखक के रूप में देखता हूँ। हिन्दी कहानी की परंपरा में पैराडाइम शिफ्ट वाले दो […] Read more » Udayprakash उदयप्रकाश