हिन्दी को अब नहीं तो कब मिलेगा सम्मान ?

Posted On by & filed under विविधा

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देश की न्याय व्यवस्था के लिए सुझाव दिया है कि न्यायालय को अपने निर्णय स्थानीय एवं हिंदी भाषा में देने चाहिए। इस दिशा में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कदम भी बढ़ा दिए है, जो सराहनीय है। अब अन्य न्यायालयों की बारी है। गौरतलब है कि देश में आज भी 95 प्रतिशत… Read more »

संकीर्णताओं के विरोध में खड़ी है हिंदी

Posted On by & filed under विविधा

जब हम हिंदी की उपेक्षा की बात करते हैं और इसके संरक्षण-संवर्धन हेतु शासकीय सहयोग की आशा करते हैं तब हमें यह भी सोचना चाहिए कि कहीं हिंदी की शक्ति और उसके सामर्थ्य के प्रति हम स्वयं ही सशंकित तो नहीं हैं जिस कारण हममें असुरक्षा की भावना आ गई है। यह एक निर्विवाद तथ्य… Read more »

बड़ी अदालत में बड़ा अन्याय

Posted On by & filed under विधि-कानून, विविधा

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आप किसी भी भारतीय भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते। हिंदी का भी नहीं। हिंदी राजभाषा है। यह हिंदी और राज दोनों का मजाक है। यदि आप संसद में भारतीय भाषाओं का प्रयोग कर सकते हैं तो सबसे बड़ी अदालत में क्यों नहीं? सबसे बड़ी अदालत में सबसे बड़ा अन्याय है, यह ! देश के सिर्फ चार उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग हो सकता है- राजस्थान, उप्र, मप्र और बिहार! छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु ने भी स्वभाषा के प्रयोग की मांग कर रखी है।

कमज़ोर नहीं है हिन्दी

Posted On by & filed under विविधा

राघवेन्द्र कुमार ”राघव” हर बार की तरह इस बार भी १४ सितम्बर हिन्दी की याद दिला गया | हिन्दी का विकास हो रहा है , प्रचार – प्रसार में बड़ी -बड़ी बातें कहते हुए नीति नियन्ता, सब कितना अच्छा लगता है | मन को भी यह जानकर सांत्वना मिल जाती है कि वर्ष में एक… Read more »

हमे हिंदी को, आम आदमी के और करीब लाना होगा!

Posted On by & filed under हिंद स्‍वराज

शादाब जफर ‘‘शादाब’’ ‘‘मुझे ये कतई सहन नही होगा कि हिंदुस्तान का एक भी आदमी अपनी मातृभाषा को भूल जाए या इस की हंसी उड़ाए। इस से शरमाए या उसे ऐसा लगे कि वह अपने अच्छे से अच्छे विचार अपनी भाषा में प्रकट नही कर सकता है। कोई भी देश सच्चे अर्थों में तब तक… Read more »

हिंदी लेखन, विचारधारा और इतिहास बोध

Posted On by & filed under महत्वपूर्ण लेख, विविधा

सत्यमित्र दुबे 1 पिछले दो तीन दशकों के हिंदी लेखन पर नजर दौड़ाने से यह बात स्पष्ट होती है कि इसमें पक्षधरता, विचारधारा, इतिहास बोध, कलावाद बनाम जनवाद, व्यक्ति बनाम वर्ग अथवा समाज का सवाल प्रचुर मात्रा में उठाया गया है। पश्चिम के कुछ लेखकों ने जब से इतिहास के अंत, विचारधारा के अंत और… Read more »

हिन्दी किसकी है

Posted On by & filed under विविधा

बीनू भटनागर अजीब सा शीर्षक है,अजीब सा प्रश्न है कि हिन्दी किसकी है। पूरे भारत की,सभी हिन्दी भाषियों की या फिर हिन्दी के गिने चुने विद्वानों की। इसी प्रश्न का उत्तर सोचते सोचते मै अपने विचार लिखने का प्रयास कर रही हूँ। स्वतन्त्रता प्राप्त हुए 64 वर्ष हो चुके हैं,परन्तु हिन्दी को वह सम्मान नहीं… Read more »

हिन्दी के प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों की भूमिका

Posted On by & filed under कविता

राजेश करमहे अक्षर अविनाशी, शब्द ब्रह्म, ध्वनि सृष्टि का स्पंदन, धन्य हो हिन्दी भाषा, नागरी तुझको नमन.   वसुधा कुटुम्ब, अतिथि ईश्वर, परहित जीवन समिधा अर्पण, समृद्ध हो हिन्दी संस्कृति, भारती तेरा चरण वंदन.   सर्वधर्म समभाव युक्त धर्मनिरपेक्ष जीवन दर्शन, धन्य हो भारतमाता, भारतवासी तुझे नमन.   सुनता रहा है विश्व जिसे, करता नत… Read more »

हिन्दी के कालजयी कवियों की रचनाओं का डॉक्‍युमेंटेशन

Posted On by & filed under साहित्‍य

गौतम चौधरी कला व्यक्ति को व्यक्ति बनाता है। कला के बिना व्यक्ति अधूरा है। कला वह मार्ग है जिससे व्यक्ति परम सत्ता तक को आत्मसात कर लेता है। ऐसी उक्तियां आम बोलचाल में कहने सुनने को मिल जाती है। लेकिन इसका साक्षात दर्शन भी हो सकता है। विगत दिनों मैं बडोदरा के प्रवास पर था।… Read more »

हिन्दुस्तान में हिन्दी के प्रचार प्रसार का प्रभावी एवं सशक्त माध्यम – बॉलीवुड एवं दूरदर्शन

Posted On by & filed under सिनेमा

उमेश कुमार यादव आज के तारीख में हिन्दी फिल्म इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि चाहे जो भी भाषा-भाषी हो, हिन्दी फिल्म अवश्य देखते हैं । उनके हिट गानें अवश्य गुनगुनाते हैं, भले ही उसका अर्थ नहीं पता हो । क्योंकि आज लोगों को लगने लगा है कि यदि नाम कमाना है या फिर लोकप्रिय… Read more »