कविता

मन

मन ही मन को जानता,मन को मन से प्रीत।मन ही मनमानी करे,मन ही मन का मीत।मन झूमे,मन बांवरा,मन की है...

नए दौर का धृतराष्ट्र

---विनय कुमार विनायकतुमघृणा के पात्र हो,क्योंकि तुम धृतराष्ट्रहो!तुमने समग्र मानवता ही नहींसमग्रसृष्टि जगत के हिस्सों केस्नेह, प्यार, सहकार को समेटकरअपने...

कभीतुम भारतीय आर्य वैदिक सनातनी थे

---विनय कुमार विनायककभीतुमभारतीय आर्य;वैदिकसनातनी थे,आजतुम जानेक्या से क्या हो गए! कभी तुमगांधार केहिन्दूप्रजा,राजा-रानी थे,आज तुमआतंकवादीअफगानी हो गए! कभी तुमतक्षशिला में...

दुर्योधन-दुशासन तक की नहीं कलाई सूनी थी

---विनय कुमार विनायकआज देश मेंएक बहन के नहीं होने पर,लाखों भाईयों की कलाई सूनी रह जातीआजगर्व नहींहमको अपनी परम्परा परजिसमें...

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