कविता

दर्द भी दिया अपनों ने

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ भी दिया अपनों ने उम्मीद भी अपनों से जाएँ कहा बिना उनके अपने तो अपने होते हैं।   वो दूर चले गए कितने या हम पास न रह पाए कहने को तो बहुत है पर अपने तो अपने होते हैं।   गिला-शिकवा अपनों से  आस लगा के छोड़ देना आख़िर भुलाएँ तो कैसे अपने तो अपने होते हैं।