कविता धुप पर सवार लय April 29, 2013 / April 29, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कहीं से एक लय सुनाई दे रही थी और दूर कहीं एक ताल जैसे उस लय को खोजती हुई तेज गर्मियों की धुप पर सवार होकर अपनें अस्तित्व के इकहरे पन को ख़त्म कर लेना चाहती थी. लय और ताल अपनी इस यात्रा में अपनें अस्तित्व को साथ लिए चलते थे किन्तु उनका ह्रदय […] Read more » धुप पर सवार लय
कविता हास्य व्यंग्य कविता : आरोप और आयोग April 28, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा आरोप और आयोग हमारे महान देश में जब जब घोटाला होता है और हमारे मंत्रियों , नेताओं आदि पर गंभीर आरोप लगाया जाता है तब तब सरकार द्वारा पहले तो इसे बकवास बताया जाता है लेकिन, ज्यादा हो-हल्ला होने पर एक जांच आयोग बैठा दिया जाता है आयोग का कार्यकाल महीनों, सालों का […] Read more » आरोप और आयोग हास्य व्यंग्य कविता
कविता अम्माँ April 28, 2013 / April 28, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment बच्चे ज्यों ज्यों हुये सयाने, चीर पुराने अम्माँ के । खेत हुये बेटों के बस कुछ पानी दाने अम्माँ के । सबसे सुंदर कमरे में माँ बहू बनी दर्पण तकतीँ बङी बहू के आते छिन गये ठौर ठिकाने अम्माँ के । पूछ पूछ कर अम्माँ से बाबूजी ईँटें चिनवाते । आँगन में […] Read more » अम्माँ
कविता वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा April 22, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा मेरी तंग उदास गलियों में बिछे घनान्धकार ने अकस्मात जाना पूर्णिमा का चाँद इतना सौम्य, इतना संपन्न क्यूँ है ? मात्र तुम्हारे आने से मेरा संसार इतना दीप्तिमान क्यूँ है ? वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा […] Read more » वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा
कविता राजेन्द्र सारथी के दोहे April 17, 2013 / April 17, 2013 by राजेन्द्र सारथी | Leave a Comment शहरों में वे आ गये, बेच गांव के खेत। धन धूएं – सा उड़ गया, ख्वाब बन गए प्रेत। नए दौर में हो गए, खंडित सभी उसूल। जो जितना समरथ हुआ, उतना वह मकबूल। परिवर्तित इस जगत में, होती है हर चीज। अजर-अमर कोई नहीं, हर गुण जाता छीज। उन्नत वही […] Read more »
कविता कविता -जवान और किसान April 17, 2013 / April 17, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा हरा भरा खेत खलिहान फिर भी निर्धन क्यों हमारे किसान ? देश में नहीं पानी की कमी फिर भी क्यों रहती है सूखी यहाँ – वहाँ की जमीं ? जिसे देखना है वो देखें […] Read more »
कविता इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो ! April 16, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment उस कठोर कठिन श्राप-सी शाम के बाद भी मेरे ख़यालों में स्वर-लहरी बनी कितनी सरलता से चली आती हो, पर जब भी आती हो तुम… तुम इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो ? हर प्रात व्यथित, हर शाम उदास, साँसों के तारों को मानो […] Read more » इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो !
कविता शहर April 16, 2013 / April 16, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” जब गाय मिले चौराहों पर कुत्ता बैठा हो कारों में । तब ये आप समझ जाना कोई शहर आ गया । टकराकर तुमसे जवां मर्द बोले क्या दिखता तुम्हें नहीं । तभी वृद्ध दादा जी बोलें सॉरी बेटे दिखा नहीं । बस इतने से ही जान लेना कोई शहर आ गया ।। […] Read more » शहर
कविता झिरिया April 12, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment झंकृत होती दुनियावीं कामनाओं के स्वर और अपुष्ट अप्रकटित कुछ पुरानी इक्छायें, ढूँढते हुए अपनें मूर्त आकार को आ गईं थी इस गली के मुहानें तक। अपनें दबें कुचलें रूप के साथ कुछ उपलब्धियों का असहज बोझ उठायें उन सब का गली से अन्तरंग होना और उससे तारतम्य में हो लेना एक रूपक ही […] Read more »
कविता पवन पाण्डेय की कविता April 10, 2013 / April 10, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment अमूर्त और निःशब्द परम शांति तुम्हारे प्रेरक हैं प्रियवर समय के मूढ़ कोलाहल का हैं यह शमन? क्या एक त्वरित उपाय? या छद्म अहम् का मायाजाल? भई, मैं तो उस कवि का सजल-उल शिष्य हूँ जिसे नहीं चाहिए शांति उसे चाहिए क्रांति मुझे चाहिए संवेदना विस्तीर्ण नहीं चाहिए भाषा-प्रावीण्य चाहिए एक खगोलीय ककहरा […] Read more » अमूर्त
कविता दूरियों का दर्द April 9, 2013 / April 9, 2013 by विजय निकोर | 1 Comment on दूरियों का दर्द यही खयाल आता रहा, हम उसे ठेलते रहे, वह लौट आता रहा, आपके बहुत, बहुत पास थे हम, अब आपके कहने पर आपसे कुछ दूर हुए, पर रहा न गया, फिर कुछ पास, फिर आपसे दूर हुए। यह प्रयास साँसों के आने-जाने-सा तब से चलता रहा, बस, चलता रहा। कौन किस सरलता को सह न सका, […] Read more » दूरियों का दर्द
कविता मिथ्या ही सोचा करता हूँ April 7, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment अपूर्व जैन मिथ्या ही सोचा करता हूँ अपने को कोसा करता हूँ कुछ है बेचैनी, कुछ तो दर्द छुपा है ना जाने क्यूँ अब सपने बुनने से डरता हूँ …………………… पथ की गोलाई मैं जैसे भटक गया हूँ अपनी परछाई का ही पीछा करता हूँ समझ नहीं है बाहर कैसे आऊँ, ये हाल किसे […] Read more »