कविता कविता -जवान और किसान April 17, 2013 / April 17, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा हरा भरा खेत खलिहान फिर भी निर्धन क्यों हमारे किसान ? देश में नहीं पानी की कमी फिर भी क्यों रहती है सूखी यहाँ – वहाँ की जमीं ? जिसे देखना है वो देखें […] Read more »
कविता इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो ! April 16, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment उस कठोर कठिन श्राप-सी शाम के बाद भी मेरे ख़यालों में स्वर-लहरी बनी कितनी सरलता से चली आती हो, पर जब भी आती हो तुम… तुम इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो ? हर प्रात व्यथित, हर शाम उदास, साँसों के तारों को मानो […] Read more » इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो !
कविता शहर April 16, 2013 / April 16, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” जब गाय मिले चौराहों पर कुत्ता बैठा हो कारों में । तब ये आप समझ जाना कोई शहर आ गया । टकराकर तुमसे जवां मर्द बोले क्या दिखता तुम्हें नहीं । तभी वृद्ध दादा जी बोलें सॉरी बेटे दिखा नहीं । बस इतने से ही जान लेना कोई शहर आ गया ।। […] Read more » शहर
कविता झिरिया April 12, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment झंकृत होती दुनियावीं कामनाओं के स्वर और अपुष्ट अप्रकटित कुछ पुरानी इक्छायें, ढूँढते हुए अपनें मूर्त आकार को आ गईं थी इस गली के मुहानें तक। अपनें दबें कुचलें रूप के साथ कुछ उपलब्धियों का असहज बोझ उठायें उन सब का गली से अन्तरंग होना और उससे तारतम्य में हो लेना एक रूपक ही […] Read more »
कविता पवन पाण्डेय की कविता April 10, 2013 / April 10, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment अमूर्त और निःशब्द परम शांति तुम्हारे प्रेरक हैं प्रियवर समय के मूढ़ कोलाहल का हैं यह शमन? क्या एक त्वरित उपाय? या छद्म अहम् का मायाजाल? भई, मैं तो उस कवि का सजल-उल शिष्य हूँ जिसे नहीं चाहिए शांति उसे चाहिए क्रांति मुझे चाहिए संवेदना विस्तीर्ण नहीं चाहिए भाषा-प्रावीण्य चाहिए एक खगोलीय ककहरा […] Read more » अमूर्त
कविता दूरियों का दर्द April 9, 2013 / April 9, 2013 by विजय निकोर | 1 Comment on दूरियों का दर्द यही खयाल आता रहा, हम उसे ठेलते रहे, वह लौट आता रहा, आपके बहुत, बहुत पास थे हम, अब आपके कहने पर आपसे कुछ दूर हुए, पर रहा न गया, फिर कुछ पास, फिर आपसे दूर हुए। यह प्रयास साँसों के आने-जाने-सा तब से चलता रहा, बस, चलता रहा। कौन किस सरलता को सह न सका, […] Read more » दूरियों का दर्द
कविता मिथ्या ही सोचा करता हूँ April 7, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment अपूर्व जैन मिथ्या ही सोचा करता हूँ अपने को कोसा करता हूँ कुछ है बेचैनी, कुछ तो दर्द छुपा है ना जाने क्यूँ अब सपने बुनने से डरता हूँ …………………… पथ की गोलाई मैं जैसे भटक गया हूँ अपनी परछाई का ही पीछा करता हूँ समझ नहीं है बाहर कैसे आऊँ, ये हाल किसे […] Read more »
कविता विरत करते घनेरें वन April 7, 2013 / April 7, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कही कुछ था जो घट रहा था सतत, निरंतर। अहर्निश चल रहीं श्वासों में सतत उपजतें जा रहें थे कुछ घनेरें वन किन्तु जीवन की अविरलता में उन अनचाहें उपजें वनों को देखना उन वनों के निर्ब्रह्म रूप के साथ एकाकार हो जानें जैसा होता था। निरंजन रूपों में अवतरित होतें वे घनेरें वन बहुत […] Read more »
कविता कविता – यही हमारा जीवन है April 7, 2013 / April 7, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment यही हमारा जीवन है सोते-जागते रहने के बीच कुछ सहेजा गया अक्षर कुलांचें भरती बेटी आँगन में रंभाती गाय दीया-बाती दिखाती माँ उसकी मनोवेग प्रार्थना यही हमारा जीवन है । वही सड़कों की धूल धकमपेल से बचता भीड़ आगे और आगे चलते चले जाने की होड़ धकियाते चले जाने की जिद अंधेरे में डिबरी की […] Read more »
कविता क्या होता है रमतूला April 4, 2013 / April 4, 2013 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 4 Comments on क्या होता है रमतूला प्रभुदयाल श्रीवास्तव मम्मी मुझको नहीं खेलने, देती है अब घर घूला| न ही मुझे बनाने देती ,गोबर मिट्टी का चूल्हा| गपई समुद्दर क्या होता है,नहीं जानता अब कोई| गिल्ली डंडे का टुल्ला तो, बचपन बिल्कुल ही भूला| अब तो सावन खेल रहा है ,रात और दिन टी वी से| आम नीम की डालों पर अब, […] Read more »
कविता .मैं उनसे होली खेलूं April 2, 2013 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment होली का पावन त्यौहार, बरसे उमंगों की फौहार। मेरा मन कहता है, मैं किससे होली खेलूं।। क्या उनसे जो ऊपर से हंसते हैं, और भीतर से खंजर कसते हैं? क्या उनसे जो दारू का भंगड़ा करते हैं, और भीतर से ईष्र्या भाव से जले मरते हैं? क्या उनसे जो गले मिलकर भी नही मिलते, और […] Read more » .मैं उनसे होली खेलूं
कविता वेदों का उपदेश यही April 2, 2013 / April 2, 2013 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment क्या आज कोई जगाएगा सचमुच मेरे मन का फाग। और देगा मुझे वो परिवेश जिसे कहूं मैं निज सौभाग्य।। सचमुच मैं रूष्ट हूं, असंतुष्ट हूं पर थका नही हूं। चरेवैति-चरेवैति कहता हूं पर अभी रूका नही हूं।। मंजिलें मेरी मोहताज हैं मैं मंजिलों का मोहताज नही, मैं सच कहता हूं ऐ दोस्तो जो कल था […] Read more » वेदों का उपदेश यही