कविता आर. सिंह की कविता/दान वीर May 12, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment मर रहा था वह भूख से, आ गया तुम्हारे सामने. तुमको दया आ गयी.(सचमुच?) तुमने फेंका एक टुकड़ा रोटी का. रोटी का एक टुकड़ा? फेंकते ही तुम अपने को महान समझने लगे. तुमको लगा तुम तो विधाता हो गये. मरणासन्न को जिन्दगी जो दे दी. मैं कहूं यह भूल है तुम्हारी, तुम्हारे पास इतना समय […] Read more »
कविता आर. सिंह की कविता/स्वप्न भंग May 11, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment मत कहो मुझे बोलने को. मेरे मुख से फूल तो कभी झड़े नहीं, पर एक समय था जब निकलते थे अंगारे. एक आग थी, जो धधकती थी सीने के अंदर. एक स्वप्न था, जो करता था उद्वेलित मष्तिष्क को. एक लगन थी, कुछ कर गुजरने की. लगता था, क्यों पनपे वह सब जो नहीं है […] Read more »
कविता कविता/ माँ की मुस्कान … May 10, 2011 / December 13, 2011 by हितेश शुक्ला | 5 Comments on कविता/ माँ की मुस्कान … { माँ को समर्पित… हितेश शुक्ला } आप खुश हो तो मुझे ख़ुशी मिलती है ! जैसे मरुस्थल में नदी मिलती है !! आपकी ख़ुशी मेरा मनोबल बढाती है ! आपकी ख़ुशी मंजिल पाने की चाह जगाती है !! आपकी मुस्कान दुःख मे सुख का आभास करवाती है !! आपकी ख़ुशी जीत की […] Read more » मां
कविता वह May 1, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment जब मैं सोकर उठता हूँ प्रातः तडके. अलार्म की आवाज सुनकर. पहला ध्यान जाता है इस ओर. वह आयेगी या नही? मैं जल्दी जल्दी तैयार होता हूँ, नित्य क्रिया से निपट कर. दाढी बनाकर,चेहरे का साबुन पोंछ कर, देखता हूँ आइने में. पर ध्यान तो वही लगा रहता है, वह आयेगी या नहीं. इसके बाद […] Read more »
कविता प्रिय अपनी बाहों में भर लो। May 1, 2011 / December 13, 2011 by जगदम्बा प्रसाद गुप्ता ”जगत” | 1 Comment on प्रिय अपनी बाहों में भर लो। विप्रलम्ब तन शीतल मन शीतल कर दो, प्रिय अपनी बाहों में भर लो। ————————————— मंद हवाओं का ये झौंका, आंचल को सहलाता हैं। ————————————— पुष्पों की सुरभित मादकता, तन में आग लगाता है। ————————————— मिलने की उत्कंठा दिल में, धड़कन और ब़ाता है। ————————————— तेरे आने की हर आहट, मन में आस जगाता है। […] Read more »
कविता कविता/ हाथी का दांत April 23, 2011 / December 13, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment एक दिन वो मिली रास्ते में अपनी भतीजी के साथ जिसे मैंने पढाई छोड़ते वक्त ‘कृष्णकली’ भेंट की थी. मेरा परिचय उससे उसने दिया ”बेटा ये मेरे साथ पढ़ें हैं”. भतीजी तीन-चार साल की समझ ना पाई कि साथ पढ़े होना कौन सा रिश्ता है. वो पूछ बैठी उससे […] Read more »
कविता कविता / स्रष्टा की भूल April 19, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment भगवन, क्यों बनाया तुमने मुझको आदमी ? क्या किया मैंने बनकर आदमी ? क्या क्या सपने देखे थे भगवन ने ? मेरे शैशव काल में. सृष्टि का नियामत था मैं. स्रष्टा का गर्व था मैं. कितने प्रसन्न थे तुम] जिस दिन बनाया था तुमने मुझे. सोचा था तुमने] तुम्हारा ही रूप बनूंगा मैं] प्रशस्त करुंगा […] Read more »
कविता कविता/ वतन छोड़ परदेस को भागते April 13, 2011 / December 14, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 3 Comments on कविता/ वतन छोड़ परदेस को भागते देश पूछेगा हमसे कभी न कभी, जब थी मजबूरियाँ, उसने पाला हमें हम थे कमज़ोर जब, तो सम्भाला हमें परवरिश की हमारी बड़े ध्यान से हम थे बिखरे तो सांचे में ढाला हमें बन गए हम जो काबिल तो मुंह खोल कर कोसने लग गए क्यों इसी देश को? देश के धन का, सुविधा का […] Read more »
कविता निगाहें April 13, 2011 / December 14, 2011 by अंकुर विजयवर्गीय | 1 Comment on निगाहें स्टेशन की सीढियां चढ़ते हुए हर रोज़ रास्ता रोक लेती हैं कुछ निगाहें अजीब से सवाल करती हैं और मैं नज़रें बचाते हुए हर बार की तरह आगे बढ़ जाता हूं ऐसा लगता है जैसे एक बार फिर ईमान गिरवी रख कर भी अपना सब कुछ बेच आया हूं और किसलिए चंद सिक्कों की खातिर […] Read more »
कविता आर. सिंह की कविता/ नाली के कीडे़ April 2, 2011 / December 14, 2011 by आर. सिंह | 6 Comments on आर. सिंह की कविता/ नाली के कीडे़ भोर की बेला थी लालिमा से ओत प्रोत हो रहा था धरती और आकाश और मैं टहल रहा था उपवन में हृदय था प्रफुल्लित स्वप्न संसार में भटकता हुआ आ जा रहे थे एक से एक विचार टूटी शृंखला विचारों की जब मैं बाहर आया उपवन के दो घंटों बाद देखा मेरा बेटा सुकोमल छोटा […] Read more »
कविता कविता/ मैं भावनाओं में बह गया था April 2, 2011 / December 14, 2011 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | 6 Comments on कविता/ मैं भावनाओं में बह गया था मैं भावनाओं में बह गया था मुझे नहीं मालूम ऊंच -नीच मेरे पास पढाई की डिग्री नहीं है मैं अनपढ़ हूँ मुझे क्या पता यहाँ डिग्री की जरुरत होती है मैं अनपढ़ हूँ डिग्री धारी होता तो गरीबों का पेट काटता , खून चूसता देश को गर्त में ले जाता बड़े -बड़े घोटाले और मजलूमों […] Read more »
कविता वो भोली गांवली March 26, 2011 / December 14, 2011 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | 2 Comments on वो भोली गांवली जलती हुई दीप बुझने को ब्याकुल है लालिमा कुछ मद्धम सी पड़ गई है आँखों में अँधेरा सा छाने लगा है उनकी मीठी हंसी गुनगुनाने की आवाज बंद कमरे में कुछ प्रश्न लिए लांघना चाहती है कुछ बोलना चाहती है संम्भावना ! एक नव स्वपन की मन में संजोये अंधेरे को चीरते हुए , मन […] Read more »