आर. सिंह की कविता/ नाली के कीडे़

भोर की बेला थी

लालिमा से ओत प्रोत हो रहा था

धरती और आकाश

और मैं

टहल रहा था उपवन में

हृदय था प्रफुल्लित

स्वप्न संसार में भटकता हुआ

आ जा रहे थे एक से एक विचार

टूटी शृंखला विचारों की

जब मैं बाहर आया उपवन के

दो घंटों बाद

देखा मेरा बेटा

सुकोमल छोटा

खेल रहा था

गली के बच्चों के साथ

खेल-खेल में पकड़ लिया था उन लोगों ने

नाली के कुछ कीड़ों को

दिखा रहे थे वे मुझे

और फिर

डाल दिया था उन नन्हें मुन्नों ने

नाली के उन कीड़ों को

गन्दी नालीं मे रहने वालों को

स्वच्छ जल के एक पात्र में

और देख रहे थे तमाशा

पर नहीं चला तमाशा देर तक

मर गये थे वे कीडे़ तड़प-तड़प कर

उस स्वच्छ जल में

जल जो जीवन है

स्‍वच्छता जो स्वर्गीय है

बन गयी थी काल उन कीड़ों के लिये

उन कीड़ों के लिये

जो खुश थे

उठा रहे थे लुफ्त जिन्दगी का

जब तक पडे़ थे वे उन नालियों में

जो भरपूर था गन्दगी से

व्‍याप्त था दुर्गंध से

नहीं सह सके वे सफाई

नहीं सह सके वे स्वच्छता

सफाई जो, स्वच्छता जो प्रतीक है जीवन का

बन गयी मौत का कारण उनके लिये

विचार आया

हम भी कहीं, वहीं नाली के कीडे़ तो नहीं

जी रहे हैं गन्दगी में

तन की गन्दगी, मन की गन्दगी

सांस ले रहे हैं दुषित वायु में

और प्रसन्न हैं

कहीं मौत हमारी भी तो नहीं हो जायेगी

जब हम बढेंगे स्वच्छता की ओर

सादगी और सत्यता की ओर.

 

6 thoughts on “आर. सिंह की कविता/ नाली के कीडे़

  1. Thanks. Singh Saheb. Aapane anek arthon vali kavita likh di.
    Har koi apna apna arth lagaa le.
    Maza aa gaya.
    Ab pata chala aap “naali ke kide” Shabd prayog kaise aur kyon
    karate rahate hain.
    kshama karen chahate hue bhi is sanganak par devanagri nahin likhi jaa rahi.
    Dirgh Prvas par hun,
    Cut paste bhi nahin ho raha.

    1. डाक्टर साहब उत्साहवर्द्धन के लिए बहुत धन्यवाद.

  2. प्रस्तुत रचना बहुत पहले लिखी गयी थी.इसे प्रकाश में आए हुए भी तीन वर्ष होने जा रहे हैं आज अचानक मुझे इसकी याद आ गयी, कारण है हमारा यथास्थिति से चिपके रहने का स्वभाव हम क्यों किसी भी नयी भावना ,नई विचार धारा को महत्व नहीं देते? हो सकता है,वह नई विचारधारा क्रांतिकारी नहीं सिद्ध हो,पर उसको एक सिरे से क्यों नकारा जाए?

  3. एन.सिंह जी, मैने एैसे तो किसी भी रचना पर टिप्पणी करनी छोड दी है,पर जब आपने मेरी ही रचना पर सुझाव मांगा तो मुझे कुछ तो कहना ही पडेगा.यह रचना एैसे काफी पुरानी है और शायद पंद्रह या बीस वर्ष पहले लिखी गयी थी.प्रथम कुछ पंक्तियां तो भूमिका मात्र हैं.बाद की पंक्तियों में केवल यही दर्शाने की चेष्टा की गयी है कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से गंदे होते हुये भी अपनी वर्तमान दशा से सन्तुष्ट नजर आते हैं ओोर उसमें परिवर्तन नही चाहते,यह चिन्ता का विषय है.

  4. Singh ji aapaki kavita ka antim bhag pratham bhag se alag disha darshata hai. Aapaki kavita ka vastvik sar samaj ke vibhajan ore usake jeevan star ko bhali bhanti darshata hai. Yadi mere vichar aapaki kavita ke vicharon se alag hon to please sujhav avasya dena.

  5. कविता/ नाली के कीडे़ by आर. सिंह

    विचार आ रहा है कि 2G spectrum घोटाले में ८०,००० पन्ने का, शनिवार को, पतियाला हाउस दिल्ली अदालत में, आरोप पत्र दाखिल होने से, देश में गन्दगी घटेगी और इस कारण दुषित वायु स्वच्छ होने से, श्री राजा और साथियों का दम घुटेगा; परन्तु साथ ही भगवान् से प्रार्थना है कि उनको दीर्घ आयु प्रदान करें.

    – अनिल सहगल –
    ————————————————-
    कविता का कुछ भाग
    हम भी कहीं, वहीं नाली के कीडे़ तो नहीं
    जी रहे हैं गन्दगी में
    तन की गन्दगी, मन की गन्दगी
    सांस ले रहे हैं दुषित वायु में
    और प्रसन्न हैं
    कहीं मौत हमारी भी तो नहीं हो जायेगी
    जब हम बढेंगे स्वच्छता की ओर
    सादगी और सत्यता की ओर.

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