लेख वायु प्रदूषण से होती लाखों मौतों के लिये कौन जिम्मेदार? June 25, 2024 / June 25, 2024 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ललित गर्ग-कहते हैं जान है तो जहान है, लेकिन भारत में बढ़ते प्रदूषण के कारण जान और जहान दोनों ही खतरे में हैं। देश की हवा में घुलते प्रदूषण का ‘जहर’ अनेक बार खतरनाक स्थिति में पहुंच जाना चिन्ता का बड़ा कारण हैं। प्रदूषण की अनेक बंदिशों एवं हिदायतों के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण की बात […] Read more » Who is responsible for millions of deaths due to air pollution?
आर्थिकी लेख पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पन्न होने वाले खतरों को डॉहेडगेवार ने पहिचान लिया था June 24, 2024 / June 24, 2024 by प्रह्लाद सबनानी | Leave a Comment आज पूरे विश्व में पूंजीवाद की तूती बोल रही है। लगभग समस्त देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पूंजीवाद के सिद्धांत के आधार पर चला रहे हैं। मुक्त बाजार अथवा मुक्त उद्यम प्रणाली पूंजीवाद का दूसरा नाम है, जो उत्पादक संसाधनों पर निजी स्वामित्व के हक को मानते हुए देश में आर्थिक विकास को गति देने की नीति को अपनाती है। पूंजीवादी सिद्धांत के जनक कहे जाने वाले एडम स्मिथ का कहना था कि अर्थव्यवस्था में अधिक से अधिक धनकुबेर पैदा होने चाहिए, इससे अंततः वह देश विकसित देश की श्रेणी में शामिल हो सकता है। अतः देश में धनकुबेर पैदा करने में शासन द्वारा आर्थिक नीतियों को उद्योगपतियों के हित में बनाया जाना चाहिए। इस सम्बंध में एडम स्मिथ ने “वेल्थ आफ नेशन” नामक सिद्धांत भी प्रतिपादित किया था, जिसमें यह कहा गया था कि बाजार को चलाने में किसी अदृश्य शक्ति की भूमिका होती है। इस अदृश्य शक्ति में शासन की नीतियों को भी शामिल किया जा सकता है। पूंजीवादी सिद्धांत पर आधारित आर्थिक नीतियों को अमेरिका में बहुत उत्साहपूर्वक लागू किया गया था। 1950 के दशक के बाद अमेरिका में इन सिद्धांतों के अनुपालन के पश्चात अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विकास दर बहुत तेजी से आगे बढ़ी और शीघ्र ही अमेरिका विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हो गया था। हालांकि, इस आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप देश में आर्थिक असमानता भी उतनी ही तेज गति से बढ़ती है क्योंकि देश में आर्थिक नीतियों को एक वर्ग विशेष को आगे बढ़ाने की दृष्टि से विकसित किया जाता है, इससे अमीर और अधिक अमीर होते चले जाते हैं एवं गरीब और अधिक गरीब होते चले जाते हैं । विश्व में साम्राज्यवाद का सिद्धांत सबसे पुराना माना जाता है। शक्ति एवं प्रभुत्व बढ़ाने की राज्य की नीति मानी जाती रही है और इसकी समय समय पर वकालत भी की जाती रही है। कुछ क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष रूप से अधिग्रहण करके एवं कुछ क्षेत्रों पर राजनैतिक एवं आर्थिक नियंत्रण करके कुछ राज्य अपने वर्चस्व को बढ़ाते रहे हैं। ब्रिटिश शासन ने भी इसी सिद्धांत का अनुसरण करते हुए दुनिया के कई देशों पर अपना राज्य कायम कर लिया था। इस सिद्धांत के अनुपालन से भी जिन राज्यों पर सत्ता स्थापित की जाती है उन राज्यों के नागरिकों को दोयम दर्जे का नागरिक बना लिया जाता है और उनका शोषण किया जाता है। इस शासन प्रणाली में भी गरीब और अधिक गरीब हो जाते हैं और राज्य करने वाले देश के नागरिक शोषित राज्यों के संसाधनों का अति शोषण करते हुए इन्हें अपने हित में उपयोग करते हैं और वे स्वयं अमीर से और अधिक अमीर बनते चले जाते हैं। पूंजीवाद के सिद्धांतों का अनुपालन करने वाले कुछ देशों, विशेष रूप से अमेरिका के विकसित देश हो जाने के पश्चात, ने भी बाद के समय में साम्राज्यवाद का चोला पहिन लिया था। इन पूंजीवादी देशों ने छोटे छोटे गरीब देशों के संसाधनों पर व्यापार के माध्यम से अपना हक जताना प्रारम्भ कर दिया था। शोषण करने वालों के केवल नाम बदल गए थे, क्योंकि राज्यों के स्थान पर अब पूंजीपति इन देशों के नागरिकों एवं संसाधनों का शोषण करने लगे थे। एक तरह से पूंजीवाद स्वयं ही राजा बन बैठा। वैसे भी पूंजीवाद के सिद्धांतों के आधार पर चलने वाली अर्थव्यवस्था में येन केन प्रकारेण लाभ कमाना ही मुख्य लक्ष्य होता है, चाहे इसके लिए किसी वर्ग अथवा देश का शोषण ही क्यों न करना पड़े। एक आर्थिक प्रणाली के रूप में पूंजीवाद की उत्पत्ति 16वीं शताब्दी में मानी जा सकती है। इंग्लैंड में 16वीं से 18वीं शताब्दी तक, कपड़ा उद्योग जैसे बड़े उद्यमों के औद्योगिकीकरण ने एक ऐसी प्रणाली को जन्म दिया जिसमें उत्पादकता बढ़ाने के लिए संचित पूंजी का निवेश किया गया और उद्योगपतियों ने मजदूरों का शोषण प्रारम्भ कर अधिक लाभ अर्जित करना प्रारम्भ किया। इस प्रकार किसी एक व्यक्ति को पूंजीवाद का आविष्कार करने वाला नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि पूर्ववर्ती पूंजीवादी प्रणालियां प्राचीन काल से ही अस्तित्व में थीं। चूंकि पूंजीवादी सिद्धांतों के अनुपालन में कुछ देश तेजी से विकास कर रहे थे एवं कुछ अन्य देशों का अति शोषण हो रहा था और पूंजीवाद एक तरह से विश्व के कई देशों में फैल रहा था अतः पूंजीवाद के साम्राज्यवाद के पद चिन्हों पर आगे बढ़ने के कारण डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1920 में नागपुर में आहूत किए जाने वाले कांग्रेस के अधिवेशन में प्रस्ताव समिति के सामने एक प्रस्ताव रखने का प्रयास किया था। इस प्रस्ताव में दो विषयों का उल्लेख किया गया था। एक, कांग्रेस को यह वादा करना चाहिए कि वह अंग्रेजों से भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के नीचे कुछ भी स्वीकार नहीं करेगी और दूसरे, पूरे विश्व को पूंजीवादी नीतियों से मुक्ति दिलायी जाएगी। परंतु, दुःख का विषय है कि उस समय के कांग्रेस के नेताओं ने डॉक्टर हेडगेवार के उक्त प्रस्ताव को प्रस्ताव समिति से आगे बढ़ने ही नहीं दिया एवं यह प्रस्ताव कांग्रेस अधिवेशन में भी प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इस प्रकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय प्रथम संघचालक डॉक्टर हेडगेवार ने वर्ष 1920 के पूर्व ही पूंजीवाद से उत्पन्न होने वाले खतरों को पहचान लिया था तथा वे पूंजीवाद की आड़ में विश्व में फैल रहे साम्राज्यवादी नीतियों के भी घोर विरोधी थे। साम्राज्यवादी नीतियों के अंतर्गत कुछ पूंजीवादी देश, विश्व के अन्य गरीब देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। ब्रिटेन ने भी भारत पर ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से ही आधिपत्य स्थापित किया था। शुरुआती दौर में तो ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कम्पनी भी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से ही आई थी। परंतु, बाद का खंडकाल गवाह है कि किस प्रकार भारत के संसाधनों का ब्रिटेन के हित में उपयोग किया गया। अति तो तब हुई जब ब्रिटेन ने भारत के हथकरघा उद्योग को ही तबाह कर दिया। भारत में सस्ती दरों पर कपास खरीद कर वे ब्रिटेन ले जाने लगे एवं ब्रिटेन में कपड़ा मिलों की स्थापना की गई ताकि इस कच्चे माल (कपास) से कपड़ों का निर्माण किया जा सके एवं ब्रिटेन में रोजगार के अवसर निर्मित हो सकें। इस कपड़े को वापिस भारत में लाया जाकर भारतीय जनता को उच्च दरों पर बेचा जाने लगा। भारत से कच्चा माल (कपास) ले जाकर, भारत में ही ब्रिटेन में तैयार उत्पाद (कपड़ा) बेचा जाने लगा, अतः भारत को एक बाजार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा था। पूंजीवाद के नाम पर इस प्रकार की व्यवस्था खड़ी की गई और ब्रिटेन ने स्पष्ट रूप से भारत को लूटा। एक अनुसंधान प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि अंग्रेजों ने भारत पर अपने शासनकाल के दौरान लगभग 45 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की खुली लूट की थी एवं यह धन वह ब्रिटेन में ले गए थे। उस खंडकाल में पूंजीवाद के नाम पर अपनी साम्राज्यवादी नीतियों को लागू कर विकसित देशों ने गरीब देशों पर न केवल अपना शासन स्थापित किया था बल्कि इन गरीब देशों को जमकर लूटा भी गया था। ब्रिटेन के बारे में तो यह भी कहा जाता है उन्होंने अपने साम्राज्य को विश्व के कई देशों में इस प्रकार फैला लिया था कि ब्रिटेन के साम्राज्य का 24 घंटे में कभी सूरज ही नहीं डूबता था। उक्त कारणों के चलते ही परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार ने विश्व के देशों को पूंजीवाद की जकड़ से बाहर निकालने का प्रयास वर्ष 1920 में किया था। प्रहलाद सबनानी Read more »
लेख विधि-कानून यह है क़ानून का राज : हम कब करेंगे आत्मावलोकन ? June 24, 2024 / June 24, 2024 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफ़री स्विट्ज़रलैंड की एक अदालत ने ब्रिटेन के सबसे अमीर भारतीयों में गिने जाने वाले भारतीय मूल के हिंदुजा परिवार के चार सदस्यों को अपने नौकरों के शोषण के मामले में दोषी क़रार देते हुए उन्हें चार से साढ़े चार वर्ष तक की कारागार की सज़ा सुनाई है। स्विस प्रशासन इस परिवार द्वारा अपने नौकरों […] Read more » क़ानून का राज
लेख समाज शहर भी तरस रहा है पानी के लिए June 24, 2024 / June 24, 2024 by चरखा फिचर्स | Leave a Comment दिनेश कुमारजयपुर, राजस्थानदेश में लगातार बढ़ते तापमान के साथ ही पीने के पानी की समस्या भी बढ़ी है. इससे राजधानी दिल्ली और अन्य महानगर भी अछूते नहीं हैं. ऐसी स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी इलाकों में आबाद कच्ची बस्तियों के हालात को बखूबी समझा जा सकता है. जहां आज भी पीने के साफ पानी के […] Read more » The city is also yearning for water
लेख स्वास्थ्य-योग तन के साथ मन को भी स्वस्थ रखता है योग June 20, 2024 / June 20, 2024 by योगेश कुमार गोयल | Leave a Comment अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर विशेष– योगेश कुमार गोयलप्रतिवर्ष 21 जून को दुनियाभर के 170 से भी ज्यादा देश अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाते हैं और योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का संकल्प लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखे […] Read more » अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून)
लेख स्वास्थ्य-योग महिलाओं को एकता के सूत्र में पिरोता है योग June 20, 2024 / June 20, 2024 by डॉ शंकर सुवन सिंह | Leave a Comment डॉ. शंकर सुवन सिंह नारी राष्ट्र का अभिमान है। नारी राष्ट्र के विकास की नींव है। नारी सृष्टि की सुंदरता का अनमोल उपहार है। संस्कृत में एक श्लोक है- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। अर्थात्, नारी की पूजा जहां होती है, वहां देवता निवास करते हैं। भारतीय संस्कृति में नारी के आदर को महत्व […] Read more » एकता के सूत्र में पिरोता है योग
लेख स्वास्थ्य-योग विवाह के बाद आत्महत्या करने की प्रवृत्ति को होम्योपैथिक दवाइयों से बदलें June 19, 2024 / June 19, 2024 by डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' | Leave a Comment लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणापिछल 5 महीना के दौरान 1 दर्जन से अधिक ऐसे मामले मेरी निजी जानकारी में आये हैं, जिनमें विवाह के 1 से 3 महीना के अंदर नव विवाहिताओं ने आत्महत्या करके अपने जीवन को समाप्त कर लिया है। नवविवाहिताओं की आत्महत्या की प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक और मानसिक समस्या है। इसे […] Read more »
लेख समाज योग सशक्त माध्यम है महिला सशक्तीकरण एवं शांति का June 19, 2024 / June 19, 2024 by ललित गर्ग | Leave a Comment अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, 2024 पर विशेष– ललित गर्ग –मनुष्य के सम्मुख युद्ध, महामारी, महंगाई, बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा के कारण जीवन का संकट खड़ा है। मानसिक संतुलन अस्त-व्यस्त हो रहा है। मानसिक संतुलन का अर्थ है विभिन्न परिस्थितियों में तालमेल स्थापित करना, जिसका सशक्त एवं प्रभावी माध्यम योग ही है। योग एक ऐसी तकनीक है, […] Read more » Yoga is a powerful medium for women empowerment and peace अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस
लेख भीषण गर्मी से खुला काम करने वाले मजदूरों को सबसे ज्यादा नुकसान क्यों ? June 19, 2024 / June 19, 2024 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment भारत में हाल ही में आई भीषण गर्मी से डेली वर्कर्स, विशेषकर डिलीवरी कर्मियों, ईंट-भट्ठों पर काम करने वालों और दिहाड़ीदार मजदूरों के लिए कामकाजी परिस्थितियां गंभीर हो गई हैं। भीषण गर्मी ने खुला काम करने वाले वर्कर्स के लिए कठोर कार्य स्थितियों और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर किया है। इस भीषण […] Read more » Why do laborers working outdoors suffer the most from the scorching heat?
लेख आधुनिक होते आंगनबाड़ी केंद्रों में सुविधाओं की कमी June 19, 2024 / June 19, 2024 by चरखा फिचर्स | Leave a Comment भारती सुथारबीकानेर, राजस्थान इस माह के पहले सप्ताह में राजस्थान के गृह सचिव ने महिला एवं बाल विकास विभाग की समीक्षा बैठक में राज्य के सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को स्मार्टफोन या टैबलेट उपलब्ध कराने का निर्देश जारी किया है ताकि केंद्र के कामों की ऑनलाइन मॉनेटरिंग की जा सके. इससे आंगनबाड़ी केंद्र में आने वाले बच्चों और उनके स्वास्थ्य […] Read more » Lack of facilities in modernized Anganwadi centers
लेख भारतीय धर्म और मन्दिर June 18, 2024 / June 18, 2024 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment भारतीय संस्कृति व धर्म में मन्दिरों को सदा से ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, मन्दिर धर्म के आधारभूत अंगो में सदा से ही विद्यमान हैं। सनातन धर्म में वृक्ष, वन भी मन्दिर हैं यहाँ तक कि मानव शरीर को भी मन्दिर के सदृश माना गया है; परन्तु दुर्भाग्यवश भारतीय संस्कृति के आधारभूत अंग मन्दिरों को आज सोशल मीडिया से मस्त भारतवासी मान्दरों को सेल्फी पॉइट व नाच-गान करके रील बनाने में व्यक्त हैं, और मन्दिरों को धूमिल करने मे लगे हुये हैं, इन भारतवासियों ने नाट्य-शास्त्र को भी दूषित कर दिया है। भारतवासियों ने ब्रह्म को अपनी चेतना से अभिव्यक्त कर ईश्वर को साकार रूप में प्रदर्शित करने हेतु बुद्धि, चेतना के द्वारा मूर्तियों का निर्माण किया मूर्तियों को स्थापित करने के लिये शास्त्रों के गहन अध्ययन, ज्यामिति अध्ययन, “गणित व अभियांत्रिकी के फलस्वरूप ईश्वर के साकार रूप की विद्यमान करने हेतु शास्त्रीय संरचनाओं का निर्माण किया जो मंदिर कहलायीं। योग ने मानव शरीर की भाँति पृथ्वी पर भी कुछ स्थान पवित्र स्थान बताये है जिनका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, वही क्षेत्र तीर्थ कहलाये महान तपस्वियों ने संपूर्ण भारतवर्ष का विचरण किया और मन्दिर निर्माणस्थलों का चुनाव भी किया, वस्तुत: जब मानव अपने अंतः करण से वास्तु कला के माध्यम से प्रतिबिंबित करता है, वही मन्दिर है मन्दिर निर्माण में स्थान के साथ-साथ अन्य भौतिक व आध्यात्मिक घटक भी अनिवार्य होते हैं, ज्यामिति, गणित, स्थान के साथ-साथ उस स्थान का आध्यात्मिक इतिहास का अध्ययन भी किया जाता है; मान्दरों का निर्माण उस स्थान पर किया जाता है जहाँ जीवन शाक्त विद्यमान हो, उदाहरणतः प्राचीन मान्दर जीवनदायिनी नदियों के निकट, वृक्षों के निकट बनाये जाते थे, जिनका उद्देश्य मानव को प्रकृति के निकट पहुँचाकर आनन्द की अनुभूति करना है। रूपरहित ब्रह्म इस संसार की माता है चूंकि एक माता ही इस अनन्त संसार, चेतनारहित वस्तु, जीव-जन्तु का पालन पोषण करती है, विष्णु, शिव, का रूप है, रूपरहित ब्रह्म अनन्त है, उसका न कभी जन्म हुआ। ब्रह्म को दिव्यदृष्टि से देखने वाला वीर अर्जुन भी घबरा गया, जब उसे ब्रह्म ने अपने चतुर्भन रूप को दिखाकर शांति दी, उसी दिव्यदृष्टि व चतुर्भुजी रूप का प्रत्यक्ष रूप सूर्यदेव हैं। मन्दिरों में देवताओं की प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, जिसके पश्चात वह प्रतिमा देवताओं की छावे रूप मे मन्दिर में सदा विद्यमान रहती है. मन्दिरों में प्रतिमा बनाने के लिये दिनो उपवास करते हैं, अपनी चेतना की पराकाष्ठा से देवता को साकार रूप में विराजित होने का आग्रह करते हैं, और अपने हाथों से ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप प्रतिमाओं व मूर्तियों के रूप में प्रदर्शित करते भारतीय संस्कृति में चेतनारहित पत्थर में भी प्रतीत होती है, चूंकि वह भी ब्रह्म की रचना है अर्थात ब्रह्म का ही रूप है प्राणप्रतिष्ठा के पश्चात प्रतिमाओं को भोग, काव्य. संगीत व नाट्य शास्त्र भी समर्पित किया जाता है। लिंग पुराण के लिंग ज्योति है अर्थात ब्रह्म का ही रूप है, अनुसार जिस भाँति आग का लिंग परिचय) धुंआ है, उसी प्रकार ब्रह्म का लिंग जगत है। भारतीय संस्कृति में शिवरात्रि के दिन शिव लिंग रूप में प्रकट हुये। भारतवर्ष में धर्मनिष्ठ काम के मन्दिर हुआ करते थे, काम यहाँ देवता है, लोग काम के मन्दिरों में उत्सव व दर्शन करते थे। यहाँ मृत्यु के देवता के लिये भी मन्दिर विद्यमान हैं, चूंकि भारतवासी जीवन के चक्र अर्थात जन्म-मृत्यु से भली भाँति परिचित थे भारतवासी वट वृक्ष में शिव, पीपल में विष्णु व नीम में सूर्य का निवास मानकर उनकी स्तुति करते हैं। यहाँ नाट्य- शास्त्र के द्वारा भी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है. महायोगी शिव भरतमुनि के नारयशास्त्र के अनुसार नटराज कहलाये जिनकों चरणों के नीचे मुक्ति है नटराज की नेत्रों में शांति है, मुख पर तेज है, भुजाओं में अग्नि,डमरू कंपन का प्रतीक है, जटाये उड रही हैं, और नीचे मुक्ति चरणों में है। उपास्य के नाम साकार रूप के बिना उपासना अत्यधिक कठिन है। आक्रमणकारियों ने मन्दिर तोड़े उनके ही वंशज राष्ट्र के टूटने के लिये जिम्मेदार हैं,धर्मनिष्ठ काम के मन्दिर तोडने वाले रिलीजनों ने संस्कृति को तीव्र ठेस पहुचाई। मंदिरों को तोड़कर अपनी संरचनाएं बना डाली। उन्होंने भारतीयों से ज्ञान भी लिया और घृणा भी की, सबको एक किताब व एक भगवान में बदलने में कभी सफल नहीं हो सके चूँकि जिस संस्कृति को महाकाल ने बनाया हो उसका काल क्या ही कर पायेगा पवन गोला Read more » Indian religion and temples
लेख समाज क्या प्रवासी मजदूरों के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार नहीं है? June 18, 2024 / June 18, 2024 by चरखा फिचर्स | Leave a Comment मुकेश कुमार योगीउदयपुर, राजस्थान वर्ष 2009 में बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम प्रदान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ने का बहुत बड़ा कदम उठाया गया. इससे शिक्षा से वंचित देश के लाखों बच्चों को लाभ जरूर हुआ लेकिन अधिनियम लागू होने के 15 साल बाद भी यदि हम धरातल पर वास्तविक […] Read more »