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भारतीय धर्म और मन्दिर

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भारतीय संस्कृति व धर्म में मन्दिरों को सदा से ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, मन्दिर धर्म के आधारभूत अंगो में सदा से ही विद्यमान हैं। सनातन धर्म में वृक्ष, वन भी मन्दिर हैं यहाँ तक कि मानव शरीर को भी मन्दिर के सदृश माना गया है; परन्तु दुर्भाग्यवश भारतीय संस्कृति के आधारभूत अंग मन्दिरों को आज सोशल मीडिया से मस्त भारतवासी मान्दरों को सेल्फी पॉइट व नाच-गान करके रील बनाने में व्यक्त हैं, और मन्दिरों को धूमिल करने मे लगे हुये हैं, इन भारतवासियों ने नाट्य-शास्त्र को भी दूषित कर दिया है।  भारतवासियों ने ब्रह्म को अपनी चेतना से अभिव्यक्त कर ईश्वर को साकार रूप में प्रदर्शित करने हेतु बुद्धि, चेतना के द्वारा मूर्तियों का निर्माण किया मूर्तियों को स्थापित करने के लिये शास्त्रों के गहन अध्ययन, ज्यामिति अध्ययन, “गणित व अभियांत्रिकी के फलस्वरूप ईश्वर के साकार रूप की विद्यमान करने हेतु शास्त्रीय संरचनाओं का निर्माण किया जो मंदिर कहलायीं।  योग ने मानव शरीर की भाँति पृथ्वी पर भी कुछ स्थान पवित्र स्थान बताये है जिनका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, वही क्षेत्र तीर्थ कहलाये महान तपस्वियों ने संपूर्ण भारतवर्ष का विचरण किया और मन्दिर निर्माणस्थलों का चुनाव भी किया, वस्तुत: जब मानव अपने अंतः करण से वास्तु कला के माध्यम से प्रतिबिंबित करता है, वही मन्दिर है मन्दिर निर्माण में स्थान के साथ-साथ अन्य भौतिक व आध्यात्मिक घटक भी अनिवार्य होते हैं, ज्यामिति, गणित, स्थान के साथ-साथ उस स्थान का आध्यात्मिक इतिहास का अध्ययन भी किया जाता है; मान्दरों का निर्माण उस स्थान पर किया जाता है जहाँ जीवन शाक्त विद्यमान हो, उदाहरणतः प्राचीन मान्दर जीवनदायिनी नदियों के निकट, वृक्षों के निकट बनाये जाते थे, जिनका उद्देश्य मानव को प्रकृति के निकट पहुँचाकर आनन्द की अनुभूति करना है। रूपरहित ब्रह्म इस संसार की माता है चूंकि एक माता ही इस अनन्त संसार, चेतनारहित वस्तु, जीव-जन्तु का पालन पोषण करती है, विष्णु, शिव, का रूप है, रूपरहित ब्रह्म अनन्त है, उसका न कभी जन्म हुआ। ब्रह्म को दिव्यदृष्टि से देखने वाला वीर अर्जुन भी घबरा गया, जब उसे ब्रह्म ने अपने चतुर्भन रूप को दिखाकर शांति दी, उसी दिव्यदृष्टि व चतुर्भुजी रूप का प्रत्यक्ष रूप सूर्यदेव हैं।    मन्दिरों में देवताओं की प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है, जिसके पश्चात वह प्रतिमा देवताओं की छावे रूप मे मन्दिर में सदा विद्यमान रहती है. मन्दिरों में प्रतिमा बनाने के लिये दिनो उपवास करते हैं, अपनी चेतना की पराकाष्ठा से देवता को साकार रूप में विराजित होने का आग्रह करते हैं, और अपने हाथों से ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप प्रतिमाओं व मूर्तियों के रूप में प्रदर्शित करते भारतीय संस्कृति में  चेतनारहित पत्थर में भी प्रतीत होती है, चूंकि वह भी ब्रह्म की रचना है अर्थात ब्रह्म का ही रूप है प्राणप्रतिष्ठा के पश्चात प्रतिमाओं को भोग, काव्य. संगीत व नाट्य शास्त्र भी समर्पित किया जाता है। लिंग पुराण के लिंग ज्योति है अर्थात ब्रह्म का ही रूप है, अनुसार जिस भाँति आग का लिंग परिचय) धुंआ है, उसी प्रकार ब्रह्म का लिंग जगत है। भारतीय संस्कृति में शिवरात्रि के दिन शिव लिंग रूप में प्रकट हुये। भारतवर्ष में धर्मनिष्ठ काम के मन्दिर हुआ करते थे, काम यहाँ देवता है, लोग काम के मन्दिरों में उत्सव व दर्शन करते थे। यहाँ मृत्यु के देवता के लिये भी मन्दिर विद्यमान हैं, चूंकि भारतवासी जीवन के चक्र अर्थात जन्म-मृत्यु से भली भाँति परिचित थे भारतवासी वट वृक्ष में शिव, पीपल में विष्णु व नीम में सूर्य का निवास मानकर उनकी स्तुति करते हैं। यहाँ नाट्य- शास्त्र के द्वारा भी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है. महायोगी शिव भरतमुनि के नारयशास्त्र के अनुसार नटराज कहलाये जिनकों चरणों के नीचे मुक्ति है नटराज की नेत्रों में शांति है, मुख पर तेज है, भुजाओं में अग्नि,डमरू कंपन का प्रतीक है, जटाये उड रही हैं, और नीचे मुक्ति चरणों में है। उपास्य के नाम साकार रूप के बिना उपासना अत्यधिक कठिन है। आक्रमणकारियों ने मन्दिर तोड़े उनके ही वंशज राष्ट्र के टूटने के लिये जिम्मेदार हैं,धर्मनिष्ठ काम के मन्दिर तोडने वाले रिलीजनों ने संस्कृति को तीव्र ठेस पहुचाई। मंदिरों को तोड़कर अपनी संरचनाएं बना डाली। उन्होंने भारतीयों से ज्ञान भी लिया और घृणा भी की, सबको एक किताब व एक भगवान में बदलने में कभी सफल नहीं हो सके चूँकि जिस संस्कृति को महाकाल ने बनाया हो उसका काल क्या ही कर पायेगा  पवन गोला 

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आर्थिकी लेख

आर्थिक विकास के दृष्टि से वित्तीय वर्ष 2023-24 भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ

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हाल ही में वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में हुए विकास से सम्बंधित आंकड़े जारी किये गए है। इसके अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत की रही थी। भारतीय रिजर्व बैंक एवं वैश्विक स्तर पर कार्यरत विभिन्न वित्तीय संस्थानों ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाते हुए कहा था कि यह 7 प्रतिशत के आसपास रहेगी। परंतु, वित्तीय 2023-24 के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर इन अनुमानों से कहीं अधिक रही है। वित्तीय वर्ष 2023-24 की चौथी तिमाही में भी भारत की आर्थिक विकास दर 7.8 प्रतिशत रही है जो पिछले वित्तीय वर्ष की चौथी तिमाही में 6.1 प्रतिशत रही थी। पूरे विश्व में प्रथम 10 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक विकास दर भारत की आर्थिक विकास दर के कहीं आसपास भी नहीं रही है। अमेरिका की आर्थिक विकास दर 2.3 प्रतिशत, चीन की आर्थिक विकास दर 5.2 प्रतिशत, जर्मनी की आर्थिक विकास दर तो ऋणात्मक 0.3 प्रतिशत रही है। जापान की आर्थिक विकास दर 1.92 प्रतिशत, ब्रिटेन की 0.1 प्रतिशत, फ्रान्स की 0.9 प्रतिशत, ब्राजील की 2.91 प्रतिशत, इटली की 0.9 प्रतिशत एवं कनाडा की 1 प्रतिशत रही है, वहीं भारत की आर्थिक विकास दर 8.2 प्रतिशत रही है। 8 प्रतिशत से अधिक की विकास दर को देखते हुए अब तो ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि वर्ष 2027 तक जर्मनी एवं जापान की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ते हुए भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था निश्चित ही बन जाएगा। विनिर्माण, खनन, भवन निर्माण एवं सेवा क्षेत्र, यह चार क्षेत्र ऐसे हैं जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद को तेजी से आगे बढ़ाने में अपना विशेष योगदान देते हुए नजर आ रहे हैं। यह स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों के चलते ही सम्भव हो पा रहा है।  वास्तविक सकल मान अभिवृद्धि के आधार पर, वित्तीय वर्ष 2023-24 की चतुर्थ तिमाही में विनिर्माण के क्षेत्र में 8.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 की इसी अवधि में केवल 0.9 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की जा सकी थी। इसी प्रकार, खनन के क्षेत्र में भी इस वर्ष की चतुर्थ तिमाही में वृद्धि दर 4.3 प्रतिशत की रही है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 2.9 प्रतिशत की रही थी। भवन निर्माण के क्षेत्र में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की गई है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 7.4 प्रतिशत की रही थी। नागरिक प्रशासन, सुरक्षा एवं अन्य सेवाओं के क्षेत्र में वृद्धि दर 4.7 प्रतिशत से बढ़कर 7.8 प्रतिशत हो गई है। ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि दर पिछले वर्ष की चौथी तिमाही में 7.3 प्रतिशत से बढ़कर इस वर्ष चौथी तिमाही में 7.7 प्रतिशत पर पहुंच गई है। परंतु, कृषि, सेवा एवं वित्तीय क्षेत्र में वित्तीय वर्ष 2023-24 की चौथी तिमाही में वृद्धि दर पिछले वर्ष की इसी तिमाही की तुलना में कुछ कम रही है। वैश्विक स्तर पर अन्य देशों के सकल घरेलू उत्पाद में लगातार कम हो रही वृद्धि दर के बावजूद भारत के सकल घरेलू उत्पाद में तेज गति से वृद्धि दर का होना यह दर्शाता है कि अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आ रही परेशानियों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं के बराबर हो रहा है एवं भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर तेज गति से आर्थिक वृद्धि करने में सफल हो रही है।  परंतु, भारत में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिन पर, आर्थिक विकास की गति को और अधिक तेज करने के उद्देश्य से विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसे, हाल ही के समय में भारत में निजी खपत नहीं बढ़ पा रही है और यह 4 प्रतिशत की दर पर ही टिकी हुई है। साथ ही, निजी क्षेत्र में पूंजी निवेश भी नहीं बढ़ पा रहा है। भारत में निजी खपत कुल सकल घरेलू उत्पाद का 60 प्रतिशत है। यदि सकल घरेलू उत्पाद के इतने बड़े हिस्से में वृद्धि नहीं होगी अथवा कम वृद्धि दर होगी तो देश में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर भी विपरीत रूप से प्रभावित होगी। भारत में निजी खपत इसलिए भी नहीं बढ़ पा रही है क्योंकि वित्तीय वर्ष 2022-23 में घरेलू देयताएं सकल घरेलू उत्पाद के 5.7 प्रतिशत के उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गईं हैं एवं बचत की दर भी सकल घरेलू उत्पाद के  5.2 प्रतिशत पर अपने निचले स्तर पर आ गई है, जो 10 वर्ष पूर्व 7 प्रतिशत से अधिक थी।  वहीं दूसरी ओर, दिसम्बर 2023 के प्रथम सप्ताह में भारत ने फ्रान्स एवं ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में पूरे विश्व में पांचवा स्थान हासिल कर लिया था। भारत से आगे केवल अमेरिका, चीन, जापान एवं हांगकांग थे। परंतु, केवल दो माह से भी कम समय में भारत ने शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में हांगकांग को पीछे छोड़ते हुए विश्व में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया है। भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से भी अधिक का हो गया है। अब ऐसा आभास होने लगा है कि भारत अर्थ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत में नैशनल स्टॉक एक्स्चेंज पर लिस्टेड समस्त कम्पनियों के कुल बाजार पूंजीकरण का स्तर 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर जुलाई 2017 में पहुंचा था और लगभग 4 वर्ष पश्चात अर्थात मई 2021 में 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया था तथा केवल लगभग 2.5 वर्ष पश्चात अर्थात दिसम्बर 2023 में यह 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को भी पार कर गया था और अब यह 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर से भी आगे निकल गया है। इस प्रकार भारत शेयर बाजार पूंजीकरण के मामले में आज पूरे विश्व में चौथे स्थान पर आ गया है।   प्रथम स्थान पर अमेरिकी शेयर बाजार है, जिसका पूंजीकरण 50.86 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। द्वितीय स्थान पर चीन का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 8.44 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। वर्ष 2023 में चीन के शेयर बाजार ने अपने निवेशकों को ऋणात्मक प्रतिफल दिए हैं। तीसरे स्थान पर जापान का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 6.36 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। चौथे स्थान पर भारत का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। पांचवे स्थान पर हांगकांग का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 4.29 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। जिस तेज गति से भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण आगे बढ़ रहा है, अब ऐसी उम्मीद की जा रही है कि कुछ समय पश्चात ही भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण जापान शेयर बाजार के पूंजीकरण को पीछे छोड़ते हुए पूरे विश्व में तीसरे स्थान पर आ जाएगा। उक्त सफलताओं के साथ ही, भारत ने अपने आर्थिक विकास की दर को तेज रखते हुए अपने राजकोषीय घाटे पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत का राजकोषीय घाटा 17 लाख 74 हजार करोड़ रुपए का रहा था जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में घटकर 16 लाख 54 हजार करोड़ रुपए का रह गया है। यह राजकोषीय घाटा वित्तीय वर्ष 2022-23 में 5.8 प्रतिशत था जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में घटकर 5.6 प्रतिशत रह गया है। भारत के राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2024-25 में 5.1 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2025-26 में 4.5 प्रतिशत तक नीचे लाने के प्रयास केंद्र सरकार द्वारा सफलता पूर्वक किए जा रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रान्स, जर्मनी जैसे विकसित देश भी अपने राजकोषीय घाटे को कम नहीं कर पा रहे हैं परंतु भारत ने वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान यह बहुत बड़ी सफलता हासिल की है। सरकार का खर्च उसकी आय से अधिक होने पर इसे राजकोषीय घाटा कहा जाता है। केंद्र सरकार ने खर्च पर नियंत्रण किया है एवं अपनी आय के साधनों में अधिक वृद्धि की है। यह लम्बे समय में देश के आर्थिक स्वास्थ्य की दृष्टि से एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आया है। प्रहलाद सबनानी

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