साहित्य यक्ष प्रश्न July 8, 2013 / July 19, 2013 by विपिन किशोर सिन्हा | 4 Comments on यक्ष प्रश्न प्रथम कड़ी यक्ष प्रश्न, वे प्रश्न हैं जो काल के किसी भी अंश में अप्रासंगिक नहीं हैं। वनवासी युधिष्ठिर द्वारा यक्ष के सारे प्रश्नों के दिए गए उत्तर भी कालजयी है। यक्ष प्रश्न का उल्लेख सदियों से किया जाता है। प्रामाणिक, गूढ़ और जटिल प्रश्न को यक्ष प्रश्न कहने की परंपरा-सी बन गई है; […] Read more » यक्ष प्रश्न
कविता कविता : जीवन दर्शन July 8, 2013 / July 8, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा अपने मन को जोड़ो हर जन से . न तोड़ो किसी का दिल अपने धन से . मत बनो तंग दिल सबके साथ रहो घुल मिल . हों ऐसे विचार जो बन सके कर्म का आधार […] Read more » कविता : जीवन दर्शन
कविता विचार तेरे शहर के July 7, 2013 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जब भी गये बंद मिले द्वार तेरे शहर के , करते हम कैसे भला दीदार तेरे शहर के । अमुआ के बाग में उल्लुओं का बसेरा है , ठीक नहीं लगते हैं आसार तेरे शहर के। दिलों पर खंजर के निशां लिये मिले लोग , तूं ही बता कैसे करें एतबार तेरे […] Read more » विचार तेरे शहर के
कहानी साहित्य उत्तराखण्ड का ‘बेताज’ अंग्रेज राजा July 6, 2013 / July 6, 2013 by डा.राज सक्सेना | 3 Comments on उत्तराखण्ड का ‘बेताज’ अंग्रेज राजा सन 1842 की बात है | पहले अंग्रेज-अफगान युद्ध में अंग्रेजों की हार हुई | कुछ अज्ञात कारणों से सेना से कुछ लोग भाग निकलें | शायद मरने के डर से,जेल के डर से या हारने की आत्मग्लानि से, कारण कुछ भी हो कुछ सिपाही भागे तो, इन्ही भागे हुए सिपाहियों में से एक भगोड़े […] Read more » उत्तराखण्ड का 'बेताज' अंग्रेज राजा
कविता साहित्य अयोध्या में July 6, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment सरयु बहती थी अयोध्या में आज भी बहती है रहते थे लोग वहाँ आज भी रहते हैं गलियाँ और सड़कें वहाँ तब भी थी आज भी हैं मंदिर से घंटी और मस्जिद से अजान तब भी सुनाई देती थी आज भी सुनाई देती है । बावजूद इनके आज कहीं दिखता नहीं राम का मंदिर […] Read more » अयोध्या में
पुस्तक समीक्षा अन्तर-पथ – एक समीक्षा July 5, 2013 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment बिपिन किशोर सिन्हा ‘अन्तर-पथ’ एक कविता संग्रह है जिसे शब्द-भाव दिए हैं, डा. रचना शर्मा ने और प्रकाशित किया है पिलग्रिम्स पब्लिशिंग, वाराणसी ने। सामान्यतः पिलग्रिम्स पब्लिशिंग नए साहित्यकारों की रचनाएं कम ही छापता है। परन्तु डा. रचना शर्मा का यह काव्य-संग्रह प्रकाशित करके, प्रकाशक ने अपनी पुरानी छवि तोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। […] Read more »
कविता साहित्य चौराहे पर खड़े हम July 5, 2013 / July 5, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment जिसके सहारे था, उसी ने मुझे बेसहारा किया साहिल ने भी अब मुझसे किनारा किया । दिन गुजर गया, पर किसी ने खबर न ली शाम को उसने मुझे दूर से इशारा किया । खट्टी-मीठी यादों का नाम है मेरी जिंदगी यादों के सहारे ही हमने अबतक गुजरा किया । जो कुछ […] Read more » चौराहे पर खड़े हम
दोहे साहित्य सौन्दर्य वर्णन July 5, 2013 by डा.राज सक्सेना | Leave a Comment कृष्ण मेघ से कृष्णता, ले केशों में डाल | उठा दूज का चाँद ज्यों, रचा विधाता भाल | खिची कमान भोंहें रची, पलक सितारे डाल | नयन कटीले रख दिए, मृग से नयन निकाल | तीखी, सीधी और खड़ी, रची विधाता नाक | रक्तवर्ण, रस से भरे, रचे होंठ रस-पाक | चिबुक अनारों से रचे […] Read more » सौन्दर्य वर्णन
कविता साहित्य प्रेम की माला July 5, 2013 by डॉ.अलका अग्रवाल | Leave a Comment कच्चे धागे प्रेम के, थोड़ा खिचतें ही बिखर जाएँ, चढ़ाओं इस पर धार विश्वास की ताकि पक्के हो जाए। पहनों इसको ध्यान से कहीं उलझन न कोई पड़ जाए, सुलझाओं फिर धैर्य से ताकि सिकुड़न न पड़ पाए।। प्रेम की डोर को तानों उतना ही कि टूटने न पाये, जुड़ने को पड़ी गांठ से फिर […] Read more » प्रेम की माला
दोहे साहित्य दोहों पर दोहे July 5, 2013 by डा.राज सक्सेना | 4 Comments on दोहों पर दोहे उर्दू में है शेर ज्यों, दोधारी शमशीर | हिंदी में दोहा अटल, सही लक्ष्य का तीर | शेरो में शायर भरे, पूरे मन के भाव | इसी भाँति दोहा करे, सीधे मन पर घाव | गजल शेर का एक जुज, हो इनसे परिपूर्ण | पर दोहा है चतुष्पद, भाव भरे सम्पूर्ण | […] Read more » दोहों पर दोहे
गजल साहित्य बतियाँ July 5, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment तुम्हारे मुंह पर तुम्हारी बतियाँ हमारे मुंह पर हमारी बतियाँ बहुत मीठी मीठी सी लगती हैं उन की ऐसी खुशामदी बतियाँ ! तुम्हारे मुंह पर हमारी बतियाँ हमारे मुंह पर तुम्हारी बतियाँ सीना तक छलनी कर जाती हैं उन की ऐसी हैं कटारी बतियाँ ! कभी हैं शोला कभी हैं शबनम मरहम नहीं हैं उन […] Read more » बतियाँ
व्यंग्य साहित्य खाद्य सुरक्षा के बसते July 4, 2013 / July 4, 2013 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment बगल में तीन तीन बसते दबाये चोखी लामा फटे थैले सा मुंह लटकाए चले आ रहे थे। हमें मसखरी सूझी ..और पूछ बैठे ..अरे चोखी मियां ये बच्चों के बसते उठाये इस उम्र में कौन से स्कूल जा रहे हो। हमारी मसखरी चोखी मियां को नागवार गुजरी ! उत्तराखंड के बादल की भांति बिफर पड़े …मियां पैसे वाले हो […] Read more » खाद्य सुरक्षा के बसते