कविता व्यंग्य प्रेमिका के साइड इफेक्ट्स December 19, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रशांत मिश्रा ओ मेरी प्रिय संगिनी,अष्ट भुजंगिनी,लड़ाकू दंगिनी, नमन करता हूँ तुमको अपने ह्रदय के अंतर्मन से, और खुदको समर्पित करता हूँ तुम्हे अपने तन मन से, मत मारी गयी थी मेरी जब तुम्हे प्रेम का प्रस्ताव दिया था, और किस मनहूस घडी में तुमने वो स्वीकार किया था, मेरे दोस्त मुझे जोरू का […] Read more » Featured प्रेमिका के साइड इफेक्ट्स
व्यंग्य साहित्य गम खा – खूब गा…!! December 16, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा कड़की के दिनों में मिठाई खाने की तीव्र इच्छा होने पर मैं चाय की फीकी चुस्कियां लेते हुए मिठाई की ओर निहारता रहता हूं। इससे मुझे लगता है मानो मेरे गले के नीचे चाय के घुंट नहीं बल्कि तर मिठाई उतर रही है।धन्ना सेठों के भोज में जीमने से ज्यादा आनंद […] Read more » गम खा - खूब गा...!!
व्यंग्य साहित्य क्यों रें अज्जू!!! December 15, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment क्यों रें अज्जू!!! क्या हो रिया हैं आजकल । अज्जू- कुछ नहीं हो रिया यार पीके,बस फेसबुकिया बन एक दुसरे को गरिया रहै हैं । पीके- गरिया रहै हो??किसे गरिया रहै हो बे! तुम कब से गरियाना शुरूकर दिये हो!! अरे कुछ नहीं भाई बस ऐसे ही अब जकरबर्ग ने फेसबुकिया बनाई है तो बकैती […] Read more » क्यों रें अज्जू!!!
व्यंग्य साहित्य स्वर्ग लोग में आरक्षण की आग December 15, 2015 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment हे प्रभु विनती सुन लो. देश में सामान्य वर्ग के लोग अपनी अर्ज लेकर रोज मंदिर में जाते है. खूब पूजा अर्चना कर रहे हैं. कभी इस मंदिर तो कभी उस मंदिर. बात ही कुछ ऐसी है. आखिर पुत्र प्राप्ति की लालसा ही कुछ ऐसी है. जिसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयार थे. […] Read more » स्वर्ग लोग में आरक्षण की आग
व्यंग्य साहित्य ग्लोबल वॉर्मिंग का स्थायी समाधान December 14, 2015 by अशोक मिश्र | Leave a Comment अशोक मिश्र आप लोग यह बताएं कि दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का अपर चैंबर खाली है क्या? अगर खाली नहीं होता, तो इतनी मामूली-सी बात को लेकर पेरिस में काहे मगजमारी करते। फोकट में अपनी-अपनी सरकारों का इत्ता रुपया-पैसा और टाइम खोटा किया। पेरिस के निवासियों को परेशान किया सो अलग। वह भी ग्लोबल वॉर्मिंग […] Read more » ग्लोबल वॉर्मिंग का स्थायी समाधान
व्यंग्य साहित्य मांगे दान, करै भोज…!! December 9, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | 1 Comment on मांगे दान, करै भोज…!! तारकेश कुमार ओझा पता नहीं अमीरों में गरीब बनने या दिखने की सनक सवार होती है या नहीं, लेकिन गरीबों पर यह धुन आजीवन बनी रहती है। बचपन में आना – पाई वाली किताबें हासिल करने में भी भले ही हमारे पसीन छूट जाते थे, लेकिन बुजुर्गों को दिवंगत आत्माओं की संतुष्टि पर दिल – […] Read more » करै भोज...!! मांगे दान
राजनीति व्यंग्य भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार December 7, 2015 / December 7, 2015 by अशोक मिश्र | 2 Comments on भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार अशोक मिश्र केजरी भाई लाख टके की बात कहते हैं। अगर आदमी भूखा रहेगा, तो ईमानदार कैसे रहेगा? भुक्खड़ आदमी ईमानदार हो सकता है भला। हो ही नहीं सकता। आप किसी तीन दिन के भूखे आदमी को जलेबी की रखवाली करने का जिम्मा सौंप दो। फिर देखो क्या होता है? पहले तो वह ईमानदार रहने […] Read more » Featured भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार
व्यंग्य साहित्य जाने कहाँ गये……… December 5, 2015 by बीनू भटनागर | 1 Comment on जाने कहाँ गये……… जाने कहाँ गये वो दिन, कहते थे आधी तनख़्वाह मे, विधायक काम चलयेंंगे, नीली वैगनार से वो, ख़ुद दफ्तर आयें जायेंगे।जाने कहाँ गये……… अब तो सभी के पास मे, बडी से बडी हैं गाड़ियाँ, बंगला कोठी सबको मिले, विदेश मे हों छुट्टियाँ।जाने कहाँ गये……… ग़रीब तो और भी ग़रीब हैं हो रहे, दाल चावल भी […] Read more » जाने कहाँ गये.........
व्यंग्य साहित्य किस्सा-ए-लिखास रोग December 5, 2015 / December 5, 2015 by शिवेन्दु राय | Leave a Comment शिवेन्दु राय कॉमरेड, ये रोग मुझे बहुत साल पहले नहीं लगा था | जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में मीडिया फर्स्ट ईयर का छात्र था, स्वर्गीय राजेन्द्र जी को पहली बार ‘हंस’ में पढ़ा | उसी दौरान इस रोग के कीटाणुओं का प्रवेश मेरे अन्दर हो गया | मेरे दोस्त लव कांत अक्सर कहने लगे कि […] Read more » किस्सा-ए-लिखास रोग लिखास रोग
व्यंग्य साहित्य किस्सा-ए-ईमानदारी December 2, 2015 by शिवेन्दु राय | 3 Comments on किस्सा-ए-ईमानदारी शिवेन्दु राय प्रधानमंत्री मोदी अगर ईमानदार हैं तो उनसे कैसे निबटा जाए, यह आजकल की सबसे ज्वलंत समस्या है | तथाकथित राजनीति विज्ञान के विद्वान इस दिशा में पोथियाँ तैयार करने में लगे हैं | सभी राजनीतिक पार्टियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि मोदी की ईमानदारी अब विकराल रूप ले चुकी है […] Read more » किस्सा-ए-ईमानदारी
व्यंग्य साहित्य सेल्फी वाला पत्रकार नहीं हूं December 2, 2015 / December 7, 2015 by अशोक मिश्र | Leave a Comment अशोक मिश्र घर पहुंचते ही मैंने अपने कपड़े उतारे और पैंट की जेब से मोबाइल निकालकर चारपाई पर पटक दिया। मोबाइल देखते ही घरैतिन की आंखों में चमक आ गई। दूसरे कमरे से बच्चे भी सिमट आए थे। घरैतिन ने मोबाइल फोन झपटकर उठा लिया और उसमें कुछ देखने लगीं। मोबाइल को इस तरह झपटता […] Read more » सेल्फी वाला पत्रकार सेल्फी वाला पत्रकार नहीं हूं
व्यंग्य साहित्य जब – जबरा बोले …!! November 29, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | 2 Comments on जब – जबरा बोले …!! तारकेश कुमार ओझा बचपन में पढ़ी उस कहानी का शीर्षक तो अब मुझे याद नहीं, लेकिन सारांश कुछ हद तक याद है। जिसमें सब्जी बेचने वाली एक गरीब महिला का बेटा किसी हादसे में गुजर जाता है। लेकिन परिवार की माली हालत और गरीबी की मारी बेचारी उसकी मां को दो दिन बाद ही फुटपाथ […] Read more » Featured जब – जबरा बोले