व्यंग्य साहित्य सूट बूट का प्रस्ताव October 29, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ वेद व्यथित बच्चा जब थोड़ा सा बड़ा होने लगता है तो उस की माँ उसे स्कूल जाने से पहले थोड़ा सा अंग्रेज बनाने की तैयारी शुरू कर देती है। वह भारत के तथाकथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की अपेक्षा के अनुसार ‘पार्ट ऑफ़ बॉडी ‘,फाइव फ्रूटस नेम आदि रटवाना शुरू कर देती है। फिर […] Read more » सूट बूट का प्रस्ताव
व्यंग्य साहित्य न्यूज करे कन्फयूज…!! October 26, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज चल रही है… टीम इंडिया मैच हारी…। कुछ देर बाद पर्दे पर सुटेड – बुटेड कुछ जाने – पहचाने चेहरे उभरे। एक ने कहा … आफ कोर्स … कैप्टन किंग को समझना होगा…. वे अपनी मनमर्जी टीम पर नहीं थोप सकते… । आखिर उन्होंने ऐसा फैसला किया ही […] Read more » न्यूज करे कन्फयूज...!!
व्यंग्य साहित्य धीरे-धीरे बोल बाबा सुन ना ले October 25, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on धीरे-धीरे बोल बाबा सुन ना ले दाल वो भी अरहर की दाल ,इसे लेकर बाबा रामदेव ने बड़े पते की बात कही है.बाबा ने जो कुछ कहा है उसके बारे में खुद योगाचार्य पतंजलि को कुछ पता नहीं था. बाबा बोले-दाल खाने से घुटनों का दर्द पैदा होता है.सचमुच हमें भी ये ब्रम्हज्ञान ब्राम्हण होने के बावजूद आज तक नहीं था.हमारे […] Read more » धीरे-धीरे बोल
व्यंग्य साहित्य नेता जी कहिन, अबकी बार, गाय हमार, October 20, 2015 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment देश में एक मौसम सदाबहार रहता हैं. जाने का नाम ही नही लेता है. वो है चुनावी मौसम. कभी इस राज्य में तो कभी उस राज्य में. जहां भी ये मौसम शुरू होता है. वहां तो जैसे चार चांद लग जाते हैं.गली मोहल्लों में चहल-पहल बहुत बढ़ जाती है. चाय की दुकानों पर दो चुस्की […] Read more » अबकी बार गाय हमार नेता जी कहिन
व्यंग्य संघर्ष की शक्ल….!! October 14, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा मैं जीवन में एक बार फिर अपमानित हुआ था। मुझे उसे फाइव स्टार होटल नुमा भवन से धक्के मार कर बाहर निकाल दिया गया था, जहां तथाकथित संघर्षशीलों पर धारावहिक तैयार किए जाने की घोषणा की गई थी। इसे किसी चैनल पर भी दिखाया जाना था। पहली बार सुन कर मुझे लगा […] Read more » संघर्ष की शक्ल....!!
व्यंग्य साहित्य गधे ने जब मुंह खोला October 10, 2015 by अशोक गौतम | Leave a Comment मैंने रोज की तरह लाला दयाराम की बरसों से बन रही हवेली के लिए सूरज निकलने से पहले अपने पुश्तैनी गधे के पोते के पड़पोते पर रेत ढोना शुरू कर दिया था। जहां तक मेरी नालिज है न गधे के पुरखों ने मेरे पुरखों से इस रिश्ते के बाबत कोई शिकायत की थी और न […] Read more » गधे ने जब मुंह खोला
राजनीति व्यंग्य कानून अपना – अपना ..!! October 6, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा मुझे पुलिस ढूंढ रही थी। पता चला एक महिला ने मेरे खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज करा दी है। मुझे लगा जब मैने अपराध किया ही नही तो फिर डर किस बात का। लिहाजा मैने थानेदार को फोन लगाया। दूसरी ओर से कड़कते हुए जवाब मिला… तुम हो कहां … हम तुम्हारी खातिरदारी […] Read more » Featured
व्यंग्य साहित्य पी ले, पी ले, ओ मोरी जनता September 27, 2015 by रवि श्रीवास्तव | 2 Comments on पी ले, पी ले, ओ मोरी जनता देश के युवाओं में नशा का दौर लगातार बढ़ता जा रहा है. किसी को शौक है तो कोई इसका आदी बन चुका है. छोटी खुशी हो या बड़ी बस बहाना चाहिए पार्टी करने का. चलो पार्टी करते है और जाम छलकाते है. गिलास को टकराकर चेयर्स करते हैं. और टल्ली होकर हंगामा. वाह क्या खूबी […] Read more » ओ मोरी जनता पी ले
व्यंग्य साहित्य अथ ‘श्री मच्छर कथायाम’ September 19, 2015 by श्रीराम तिवारी | Leave a Comment जिस किसी ने संस्कृत नीति कथा ‘पुनर्मूषको- भव:’ नहीं पढ़ी होगी ,उसे मेरी यह नव -उत्तरआधुनिक ‘मच्छरकथा’ शायद ही रुचिकर लगेगी ! किन्तु लोक कल्याण के लिए ‘स्वच्छ भारत’ एवं स्वश्थ भारत के निर्माण के लिए यह सद्यरचित स्वरचित मच्छरकथा -फेसबुक ,ट्विटर ,गूगल्र ,वॉट्सएप समर्पयामि :! ++++ ===++++==अथ मच्छर कथा प्रारम्भ ====+======+===++++ यद्द्पि मैं कोई […] Read more » मच्छर
व्यंग्य साहित्य सजा का मजा…!! September 16, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा मैने कई बार महसूस किया है कि बेहद सामान्य व छोटा लगने वाला कार्य करने के बाद मुझे लगा जैसे आज मैने कोई अश्विसनीय कार्य कर डाला है। वैसे सुना है कि भीषण रक्तपात के बाद चक्रवर्ती सम्राट बनने वाले कई राजा – महाराजा इसकी उपलब्धि के बाद मायूस हो गए। यह […] Read more » सजा का मजा
राजनीति व्यंग्य मोर्चे पर मोर्चा …!! September 8, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बचपन में मैने ऐसी कई फिल्में देखी है जिसकी शुरूआत से ही यह पता लगने लगता था कि अब आगे क्या होने वाला है। मसलन दो भाईयों का बिछुड़ना और मिलना, किसी पर पहले अत्याचार तो बाद में बदला , दो जोड़ों का प्रेम और विलेनों की फौज… लेकिन अंत […] Read more » Featured मोर्चा मोर्चे पर मोर्चा ...!!
विविधा व्यंग्य खास को यूं आम मत बन बनाओ …प्लीज…!! August 30, 2015 / August 30, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | 1 Comment on खास को यूं आम मत बन बनाओ …प्लीज…!! बचपन में अपने हमउम्र बिगड़ैल रईसजादों को देख कर मुझे उनसे भारी ईष्या होती थी। क्योंकि मेरा ताल्लुक किसी प्रभावशाली नहीं बल्कि प्रभावहीन परिवार से था। मैं गहरी सांस लेते हुए सोचता रहता … काश मैं भी किसी बड़े बाप का बेटा होता , या एट लिस्ट किसी नामचीन मामा का भांजा अथवा किसी बड़े […] Read more » Featured