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लेख शख्सियत समाज

परमपूज्य स्वामी ब्रह्मानंद जी का वैराग्य नैसर्गिक था

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(43वीं पुण्यतिथि 13 सितम्बर 2025 पर विशेष) स्वामी ब्रह्मानंद का व्यक्तित्व महान था। उन्होंने समाज सुधार के लिए काफी कार्य किए। देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने जहां स्वयं को समर्पित कर कई आंदोलनों में जेल काटी। आजादी के बाद देश की राजनीति में भी उनका भावी योगदान रहा है। स्वामी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही कार्य किए। समाज के लोगों को शिक्षा की ओर ध्यान देने का आह्वान किया। स्वामी ब्रह्मानंद महाराज का जन्म 04 दिसंबर 1894 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले की राठ तहसील के बरहरा नामक गांव में साधारण किसान परिवार में हुआ था। स्वामी ब्रह्मानंद महाराज जी के पिता का नाम मातादीन लोधी तथा माता का नाम जशोदाबाई था। स्वामी ब्रह्मानंद के बचपन का नाम शिवदयाल था। स्वामी ब्रह्मानंद ने बचपन से ही समाज में फैले हुए अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी कुरीतियों का डटकर विरोध किया। स्वामी ब्रह्मानंद जी की प्रारम्भिक शिक्षा हमीरपुर में ही हुई। इसके पश्चात् स्वामी ब्रह्मानंद जी ने घर पर ही रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद और अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया। इसी समय से लोग उन्हें स्वामी ब्रह्मानंद से बुलाने लगे। कहा जाता है कि बालक शिवदयाल के बारे में संतों ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो राजा होगा या प्रख्यात सन्यासी। बालक शिवदयाल का रुझान आध्यात्मिकता की तरफ ज्यादा होने के कारण पिता मातादीन लोधी को डर सताने लगा कि कहीं वे साधु न बन जाए। इस डर से मातादीन लोधी ने स्वामी ब्रह्मानंद जी का विवाह सात वर्ष की उम्र में हमीरपुर के ही गोपाल महतो की पुत्री राधाबाई से करा दिया। आगे चलकर राधाबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। लेकिन स्वामी जी का चित्त अब भी आध्यात्मिकता की तरफ था। स्वामी ब्रह्मानंद जी ने  24 वर्ष की आयु में पुत्र और पत्नी का मोह त्याग गेरूए वस्त्र धारण कर परम पावन तीर्थ स्थान हरिद्वार में भागीरथी के तट पर ‘‘हर कि पेड़ी’’ पर सन्यास कि दीक्षा ली। संन्यास के बाद शिवदयाल लोधी संसार में ‘‘स्वामी ब्रह्मानंद’’ के रूप में प्रख्यात हुए। संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी ब्रह्मानंद ने सम्पूर्ण भारत के तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। इसी बीच उनका अनेक महान साधु संतों से संपर्क हुआ। इसी बीच उन्हें गीता रहस्य प्राप्त हुआ। पंजाब के भटिंडा में स्वामी ब्रह्मानंद जी की महात्मा गांधी जी से भेंट हुई। गांधी जी ने उनसे मिलकर कहा कि अगर आप जैसे 100 लोग आ जायें तो स्वतंत्रता अविलम्ब प्राप्त की जा सकती है। गीता रहस्य प्राप्त कर स्वामी ब्रह्मानंद ने पंजाब में अनेक हिंदी पाठशालाएँ खुलवायीं और गोवध बंदी के लिए आंदोलन चलाये। इसी बीच स्वामी जी ने अनेक सामाजिक कार्य किये 1956 में स्वामी ब्रह्मानंद को अखिल भारतीय साधु संतों के अधिवेशन में आजीवन सदस्य बनाया गया और उन्हें कार्यकारिणी में भी शामिल किया गया। इस अवसर पर देश के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी सम्मिलित हुए। स्वामी जी सन् 1921 में गाँधी जी के संपर्क में आकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। स्वतंत्रता आन्दोलन में भी स्वामी ब्रह्मानंद जी ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। 1928 में गांधी जी स्वामी ब्रह्मानंद के प्रयासों से राठ पधारे। 1930 में स्वामी जी ने नमक आंदोलन में हिस्सा लिया। इस बीच उन्हें दो वर्ष का कारावास हुआ। उन्हें हमीरपुर, हरदोई और कानपूर कि जेलों में रखा गया। उन्हें पुनः फिर जेल जाना पड़ा। स्वामी ब्रह्मानंद जी ने पूरे उत्तर भारत में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लोगों में अलख जगाई। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय स्वामी जी का नारा था उठो! वीरो उठो!! दासता की जंजीरों को तोड फेंको। उखाड़ फेंको इस शासन को एक साथ उठो आज भारत माता बलिदान चाहती है। उन्होने कहा था की दासता के जीवन से म्रत्यु कही श्रेयस्कर है। बरेली जेल में स्वामी ब्रह्मानंद की भेट पंडित जवाहर लाल नेहरू जी से हुई। जेल से छूटकर स्वामी ब्रह्मानंद शिक्षा प्रचार में जुट गए। 1942 में स्वामी जी को पुनः भारत छोडो आंदोलन में जेल जाना पड़ा। स्वामी जी ने सम्पूर्ण बुंदेलखंड में शिक्षा की अलख जगाई आज भी उनके नाम से हमीरपुर में डिग्री कॉलेज चल रहा है। जिसकी नीव स्वामी ब्रह्मानंद जी ने 1938 में ब्रह्मानंद विद्यालय के रूप में रखी। 1966 में गौ हत्या निषेध आंदोलन में स्वामी ब्रह्मानंद ने 10-12 लाख लोगों के साथ संसद के सामने आंदोलन किया। गौहत्या निषेध आंदोलन में स्वामी ब्रह्मानंद को गिरप्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। तब स्वामी ब्रह्मानंद ने प्रण लिया कि अगली बार चुनाव लड़कर ही संसद में आएंगे। स्वामी जी 1967 से 1977 तक हमीरपुर से संासद रहे। जेल से मुक्त होकर स्वामी जी ने हमीरपुर लोकसभा सीट से जनसंघ से 1967 में चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर संसद भवन पहुंचे। देश की संसद में स्वामी ब्रह्मानंद जी पहले वक्ता थे जिन्होने गौवंश की रक्षा और गौवध का विरोध करते हुए संसद में करीब एक घंटे तक अपना ऐतहासिक भाषण दिया था। 1972 में स्वामी जी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आग्रह पर कांग्रेस से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति वीवी गिरि से स्वामी ब्रह्मानंद के काफी निकट संबंध थे। स्वामी जी की निजी संपत्ति नहीं थी। सन्यास ग्रहण करने के बाद उन्होंने पैसा न छूने का प्रण लिया था और इस प्रण का पालन मरते दम तक किया। स्वामी ब्रह्मानंद अपनी पेंशन छात्र-छात्राओं के हित में दान कर दिया करते थे। समाज सुधार और शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया। वह कहा करते थे मेरी निजी संपत्ति नहीं है, यह तो सब जनता की है। कर्मयोगी शब्द का जीवंत उदाहरण यदि भारत देश में है तो स्वामी ब्रह्मानंद का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा है।  कर्म को योग बनाने की कला अगर किसी में थी तो वो स्वामी ब्रह्मानंद जी ही थे।  स्वामी जी का वैराग्य नैसर्गिक था उनका वैराग्य स्वयं या अपने आप तक सीमित नहीं था। बल्कि उनके वैराग्य का लाभ सारे समाज को मिला। हमेशा गरीबों की लड़ाई लड़ने वाले बुन्देलखण्ड के मालवीय नाम से प्रख्यात, स्वतंत्रता संग्राम  सेनानी, त्यागमूर्ति, सन्त प्रवर, परम पूज्य स्वामी ब्रह्मानंद जी 13 सितम्बर 1984 को ब्रह्मलीन हो गए। लेकिन उनका जीवन और शिक्षाएं आज भी हमें राह दिखाती हैं। आज हम त्यागमूर्ति, संत प्रवर, परम पूज्य स्वामी ब्रह्मानंद जी को उनकी 43वीं पुण्यतिथि 13 सितम्बर 2025 पर नमन करते हुए यही कह सकते हैं कि- ‘‘लाखों जीते लाखों मरते याद कहा किसी की रह जाती, रहता नाम अमर उन्ही का जो दे जाते अनुपम थाती’’ – ब्रह्मानंद राजपूत

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लेख समाज

अतिथि शिक्षकों की यह कैसी मेहमाननवाजी

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ओ पी सोनिक     ऐसा माना जाता है कि भारतीय समाज के व्यवहार में अतिथि को देवता के समान मानने की भावना समाहित है। पिछले कई वर्षों से भारत की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों के लिए प्रयुक्त अतिथि शब्द जितना ट्रेंड करता रहा है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया। जब शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा विभिन्न माननीय न्यायालयों में सरकारों के गले की फांस बनने लगा तो सरकारों द्वारा शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए एक ऐसा अस्थाई जुगाड़ ईज़ाद कर लिया जिससे देश की डगमगाती शिक्षा व्यवस्था फिर से चलने लगी। सरकारी शिक्षण संस्थानों में नियमित शिक्षकों की अपेक्षा अतिथि शिक्षकों की बढ़ती संख्या को देखकर लगता है कि फिर से चलने वाली व्यवस्था अब लंगड़ी व्यवस्था का रूप ले रही है। विभिन्न राज्यों में ऐसे शिक्षकों को अतिथि शिक्षक, शिक्षा मित्र, संविदा शिक्षक, पारा शिक्षक, शिक्षक सेवक और विद्या वालंटियर्स जैसे भावनात्मक नामों से जाना जाता है। काम चाहें चुनाव का हो या मतदाता सूचियों का या किसी अन्य गैर शैक्षिणिक गतिविधि का, आमतौर पर नियमित शिक्षक उक्त गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने का ज्यादा दायित्व अतिथि शिक्षकों के कंधों पर टिका होता है।   अधिकांश राज्यों में शिक्षकों के प्रति राजनीतिक उदासीनता ने उन्हें मजदूरों के स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। मजदूरों को भी कार्य दिवसों के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता है और अतिथि शिक्षकों को भी। जिन राज्यों में मासिक आधार पर निर्धारित धनराशि देने का प्रावधान है भी तो वह अपर्यात है। मजदूरों और अतिथि शिक्षकों में बस फर्क सिर्फ इतना रह गया है कि अतिथि शिक्षकों को मजदूरों की तरह काम के लिए चौराहों पर खड़ा नहीं होना पड़ता। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में मजदूरों को वर्ष में 100 दिनों के रोजगार की सरकारी गारंटी है, लेकिन सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में काम करने वाले अतिथि शिक्षकों को वर्ष में कितने दिन का काम मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लाला जी की दुकान पर काम करने वालों और घरों में काम करने वाली महिलाओं को महीने की तय धनराशि के आधार पर काम पर रखा जाता है। आमतौर पर इन्हें सप्ताह में एक दिन छुट्टी मिलती है जिसके पैसे नहीं कटते। और इन कार्यो को करने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता भी निर्धारित नहीं है, जो मानवीय पहलू के सकारात्मक पक्ष को दर्शाता है।    शैक्षणिक योग्यता प्राप्त अतिथि शिक्षक विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। अधिकांश राज्यों में उन्हें कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों के पैसे काट लिए जाते हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने वाले देश में क्या राज्य सरकारें आर्थिक रूप से इतनी कमजोर हो गयी हैं कि अतिथि शिक्षकों को रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों के पैसे देने में असमर्थ हैं। अतिथि शिक्षकों पर कभी भी कार्यमुक्त होने का खतरा मंडराता रहता है। ऐसे शिक्षकों के रोजगार की अनिश्चितता शोले फिल्म के उस डायलाग की याद दिलाती है जिसमें गब्बर सिंह बसंती को डांस करने को मजबूर करता है और फिर कहता है, कि जब तक तेरे पैर चलेंगे, तब तक उसकी यानी वीरू की सांसे चलेंगी। अतिथि शिक्षकों की नौकरी भी तभी तक लगातार चल पाती है जब तक कि उस पोस्ट पर कोई नियमित शिक्षक नहीं आ जाता। नियमित शिक्षक के आने पर अतिथि शिक्षक स्वतः ही कार्यमुक्त हो जाते हैं। उन्हें शिक्षक के रूप में फिर से काम करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों एवं कस्बों की ओर आए बेरोजगार युवक निराश होकर वापस गांव लौट जाते हैं। अतिथि शिक्षकों को उनके निवास से इतनी दूर के स्कूलों में नियुक्त कर दिया जाता है कि उनका अधिकांश समय आने जाने में ही व्यतीत हो जाता है।    जब भी कभी अतिथि शिक्षकों का कोई आंदोलन सक्रिय होता है तो गिद्ध की दृष्टि लगाए बैठी राजनीति आंदोलन का राजनीतिक अपहरण कर उसको निष्प्रभावी बनाने का काम करती है। देश की राजधानी दिल्ली में अतिथि शिक्षकों के ऐसे कई आंदोलन राजनीतिक अपहरण का शिकार हो चुके हैं। यही वजह है कि दिल्ली में अतिथि शिक्षकों को पक्का करने की खोखली घोषणाएं कच्ची साबित हुई हैं। ऐसी घोषणाओं के लगे पोस्टर कई स्कूलों में आज भी देखे जा सकते हैं। अतिथि शिक्षकों की कुंठा एक ऐसी असमंजसता में फंसी है जो उन्हें न तो रोजगार में होने की अनुभूति होने देती है और न ही बेरोजगार होने की। भारत में हर वर्ष परीक्षा पर चर्चा होती है पर नौकरियों के लिए आयोजित उन प्रतियोगी परीक्षाओं पर चर्चा नहीं होती जिनमें पेपर लीक होने के कारण नियुक्तियों की प्रक्रिया को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है। समय समय पर देश के कई राज्यों में अतिथि शिक्षकों के मामले माननीय न्यायालयों में सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ जाते हैं। भारत में सरकारी क्षेत्र में बढ़ती ठेकेदारी प्रथा ने एक अलग तरह के सामन्तवाद को जन्म देने का काम किया है।  शिक्षा से संबंधित संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में शिक्षकों के करीब दस लाख पद खाली पड़े हैं। चौंकाने वाली यह भी है कि केन्द्रीय सरकार द्वारा संचालित केन्द्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों में रिक्त पद अपेक्षाकृत अधिक हैं। उक्त आंकड़ों के आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूर दराज के क्षेत्रों में शिक्षकों के रिक्त पदों की हालत क्या होगी। उक्त संसदीय समिति ने जल्द ही खाली पदों को भरने को कहा है ताकि शिक्षा व्यवस्था की सुचारूता को सुनिश्चित किया जा सके। भारत जिस शिक्षा व्यवस्था के दम पर विश्व गुरू बनने के सपने देख रहा है, वह अभी कोसों दूर नजर आता है। जब शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों को पढ़ाने वाले पर्याप्त संख्या में नियमित गुरू ही नहीं होंगे तो भारत विश्व गुरू कैसे बन पाएगा। अतिथि शिक्षकों की यह कैसी मेहमाननवाजी है जो उन्हें बेरोजगारी से जूझने को विवश कर रही है। चंद राज्यों ने अस्थाई शिक्षकों के हित के लिए सराहनीय प्रयास भी किए हैं पर यह समस्या राष्ट्रीय स्तर की है तो इसके समाधान भी राष्ट्रीय स्तर के होने चाहिए। बेहतर होगा कि अतिथि या अस्थाई शिक्षकों के लिए स्थाई रोजगार की व्यवस्था पर अधिक ध्यान दिया जाए। ओ पी सोनिक

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