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रोज़गार के कम अवसरों से भी एकल परिवारों को मिल रही है गति !

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सुनील कुमार महला किसी भी व्यक्ति के विकास के लिए परिवार व समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। व्यक्ति समाज में रहता है और आज भारत में दो प्रकार के परिवार हैं -संयुक्त परिवार और एकल परिवार। आंकड़ों की बात करें तो 2021 के डेटा के अनुसार भारत में 30.24 करोड़ परिवार निवास करते हैं। इसके अनुसार भारत में 58.2 फीसदी एकल परिवार हैं तथा 41.8 फीसदी परिवार संयुक्त परिवार हैं। मतलब यह है इस डेटा के अनुसार भारत में संयुक्त परिवारों की संख्या एकल परिवारों की तुलना में कहीं कम है।आज भारतीय समाज में आज एकल परिवार(न्यूक्लियर फैमिली) का कंसेप्ट लगातार बढ़ता चला जा रहा है और संयुक्त परिवारों(जॉइंट फैमिलीज)की संख्या में कमी देखने को मिल रही है। कारण बहुत से हैं।आज पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति, बढ़ते शहरीकरण, बढ़ती जनसंख्या के गहरे प्रभाव के कारण आज भारतीय समाज का परिवेश, वातावरण लगातार बदल रहा है। सबसे पहला कारण तो बढ़ती जनसंख्या ही है क्योंकि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे ही रोजगार के अवसरों में कमी होती चली जाती है और एकल परिवार का कंसेप्ट जन्म लेने लगता है। जब जनसंख्या में वृद्धि होती है तो लोगों को काम के संदर्भ में अपने घर से दूर दूसरे स्थानों , दूसरे राज्यों में यहां तक कि दूसरे देशों में जाकर काम करने के लिए विवश होना पड़ता है और इसका असर यह होता है कि समाज में एकल परिवार बढ़ने लगते हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, आज भी यह देश कृषि प्रधान ही है। पहले के जमाने में मतलब कि आज से तीस-पैंतीस या चालीस बरस पहले लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि और पशुपालन हुआ करता था। मतलब यह है कि पहले के जमाने में कृषि और पशुपालन पर निर्भरता ज्यादा थी, इसलिए लोग संयुक्त परिवार में रहना पसंद करते थे। आज कृषि और पशुपालन के अतिरिक्त लोगों की आजीविका के अनेक साधन उपलब्ध हैं, इसलिए लोग आज गांवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं और एकल परिवार का कंसेप्ट समाज में बढ़ने लगा है। पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के प्रभाव के कारण आज बुजुर्गों का परिवार में वह सम्मान नहीं रहा है जो बरसों पहले हुआ करता था। पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के प्रभाव के कारण आज हमारे समाज में नैतिक मूल्यों, संस्कारों, संस्कृति में निरंतर गिरावट आई है। बुजुर्गों की टोका-टाकी आज के युवा सहन नहीं कर पाते। आज की युवा पीढ़ी में सहनशक्ति का अभाव हो गया है और सहनशक्ति के अभाव के कारण भी कहीं न कहीं संयुक्त परिवार आज टूटकर एकल परिवार का रूप धारण कर रहे हैं।  आज की युवा पीढ़ी पर स्वार्थ, लालच, अहम् की भावना,अहंकार, क्रोध हावी हो रहा है जो संयुक्त परिवारों को लगातार तोड़ रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि संयुक्त परिवार को जोड़ कर रखने के लिए सेवा, त्याग, धैर्य, अनुशासन, सहनशीलता, प्यार, सम्मान, समझदारी, न्यायपूर्ण व्यवहार आदि की आवश्यकता होती है। समर्पण और त्याग की भावना बहुत ही जरूरी है। बिना समर्पण और त्याग की भावना के परिवार को जोड़ कर नहीं रखा जा सकता है। आपसी विश्वास, सहनशक्ति भी परिवार को जोड़ कर रखने के लिए एक आवश्यक शर्त है। बड़े बुजुर्ग यदि किसी बात पर दो बातें युवा पीढ़ी को कह भी दें तो युवा पीढ़ी को यह चाहिए कि वह अपने बुजुर्गों की बात को मान लें. बुजुर्गों का कहना मान लेने से युवा पीढ़ी का कुछ बिगड़ नहीं जाएगा क्योंकि कोई भी बुजुर्ग/परिवार का मुखिया कभी भी अपने बच्चों के बारे में, अपने परिवार के बारे में कभी भी बुरा नहीं सोच सकता है। युवा पीढ़ी को यह बात याद रखनी चाहिए कि बच्चे चाहे जितने बड़े हो जाएं, बड़ों के सामने वे हमेशा बच्चे ही होते हैं। संयुक्त परिवार के अपने फायदे हैं। मसलन, एक संयुक्त परिवार में बच्चों को सर्वाधिक सुरक्षित और उचित शारीरिक एवं चारित्रिक विकास के अवसर प्राप्त होते हैं। परिवार के मुखिया या सदस्यों द्वारा बच्चों की इच्छाओं और आवश्यकताओं का अधिक ध्यान रखा जा सकता है। उसे परिवार के अन्य बच्चों के साथ खेलने, घुलने-मिलने के अवसर प्राप्त होते हैं। संयुक्त परिवार में माता-पिता के साथ-साथ ही अन्य परिवारजनों (परिजनों) विशेष तौर पर दादा-दादी, चाचा-चाची का प्यार भी मिलता है। आज की युवा पीढ़ी को यह लगता है कि लगता है कि जॉइंट फैमिली में उन्हें कई तरह की रोक-टोक का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी आजादी छिन जाती है। लेकिन यह विडंबना ही है कि हमारी युवा पीढ़ी यह भूल जाती है कि जॉइंट फैमिली में रहना अकेले रहने से कहीं ज्यादा सिक्योर होता है। एक व्यक्ति संयुक्त परिवार में जितना खुश रह सकता है, उतना शायद एकल परिवार में नहीं। एकल परिवार में व्यक्ति को अक्सर तनाव और अवसाद का सामना करना पड़ता है क्योंकि किसी परेशानी और मुसीबत के समय उनके पास सहायता करने वाला, उनका दुःख, परेशानी, तकलीफ़ सुनने वाला, दुःख को बांटने वाला कोई नहीं होता है। संयुक्त परिवार में रहने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी भी परेशानी या मुसीबत, दुःख और तकलीफ़ का सामना हमें अकेले नहीं करना पड़ता है। हमारे साथ हर कठिन व नाजुक परिस्थितियों में हमारे घर -परिवार के लोग हमेशा हमारी सपोर्ट के लिए हमारे साथ होते हैं। घर में अनेक लोग हमारे मार्गदर्शक होते हैं, जो हमें कठिनाइयों से आसानी से बाहर निकाल ले जाते हैं। संयुक्त परिवार में हमें फाइनेंशियल सपोर्ट भी अच्छी मिलती है क्योंकि वहां कमाने वाले अधिक होते हैं। संयुक्त परिवार में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य सदस्यों के कारण अच्छी परवरिश मिलती है और बच्चे एकल परिवार की तुलना में कहीं अधिक संस्कारी बनते हैं, कारण यह है कि संयुक्त परिवार में बच्चों को सही-गलत,अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक, सकारात्मक-नकारात्मक की पहचान कराने के लिए कोई न कोई सदस्य अवश्य ही मौजूद होते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि संयुक्त परिवार अंतर-पीढ़ीगत अंतःक्रियाओं के माध्यम से सांस्कृतिक परंपराओं और मूल्यों को संरक्षित करने के लिए उत्कृष्ट हैं। उत्कृष्ट इसलिए क्यों कि बुजुर्ग लोग  हमारे देश के विभिन्न सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, प्रेरक नैतिक कहानियों और मूल्यों और संस्कृति -संस्कारों को युवा पीढ़ी तक पहुंचाते हैं। ज्ञान का यह हस्तांतरण सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता सुनिश्चित करता है।  संयुक्त परिवार में बच्चों को अकेलापन महसूस नहीं होता है और परिवार का कोई भी सदस्य बेखौफ कहीं भी इधर उधर जा सकता है। संयुक्त परिवार में भावनात्मक समर्थन और साहचर्य बच्चों को मिलता है जो एकल परिवार में उस रूप में नहीं मिल पाता है। संयुक्त परिवार में जिम्मेदारियां (घरेलू काम-काज, बच्चों की देखभाल और वित्तीय-प्रबंधन) साझा होने के कारण परिवार के समक्ष जल्दी से कोई परेशानियां नहीं आ पातीं हैं। संयुक्त परिवार से बच्चों में सामाजिकता का भरपूर विकास होता है और संबंध घनिष्ठ और मजबूत बनते हैं।संयुक्त परिवारों में अक्सर बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए एक अंतर्निहित व्यवस्था होती है, जिसमें दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्य बच्चे के पालन-पोषण में योगदान देते हैं। संयुक्त परिवार का एक फायदा यह भी है कि इसमें विभिन्न संसाधनों को आपस में साझा किया जा सकता है। सोशल नेटवर्क का भी निर्माण होता है। हालांकि कुछ लोग संयुक्त परिवार के नुकसान भी मानते हैं जैसे कि ऐसे परिवार अनेक बार भावनात्मक और वित्तीय सहायता के लिए परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भरता की भावना को बढ़ावा देते हैं। संयुक्त परिवार से जनरेशन गैप को बढ़ावा मिलता है क्योंकि युवा सदस्यों के विचार बुजुर्गों के विचारों(पारंपरिक मान्यताओं और मूल्यों) से मेल नहीं खाते हैं। संयुक्त परिवार में निर्णय लेने की स्वतंत्रता सीमित होती है क्योंकि परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ही ऐसे परिवारों में निर्णय लेता है। पारिवारिक सदस्यों की अधिक निकटता के कारण पारिवारिक सदस्यों में अनेक बार संघर्ष और मतभेद की स्थितियां पैदा हो सकतीं हैं। संयुक्त परिवार में गोपनीयता का भी अभाव होता है और इससे तनाव पैदा हो सकता है।कभी-कभी, परिवार के कुछ सदस्यों को पक्षपात या असमान व्यवहार का सामना करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप असंतोष और विभाजन पैदा होता है। संचार संबंधी चुनौतियां भी संयुक्त परिवार में देखने को मिल सकतीं हैं। सुनील कुमार महला

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लेख समाज

साइलेंट किलर ‘ध्वनि प्रदूषण’ के आगोश में मानवजाति

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सुनील कुमार महला ध्वनि प्रदूषण की समस्या भारत में आज एक बड़ी शहरी समस्या है, जो एक अदृश्य प्रदूषण है। सच तो यह है कि ध्वनि प्रदूषण एक साइलेंट किलर है। बढ़ती जनसंख्या, लगातार बढ़ते शहरीकरण, अंधाधुंध औधोगिकीकरण, लगातार बढ़ते ट्रैफिक, विकास के आयामों के कारण आज ध्वनि प्रदूषण की समस्या ने बहुत ही विकराल रूप धारण कर लिया है। औधोगिक घरानों में मशीनों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण,वाहनों के हॉर्न बजाने से होने वाला प्रदूषण, सड़क पर काम करने वाले लोगों द्वारा ड्रिलिंग करने से होना वाला प्रदूषण, डीजे, बैंड व लाउडस्पीकरों से होने वाला प्रदूषण तथा अन्य चीजों से पैदा होने वाला शोर हमारे शांत वातावरण में जहां एक ओर व्यवधान पैदा करता है वहीं दूसरी ओर जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं, ध्वनि प्रदूषण प्रजनन चक्र बाधित होने के साथ ही साथ प्रजातियों के विलुप्त होने को भी तेज करता है। आज प्लंबिंग, बॉयलर, जनरेटर, एयर कंडीशनर और पंखे, कूलर शोर का कारण बनते हैं।बायलर, टरबाइन, क्रशर तो बड़े कारक हैं ही, परिवहन के लगभग सभी साधन तेज ध्वनि पैदा कर, कोलाहल के साथ वायु प्रदूषण भी बढ़ाते हैं। विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों के पैदा होने वाला शोर भी बड़ा कारण है। इतना ही नहीं,बिना इन्सुलेशन वाली दीवारें और छतें पड़ोसी इकाइयों से आने वाले संगीत, आवाज़ें, कदमों और अन्य गतिविधियों को प्रकट करतीं हैं। विमान, ड्रिलिंग , विभिन्न आपातकालीन वाहन यथा एंबुलेंस, अग्निशमन यंत्र व गाड़ियां, पटाखों का फोड़ना भी शोर के कारण बनते हैं। मनोरंजन के साधन टीवी, रेडियो भी ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं। जेट विमान तो शोर के कारण हैं ही। विभिन्न धार्मिक, वैवाहिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक कार्यक्रमों में भी ध्वनि विस्तारकों का प्रयोग शोर को बढ़ावा देता है। इतना ही नहीं बिजली कड़कने, ज्वालामुखी, भूकंप , विस्फोट अन्य कारण हैं। यहां तक कि वैक्यूम क्लीनर और विभिन्न रसोई उपकरण शोर पैदा करते हैं। आज के समय में विवाह शादियों में खानपान, डीजे डांस और नाइटलाइफ़, आउटडोर बार, रेस्तरां और छतों पर 100 डीबी से ज़्यादा शोर सुनने को मिलता है। सच तो यह है कि पब और क्लब शोर करते हैं। यहां तक कि मस्जिदों, मंदिरों, चर्चों और अन्य संस्थानों में भी आज निश्चत डेसिबल स्तरों से ऊपर शोर सुनने को मिलता है। इतना ही नहीं,पशु-पक्षियों तक की भूमिका भी बहुत बार शोर में होती है।उल्लेखनीय है कि ध्वनि प्रदूषण एक अवांछित ध्वनि है जो पशु (वन्य जीवों ) और मानव व्यवहार को प्रभावित कर सकती है, हालांकि यह भी एक तथ्य है कि सभी शोर प्रदूषण नहीं होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 65 डेसिबल से ऊपर के शोर को प्रदूषण के रूप में वर्गीकृत करता है। 75 डेसिबल पर शोर हानिकारक है और 120 डेसिबल पर कष्टदायक है। शोर का उच्च स्तर मनुष्य और प्राणियों दोनों के ही स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।शोर का उच्च स्तर बच्चों और बुजुर्गों में टिनिटस या बहरापन पैदा कर सकता है। चिकित्सकों का मानना है कि 80 डीबी(डेसिबल) वाली ध्वनि कानों पर अपना प्रतिकूल असर डालती है। 120 डीबी की ध्वनि कान के पर्दों पर भीषण दर्द उत्पन्न कर देती है और यदि ध्वनि की तीव्रता 150 डीबी अथवा इससे अधिक हो जाए तो कान के पर्दे फट सकते हैं, जिससे व्यक्ति बहरा हो सकता है। गौरतलब है कि मानव कान अनुश्रव्य (20 हर्ट्ज से कम आवृत्ति) और पराश्रव्य (20 हजार हर्ट्ज से अधिक आवृत्ति) ध्वनि को सुनने में अक्षम होता है। आज लगातार शोर के संपर्क में रहने से मानव कान कमजोर होते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनियाभर में लगभग डेढ़ अरब लोग इस समय कम सुनाई देने की अवस्था के साथ जीवन गुजार रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट दर्शाती है कि 2050 तक दुनिया में हर चार में से एक व्यक्ति यानी लगभग 25 प्रतिशत आबादी किसी न किसी हद तक श्रवण क्षमता में कमी की अवस्था के साथ जी रही होगी। अत्यधिक तेज, लगातार शोर के कारण श्वसन संबंधी उत्तेजना, नाड़ी का तेज चलना, उच्च रक्तचाप, माइग्रेन, गैस्ट्राइटिस, कोलाइटिस और दिल का दौरा पड़ना आदि हो सकता है। शोर परेशानी, थकान, अवसाद, चिंता, आक्रामकता और उन्माद पैदा कर सकता है। यह हमारी एकाग्रता में कमी लाता है। अध्ययन में विशेष व्यवधान पैदा करता है। 45 डेसिबल से अधिक शोर नींद में खलल(अनिद्रा की शिकायत) डालता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 30 डेसिबल की सिफारिश करता है। बहरहाल, आंकड़े बताते हैं कि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि हर वर्ष योरोपीय संघ में ध्वनि प्रदूषण के कारण 12 हजार लोगों की असामयिक मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वायु प्रदूषण के बाद शोर स्वास्थ्य समस्याओं का दूसरा सबसे बड़ा पर्यावरणीय कारक है। शोर हमारे हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के साथ ही हमारी जीवनशैली को भी प्रभावित करता है। अवांछित और अप्रिय शोर मनुष्य में तनाव, अवसाद लाता है और चिड़चिड़ापन पैदा करता है। यहां यह गौरतलब है कि वर्ष 2018 में जारी अपने दिशा-निर्देशों में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिन के समय ध्वनि प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों के लिए पृथक मापदंड जारी किये थे, जिसके अनुसार सड़क यातायात में दिन के समय शोर का स्तर 53 डेसिबल, रेल परिवहन में 54, हवाई जहाज और पवन चक्की चलने के दौरान 45 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। आज लोग भले ही ध्वनि विस्तारकों को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानने लगें हों लेकिन ये प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। वर्ष 2005 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने लाउडस्पीकरों पर आदेश देते हुए यह कहा था कि ऊंची आवाज़ सुनने के लिए मजबूर करना मौलिक अधिकारों का हनन है। आज सार्वजनिक स्थलों पर रात दस बजे से सुबह छह बजे तक शोर मचाने वाले उपकरणों पर पाबंदी है लेकिन बावजूद इसके लोग ऐसा करते हैं। आज आबादी, अस्पताल और स्कूली क्षेत्र में प्रेशर हार्न बजाने,तेज पटाखों को छोड़ने पर रोक है।ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 के अनुसार व्यावसायिक, शांत और आवासीय क्षेत्रों के लिए ध्वनि तीव्रता की सीमा तय है।औद्योगिक क्षेत्रों में दिन में 75 और रात न 70 डेसिबल की सीमा सुनिश्चित है। व्यावसायिक क्षेत्रों के लिए दिन में 65 और रात में 55, आवासीय क्षेत्रों में दिन में 55 और रात में 45 तो शांत क्षेत्रों में दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल तीव्रता की सीमा तय है। यह ठीक है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) एक मौलिक अधिकार है, जो किसी को भी बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांति से इकट्ठा होने, भारत के किसी भी हिस्से में रहने आदि की स्वतंत्रता की गारंटी देता है लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि कोई भी अपने मौलिक अधिकारों का दुरूपयोग करे। जीवन को शांति और संयम के साथ जीने का अधिकार धरती के प्रत्येक प्राणी को है, इसलिए इस धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होते हुए हमें यह चाहिए कि हम ऐसा कोई भी व्यवहार न करें जिससे दूसरों की ज़िंदगी में खलल, व्यवधान अथवा कोई परेशानियां पैदा हों। सुनील कुमार महला

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