लेखक परिचय

दुलीचंद कालीरमन

दुलीचंद कालीरमन

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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दुलीचन्द रमन
कभी विश्व में थानेदार की भूमिका निभाने वाला अमेरिका आज कई मोर्चो पर एक साथ लड़ रहा है। ये अमेरिका की फितरत है कि वह कभी शांत नहीं बैठ सकता। चाहे वियतनाम, जापान, अफगानिस्तान, अरब देशों के साथ युद्व का इतिहास रहा हो या सोवियत संघ से लंबा शीत युद्व। अमेरिका अमुमन हर वैशविक संघर्ष में एक पक्ष रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमेरिका ने कई नये मोर्चे भी खोल दिये है। इन मोर्चो पर लड़ाई के आयाम भी अलग-अलग है। चूंकि ट्रम्प की पृष्ठभूमि एक उद्योगपति की रही है। इसलिए उसके सोचने का नजरिया भी अमेरिका के पूर्व के राष्ट्रपतियों से थोड़ा अलग है।
ट्रम्प चीन के साथ 32.5 लाख करोड़ के व्यापार घाटे को लेकर चिंतित है। वह जानता है कि चीन ने ऐसी आर्थिक और व्यापारिक बढ़त बना ली है जिससे अमेरिका सकपकाया हुआ है। एक अनुमान के अनुसार चीनी अर्थव्यवस्था सन् 2030 तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पछाड़ देगी। अमेरिका को बढ़ते व्यापार घाटे की इतनी चिन्ता नहीं होती अगर चीन सिर्फ एक व्यापारी देश ही होता। अमेरिका चीन की सैन्य महत्वकांक्षाओं से बेखबर नही है। एक समय वो था जब अमेरिका आई.एम.एफ, विश्व बैंक तथा विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के माध्यम से बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की धुरी था। आज अमेरिका जब घरेलू उद्योग व रोजगार बचाने के लिए चीनी सामान के आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाता है तो चीन उसे उसी खुली  प्रतिस्पर्धा  की दुहाई देता है।
डोनाल्ड ट्रम्प और चीनी सरकार इस व्यापार युद्व में खुलकर आमने-सामने आ चुके है। अप्रैल के प्रथम सप्ताह में जब ट्रम्प प्रशासन ने चीन से आयात पर 50 बिलियन डालर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा तो सिर्फ ग्यारह घंटों में ही चीन ने बदले की कार्यवाही करते हुए अमेरिका से आयतित 106 वस्तुओं पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दे दी। चीन ने इस व्यापार युद्व में ट्रम्प के खिलाफ राजनीतिक चाल भी चल दी है। शुल्क बढ़ोतरी में सोयाबीन को भी शमिल कर लिया जिसका निर्यात अमेरिका से चीन को 12 बिलियन डालर का होता है। अगर यह निर्यात प्रभावित हुआ तो यह अमेरिका के उस क्षेत्र में सबसे ज्यादा बैचेनी पैदा करेगा जहाँ से ट्रम्प को सबसे ज्यादा वोट मिले थे।
दूसरा मोर्चा उत्तर कोरिया का है जो अमेरिका के साथ वैसे तो वार्ता के लिए तैयार हो गया है लेकिन उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोग ने पहले तो शीतकालीन खेलों के माध्यम से कूटनीतिक पहल करके दक्षिण कोरिया से संबंधों को सामान्य करने का प्रयास किया तथा फिर गुप-चुप तरीके से ट्रेन के माध्यम से चीन की यात्रा करके वार्ता का परिदृश्य ही बदल दिया। चीन कभी भी नहीं चाहेगा कि अमेरिका की परेशानियाँ कम हो। उत्तर कोरियाई शासक को चीन का आशिर्वाद ट्रम्प-किम जोंग वार्ता में उत्तर कोरिया को बल प्रदान करेगा। इस वार्ता में अप्रत्यक्ष रूप में चीन की भूमिका महत्त्वपूर्ण रहने वाली है क्योंकि उत्तर कोरिया व्यापार और अर्थव्यवस्था के मामले में चीन पर आश्रित है।
अफगानिस्तान का मोर्चा भी जीत से कोसों दूर है। तालिबान अभी भी अफगानिस्तान में अपनी पैठ बनाये हुए है। अफगानिस्तान की सरकार की विश्वसमीयता पर उनके ही देश में प्रश्न चिन्ह लगे है। तालिबान को साधने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान पर सिंकजा कस दिया था। पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक व सैन्य सहायता पर अंकुश लगा दिया तो पाकिस्तान ने अपना पाला बदल लिया अैर चीन की शरण में चला गया।
एक अन्य मोर्चा रूस के साथ है। रूस द्वारा अपने एक पूर्व-जासूस को बिट्रेन में जहर देने की घटना के बाद पश्चिमी देशों और रूस के बीच राजनायिकों के निष्कासन की होड़ ही लग गई। अमेरिका व कई अन्य पश्चिमी राष्ट्रों ने 150 रूसी राजनायिकों को निष्कासित कर दिया। अमेरिका और रूस के हित सीरिया में जारी संघर्ष में भी एक दूसरे से टकरा रहे है। राजधानी दमिश्क में राष्ट्रपति असद समर्थित सेना द्वारा रासायनिक हथियारों के प्रयोग के कारण अमेरिका, फ्रांस तथा बिट्रेन ने संयुक्त रूप से बदले की कार्यवाही करते हुए सीरिया पर मिसाईल हमले भी किये है। रूस अगर इन हमलों का जवाब देता है तो ये तीसरे विश्व युद्व की आहट होगी।
भारत को ट्रम्प प्रशासन रणनीतिक सांझेदार के रूप में देखता है। इसके साथ-साथ व्यापारिक मोर्चे पर दो-दो हाथ करने के मूढ़ में है। पिछले दिनों अमेरिका निर्मित हार्ले-डेविडसन मोटर साईकिल पर भारत द्वारा आयात शुल्क का मुद्दा बनाना, स्टील व ऐल्युमिनियम आयात पर अमेरिका द्वारा अतिरिक्त आयात शुल्क थोपने के कारण भारतीय इस्पात उद्य़ोग के लिए समस्या खड़ी हो सकती है। अमेरिका में साफ्टवेयर क्षेत्र में काम कर रही भारतीय कंपनियों पर अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देने के लिए दबाव डालने जैसे कई फैसले द्विपक्षीय संबंधों पर काली छाया की तरह रहे है। लेकिन भारत अब किसी एक देश का पिछलग्गू नही रह गया है। ये बात अमेरिका को भी समझ में आ चुकी है। भारत शीत युद्व के दौरान की केचुल भी उतार चुका है। हथियारों के मामले में सिर्फ रूस पर निर्भरता खत्म हो चुकी है। अब हम पश्चिम के देशों की यात्रा सिर्फ वित्तिय अनुदान के लिए ही नहीं करते।
भारत के पड़ोस में अमेरिका का सीधा टकराव केवल चीन से है। जिसके साथ दक्षिण चीन सागर में कई मुद्दों पर उसका विवाद चल रहा है। भारत हिन्द-प्रंशात क्षेत्र एक मजबूत नौ-सैनिक शक्ति है। इस क्षेत्र में चीन को रणनीतिक रूप से साधने में भारत की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। जिसे अमेरिका नज़र अंदाज नही कर सकता।
उत्तर-कोरिया तथा सीरिया में अमेरिकी टकराव चीन और रूस को और पास लाने का कारण बनेगा। डोनाल्ड ट्रम्प की अमेरिका में विश्वसनियता कम होती जा रही है जबकि पुतिन और शी जिनपिंग की सता को उनके देशों में फिलहाल कोई चुनौती नहीं है। अगर दूसरा शीत युद्व शुरू हुआ तो इसमें व्यापार मुख्य मुद्दा रहेगा। जाहिर है नई व्यवस्था में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नये नियम व संस्थायें वजूद में आयेगी। भारत के लिए वैश्विक तनातनी के इस माहौल में बहुत संभल कर चलने का समय है। रूस हमारा मित्र देश रहा है। जिस से हम अभी तक रक्षा सामग्री लेते रहे है। चीन जैसी अविश्वसनीय सैन्य व आर्थिक शक्ति हमारे पड़ोस में है जिसको नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता।
विश्व स्तर पर वर्चस्व की लड़ाई में भारत के लिए कई चुनौतियाँ तो आयेगी ही मगर कई अवसर भी पैदा होंगे। हमें टकराव में भी सहयोग के रास्ते ढूँढ़ने होगें। क्योंकि कभी-कभी तनाव भी विदेश नीति का एक हथियार होता है।

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