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    Homeराजनीतिन्यायिक अंधेरों में उम्मीद की किरण बनतेे चन्द्रचूड़

    न्यायिक अंधेरों में उम्मीद की किरण बनतेे चन्द्रचूड़

    -ललित गर्ग-

    भारत की न्याय प्रणाली विसंगतियों एवं विषमताओं से घिरी है। संवैधानिक न्यायालय का गठन बड़ा अलोकतांत्रिक व दोषपूर्ण है। न्याय-व्यवस्था जिसके द्वारा न्यायपालिकाएं अपने कार्य-संचालन करती है वह अत्यंत महंगी, अतिविलंबकारी और अप्रत्याशित निर्णय देने वाली है। ‘न्याय प्राप्त करना और इसे समय से प्राप्त करना किसी भी राज्य व्यवस्था के व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार होता है।’ ‘न्याय में देरी न्याय के सिद्धांत से विमुखता है।’ भारतीय न्यायिक व्यवस्था में विद्यमान इन चुनौतियों एवं विसंगतियों को दूर करने के लिये भारत के 50वें प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) के रूप में शपथ लेने के बाद से ही जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ लगातार सक्रिय एवं संकल्पित है। वे न्याय-प्रक्रिया की कमियों एवं मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं तो उनमें सुधार के लिये जागरूक दिखाई दे रहे हैं। निश्चित ही उनसे न्यायपालिका में छाये अंधेरे सायों में सुधार रूपी उम्मीद की किरणें दिखाई देने लगी है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में वह पहले ही कई महत्त्वपूर्ण फैसलों के कारण चर्चा में रहे हैं। प्रधान न्यायाधीश के रूप में उन्होंने देश की न्यायपालिका के आमूल-चूल स्वरूप में परिवर्तन पर खुलकर जो विचार रखे हैं वे साहसिक एवं दूरगामी सोच से जुड़े होने के साथ आम लोगों की धारणा से मेल खाते हैं। नया भारत बनानेे एवं सशक्त भारत बनाने के लिये न्यायिक प्रक्रिया में सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
    आजादी के अमृत महोत्सव की चौखट पार कर चुके देश की न्याय व्यवस्था अभी तक औपनिवेशिक शिकंजे में जकड़ी हुई है। उच्चतर न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी है तो अधिकांश निचली अदालतों की कार्रवाई और पुलिस विवेचना की भाषा उर्दू है। वह आम आदमी के पल्ले नहीं पड़ती। समय आ गया है कि यह सब आम आदमी की भाषा में हों। वर्षों-वर्ष चलने वाले मुकदमों का खर्च भी बहुत ज्यादा है। न्याय प्रक्रिया की कोई सीमा-अवधि नहीं है। इसलिए निचली अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक समस्त न्यायालयों को दो पालियों में चलाने का प्रावधान किया जाना चाहिए। नए न्यायालय भी स्थापित किए जाने चाहिए। सरकारी विद्यालयों एवं अन्य सरकारी भवनों में दूसरी पाली में न्यायालय चलाए जाने चाहिए, ताकि न्यूनतम अतिरिक्त खर्च में काम प्रारंभ किया जा सके। न केवल न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरा जाना चाहिए, बल्कि जनसंख्या और लंबित मामलों का संज्ञान लेते हुए न्यायिक कर्मियों की नियुक्ति भी की जानी चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ के ताजा वक्तव्यों में ऐसे ही सुधार को अपनाने के संकेत मिल रहे हैं, जो स्वागतयोग्य होने के साथ सराहनीय भी है।
    जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जिला अदालतों को हाई कोर्ट का अधीनस्थ न्यायालय नहीं माना जाए और जिला जजों के साथ भी समानता का व्यवहार किया जाए। उन्होंने न्यायालयों को पुरुष मानसिकता से बाहर निकालने और महिलाओं को न्याय प्रक्रिया में उचित भागीदारी देने की भी वकालत की है। अभी अदालतों में महिला जजों की संख्या नाममात्र ही है। न्यायप्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने का भी उन्होंने संकल्प जताया और न्याय प्रक्रिया में अंग्रेजी के वर्चस्व को भी एक तरह से चुनौती दी। उनकी यह चिंता वाजिब है कि जब तक भारतीय भाषाओं को न्याय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक आम लोगों को न्याय प्रक्रिया में शामिल करना मुश्किल होगा। अभी वादी की याचिका पर बहस और फैसले अंग्रेजी में होते हैं, जो अंग्रेजी नहीं जानने वालों की समझ में नहीं आते। ऐसे में न्याय पर उनका पूरा भरोसा हासिल करना भी कठिन है। न्यायिक सुधार की दिशा में ये और ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिन पर लंबे समय से चर्चा की जरूरत तो महसूस होती रही है पर किसी प्रधान न्यायाधीश ने खुलकर पहल नहीं की थी। उम्मीद है जस्टिस चंद्रचूड़ अब इन मुद्दों पर बहस का खुला वातावरण बनाकर उसे निर्णायक मोड़ तक ले जाएंगे। इसके लिए उनके पास करीब दो साल तक का समय होगा।
    निचली अदालतों से लेकर शीर्ष अदालत तक किसी भी मामले के निपटारे के लिए नियत अवधि और अधिकतम तारीखों की संख्या तय होनी ही चाहिए। जैसाकि अमेरिका में किसी भी मामले के लिये तीन वर्ष की अवधि निश्चित है। लेकिन भारत में मामले 20-30 साल चलना साधारण बात है। तकनीक का प्रयोग बढ़ाने और पुलिस द्वारा की जाने वाली विवेचना में भी सुधार जरूरी है। एक सक्षम न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन करके इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। उत्कृष्ट लोकतान्त्रिक देशों की तरह भारत की एक अत्यंत शक्तिशाली व स्वतंत्र न्यायपालिका है। न्यायपालिका केवल न्याय देने का ही काम नहीं करें, बल्कि सरकार की कमियों पर नजर रखना एवं उसे चेताना भी उसका दायित्व है। सरकार के अंगों की जो बड़ी सरल परिभाषा बताई जाती है वो ये है कि विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उसे लागू करती है और न्यायपालिका उसका उल्लंघन करने वालों को दंड देती है। विधि के उल्लंघन पर ऐसे उल्लंघनकर्ता को दंडित करना न्यायालय का द्वितीयक कार्य है, बल्कि न्यायपालिका का मूल कार्य तो कार्यपालिका और व्यवस्थापिका की निरंकुशता व उसके अन्याय -अत्याचार एवं तानाशाही से समाज को बचाना और इन सबसे जनमानस में व्यवस्था के प्रति उपजे विषाद व असंतोष को संभालना होता है। लेकिन हम भारत की न्यायपालिका की भूमिका को देखें तो बड़ी निराशा होती है।
    जस्टिस चंद्रचूड के सामने अनेक चुनौतियां है, उनका मार्ग कंटकाकीर्ण है। उनके द्वारा शुरु किये सुधार-अभियान की किसी पहल का विरोध होना स्वाभाविक है। सबसे पहले तो उनको सीजेआइ बनने से रोकने के लिए याचिका लगाई गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए बनाए गए कॉलेजियम सिस्टम पर भी सवाल उठाए गए। कानून मंत्री एक से ज्यादा मौकों पर कॉलेजियम सिस्टम की खामियों को उजागर कर चुके हैं। इस मामले में भी जस्टिस चंद्रचू़ड़ ने काफी सधा हुआ बयान दिया कि आलोचनाओं को सामने आने देना चाहिए। जाहिर है यदि कॉलेजियम सिस्टम में कोई खामी है तो समीक्षा करके उसे दूर किया जा सकता है। निश्चित ही जस्टिस चंद्रचूड ने साहसिक पहल की है, सकारात्मक नजरिया अपनाते हुए उनकी पहल को आगे बढ़ाना चाहिए। सर्वप्रथम तो भारत के न्यायपालिका का संस्थागत चरित्र बदलने की जरूरत है। यह सामंती है और इसे इसके स्थान पर लोकतांत्रिक बनाना होगा। संवैधानिक जजों की चयन प्रक्रिया बहुत ही अलोकतांत्रिक है, जिसमें संविधान में वर्णित ‘हम  भारत के लोग’ इनकी कोई भूमिका नहीं है। यहां पहले से पदासीन चले आ रहे लोग अपनी पसंद के लोगों को चुनकर पदों पर बिठा देते हैं, देखते ही देखते कुछ ही वर्षों में भारत का पूरा न्यायिक तंत्र कुछ परिवारों के कब्जे में आ गया है। वर्तमान सरकार ने परिवारवादी राजनीति के साथ परिवारवादी न्याय-व्यवस्था में सुधार किये हैं।
    न्यायपालिका की हठधर्मिता, विधायिका और कार्यपालिका का न्यायिक सुधार के संबंध में उपेक्षात्मक रुख साथ-साथ भारतीय जनमानस की उदासीन भूमिका ऐसी जड़ताएं हैं जिसने अपार पीड़ा को सहते हुए भी न्यायिक सुधार की दिशा में कदम उठाने के लिए सरकारों पर दबाव बनाने का कार्य कभी नहीं किया गया, जो मिला उसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया। अनेक मामलों में अन्यायपूर्ण न्याय को स्वीकारना ही आम जनता की विवशता रही है।  भारत को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थिति और अपने गौरवपूर्ण इतिहास बोध के अनुसार एक वैकल्पिक न्याय तंत्र ही स्थापित करना चाहिए, किंतु जब तक यह नहीं होता वर्तमान व्यवस्था में ही कुछ आवश्यक सुधार करके हमें इसे समसामयिक, तीक्ष्ण, समयबद्ध और उपयोगी बनाए रखना चाहिए। न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिये बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिये। इन स्थितियों केे लिये प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के न्यायिक सुधार अभियान को तीव्र गति दिये जाने की अपेक्षा है। भारत की सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण होना चाहिए।

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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