चिन्तन के आधार पर सोच बदलने की जरूरत


 -अनिल अनूप 

देश या परिवार पर जब भी आपदा का समय हो तो आंतरिक एकता को बना कर रखना सबसे जरूरी तत्त्व होता है, जिसकी समझ शासन, प्रशासन और जन साधारण में सहज ही होनी चाहिए, क्योंकि यह सर्वमान्य और सार्वभौमिक रूप से स्थापित बात है, जिसको समझने के लिए कोई बड़ी पढ़ाई-लिखाई की जरूरत नहीं होती है। कश्मीर को लेकर देश 1947 से ही आपदाग्रस्त है, किंतु 1990 से तो पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार है। पाकिस्तान कश्मीर को आंतरिक रूप से अस्थिर करके दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि कश्मीरी अवाम भारत में नहीं, बल्कि पाकिस्तान में रहना चाहती है। इसके लिए बार-बार जनमत संग्रह की मांग करता रहता है। आधे कश्मीर को उसने हथिया कर जबरन अपने साथ मिलाने का प्रयास किया है, किंतु पाक अधिकृत कश्मीर की जनता भी वहां के दमनकारी हालात से त्रस्त है। भारत में कश्मीर का विलय कानूनी रूप से हो चुका है। इस बात को पाकिस्तान भी समझता है और इस स्थिति को पलटने के लिए कश्मीर में आंतरिक अशांति फैलाने के चक्रव्यूह रचने में लगा रहता है। इसके लिए उसने तरह-तरह के आतंकी गुटों को पाल रखा है। यह एक तरह का छद्म युद्ध है, जो पाकिस्तान भारत के साथ लड़ रहा है। इस तरह के युद्ध में पाकिस्तान कम खर्च और कम जान-माल के नुकसान से लंबी लड़ाई लड़ने के सिद्धांत पर काम कर रहा है।

इसलिए वह धन-बल, छल-बल और धार्मिक भावनाओं को भड़काने के हथकंडों  का प्रयोग करता है। कोई-कोई कश्मीरी भी उनके बहकावे में आ जाता है, किंतु समझने वाली बात यह है कि मुख्य रूप से कश्मीरी अवाम भारत के साथ खड़ा है और यदि कोई मतभेद हैं भी, तो वे हमारे आंतरिक रूप से केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर हैं। कुछ अलगाववादी नेता, जो हमारी ही कमजोर नीतियों की उपज हैं, जरूर स्थानीय युवकों को बहकाने में मामूली तौर पर कभी सफल हो जाते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि कश्मीर भारत विरोधी हो गया है, बल्कि अर्थ यह है कि भारत विरोधी पाकिस्तानी षड्यंत्र कश्मीर को अस्थिर करने के कार्य में जुटा है। इस स्थिति में भारतभर में किसी भी आतंकी घटना के बाद की प्रतिक्रिया आंतरिक एकता को मजबूत करने वाली होनी चाहिए। कुछ अतिउत्साही और कूटनीति की बारीकियों की परवाह न करने वाले तत्त्व इस तरह के समय में अवांछित रूप से फूट डालने वाली, सांप्रदायिक, क्षेत्रवादी और आपसी विश्वास को खंडित करने वाली हरकतों में लिप्त होकर अपने आप को बड़ा देशभक्त साबित करने का ओछा प्रयास करते हैं, परंतु असल में वे देश के हित को नुकसान पहुंचा रहे होते हैं और इस बात को समझने से भी इनकार करते हैं। ऐसे लोगों की हरकतों से मुकाबला करने वाली देश की एकता और आपसी विश्वास को बढ़ाने वाली सोच को सशक्त करने वाली शक्तियों को ऐसे समय में सक्रिय होना चाहिए। हाल ही के पुलवामा के निंदनीय और कायराना आतंकवादी हमले के बाद देश में प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था, किंतु यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान के विरुद्ध और आतंकवादियों के विरुद्ध ही होनी चाहिए थी। कई स्थानों पर कश्मीरी छात्रों, फेरी वालों या मजदूरों के विरुद्ध अभद्र व्यवहार की जो घटनाए हुईं, वे निस्संदेह निंदनीय और भारत देश के हितों के विरुद्ध जाती हैं। जहां पर्याप्त प्रमाण इस तरह के दुर्व्यवहार के उपलब्ध हों, वहां ऐसे लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने इस विषय में सामयिक टिप्पणी और चेतावनी देकर बहुत सही कार्य किया कि हमारी लड़ाई कश्मीरियों के लिए है, कश्मीरियों के विरुद्ध नहीं और उनके खिलाफ देश में किसी भी अभद्र व्यवहार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह ऐसा विचार है जिसका उपयोग देश की एकता और अखंडता को सशक्त करने में किया जाना चाहिए। जो इसका सम्मान नहीं करते उनके सुधार के मजबूत उपाय करने की जरूरत है। इस तरह की फूट डालने वाली शक्तियां और मसलों के समय भी जाति, क्षेत्र और कभी संप्रदाय के नाम पर सक्रिय हो जाती हैं। कुछ तो वोट बैंक के चक्कर में और कुछ अपने आप को बड़ा देशभक्त बताने के चक्कर में ओछी हरकतों में लिप्त हो जाते हैं। यदि वे किसी विचारधारा के कारण ऐसा करते हैं, तो उस विचारधारा में भी प्रधानमंत्री के चिंतन के आधार पर संशोधन की जरूरत है। प्रशासन को ऐसे अवसरों पर कानून के शासन की रक्षा का दायित्व निभाने के लिए किसी आदेश का इंतजार किए बिना अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करना चाहिए। कानून का शासन ही प्रजातंत्र का आधार है।

पिछले अनुभवों के आधार पर प्रशासन को यह समझना चाहिए कि संवेदनशील घटनाओं के बाद अवांछित प्रतिक्रियाओं को रोकना जरूरी होता है और उसके लिए घटना घटने का इंतजार नहीं करके पूर्व आशंका के आधार पर ही सावधानी की कार्रवाई होनी चाहिए। जम्मू में भारतीय सेना ने मौसम की वजह से अटके पड़े हजारों कश्मीरियों के लिए जिस तरह से आश्रय और भोजन व्यवस्था, सुरक्षा का प्रबंध  करके अपना फर्ज निभाया, उसकी प्रशंसा होनी चाहिए। देश को भावनात्मक रूप से जोड़ने और मानवीय संवेदनाओं के आदर की समझ प्रदर्शित करने वाले इस व्यवहार से हमें शिक्षा लेने की भी जरूरत है। एक की गलती के लिए सारे समाज, जाति या संप्रदाय को दोषी ठहराने वाली सोच न्याय के सभी सिद्धांतों के विरुद्ध है। ऐसी सोच से बचना और दूसरों को बचाना हर सभ्य नागरिक का कर्त्तव्य है।

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