कश्मीर समस्या का समाधान

-अनिल अनूप

पुलवामा हमले में 40 भारतीय जवानों की शहादत से दुखी भारत के हर घर में वास्तव में कश्मीर एक भयावह अनुभव बन गया है।  हालांकि भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर में जैश के तीन बड़े प्रशिक्षण केंद्रों पर हवाई हमले करके इसका बदला ले लिया है, किंतु इसके बावजूद जरूरत इस बात की है कि आतंकवाद का संपूर्ण समाधान निकाला जाए। पुलवामा हमला वास्तव में भारतीय सुरक्षा बलों के वाहनों पर किया गया आत्मघाती हमला था। विस्फोटक पदार्थ आईईडी से विस्फोट करने की योजना बनाकर आतंकवादियों ने वाहनों व जवानों को उड़ाने का यह कारनामा अंजाम दिया। इस बात से स्पष्ट है कि इस तरह के बड़े हमले को पाकिस्तानी सेना अथवा इसके संगठनों की सहायता के बिना अंजाम नहीं दिया जा सकता था। इस बात में भी कोई आश्चर्य नहीं है कि हमले के शीघ्र बाद पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मुहम्मद ने इस आतंकी हमले की जिम्मेवारी ली। यह भी एक तथ्य है कि पाकिस्तान एक आतंकवादी राष्ट्र के रूप में ऐसे आतंकवादी संगठनों को सक्रियता के साथ पोषित करता रहा है, परंतु जब मामला संयुक्त राष्ट्र में जाता है तो वह मासूम बनकर इस तरह की आतंकी गतिविधियों में अपनी संलिप्तता को नकार देता है। बाद में हुई जांच से खुलासा होता है कि यह विस्फोटक पदार्थ इस तरह की तोड़फोड़ के लिए एक योजना के तहत रावलपिंडी से पुलवामा लाया गया था।

इसे स्थानीय स्रोतों के जरिए एकत्र किया गया तथा चुनिंदा समय पर प्रयोग करने के लिए इसे तैयार रखा गया था। पुलवामा से गुजर रहे सुरक्षा बल के वाहनों पर इसे टारगेट के रूप में प्रयोग किया गया और आतंकवादियों को इस विस्फोटक पदार्थ का प्रयोग करने का अवसर मिल गया। इस बात की गंभीरता के साथ जांच होनी चाहिए कि हमारा खुफिया तंत्र इस विस्फोटक पदार्थ को लाने की गतिविधि का पता लगाने में किस तरह विफल हो गया। अन्वेषण का चाहे जो भी परिणाम हो, यह स्पष्ट है कि इस मामले में खुफिया तंत्र विफल रहा है तथा विस्फोटक पदार्थ को खोजने में भी वह विफल रहा। इस तरह के मामलों में रक्षा मंत्रालय को सख्ती से निपटते हुए विफलता की जिम्मेवारी तय करनी चाहिए तथा जिम्मेवार लोगों को सजा मिलनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पहले ही पाकिस्तान को रेड कार्ड दिखा चुकी है, किंतु यह चिंताजनक है कि चीनी समर्थन व दखल के कारण इसे आतंकवादी राष्ट्र का टैग नहीं मिल पाया। कूटनीतिक रूप से भारत की बेहतर सुरक्षा व्यवस्था है तथा इसके शांतिपूर्ण इरादों व आतंकवाद के शिकार राष्ट्र के रूप में इसे पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल रहा है। अब प्रश्न यह है कि इस आतंकवादी हमले के बाद भारत को क्या करना चाहिए? खुले युद्ध से लेकर रणनीतिक हमले तक सभी विकल्पों पर विचार चल रहा है, जबकि पाकिस्तान के साथ सीमा पार व्यापार को स्थगित कर दिया गया है तथा उसके साथ क्रिकेट मैच के आयोजनों पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण विषय दो हैं ः 1. यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि पाकिस्तान अपने यहां सक्रिय आतंकवादी संगठनों को मदद देना बंद कर दे। क्या एक सीमित युद्ध या अन्य रणनीतियों की जरूरत है? 2. मसला यह भी है कि वर्तमान तनाव की स्थिति खत्म होने के बाद लंबी सोच के तहत कश्मीर मसले का समाधान क्या है? इस मसले के टिकाऊ समाधान की जरूरत है क्योंकि राज्य के भीतर संघर्ष निरंतर जारी है। हमें जबकि पहला प्रश्न सेना पर छोड़ देना चाहिए जिसे खुली छूट दे दी गई है। मसला नंबर दो में दीर्घकालीन समाधान के लिए  गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत है। या हमें हम जो झेल रहे हैं, उसकी भयावह वास्तविकता की पृष्ठभूमि के साथ बिल्कुल अभी से वाद-विवाद की शुरुआत कर देनी चाहिए। पहला विकल्प यह है कि संयुक्त राष्ट्र के मुख्तारनामे के अनुरूप राज्य में जनमत संग्रह हो, किंतु इसमें शर्त यह है कि पाक अथवा जनजातीयों द्वारा अधिकृत इलाके को खाली करना होगा। यह शर्त कभी भी पूरी नहीं होगी तथा यह मसला केवल अकादमिक रुचि का है। दूसरा विकल्प यह है कि अनुच्छेद 370 व 35 ए को हटा दिया जाए। ये अनुच्छेद विवादास्पद हैं तथा पैंथर पार्टी के अध्यक्ष भीम सिंह के अनुसार इसे संविधान में संसद की स्वीकृति के बिना शामिल किया गया था।

इनका कोई न्यायिक या संवैधानिक अस्तित्व नहीं है तथा इन्हें अलग किया जा सकता है। इन अनुच्छेदों को हटाने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि एनडीए को छोड़कर बाकी सभी दल इन्हें हटाने का विरोध करते हैं। मुस्लिम बहुल घाटी को आशंका है कि इससे राज्य का जनसांख्यिकी संतुलन बिगड़ जाएगा। वोटों की खातिर सभी दल इन अनुच्छेदों की रिटेंशन का समर्थन करते हैं।  कश्मीर एक तरह से दो टुकड़ों में बंटा है क्योंकि पाकिस्तान ने चीन को गिलगित व बाल्तीस्तान का पांच हजार वर्ग किलोमीटर इलाका अधिकृत करवा रखा है जहां उसने करीब 50 हेलिपैड भी बना रखे हैं। यह उचित समय है जब भारतीय संविधान को लागू करने के लिए काम करना चाहिए तथा कश्मीर के नागरिकों को अधिकार देने के साथ-साथ यह तय किया जाना चाहिए कि वहां कश्मीर के झंडे के बजाय भारतीय झंडा फहराया जाए। ऐसा करने से कुछ राजनीतिक दलों की ओर से राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है, किंतु जम्मू-कश्मीर को अगर पाकिस्तान की घुसपैठ व दखल से बचाना है और उसे इस काबिल बनाना है तो इसका सामना करना ही पड़ेगा। मेरा एक अन्य प्रस्ताव यह है कि जम्मू-कश्मीर को हिमाचल के साथ मिला देना चाहिए।

ऐसा करके जम्मू, घाटी, लद्दाख, निचला हिमाचल व ऊपरि हिमाचल जैसे रीजन बनाए जाने चाहिएं। पांच या छह जोनल काउंसिल बनाकर इन्हें टिकाऊ बजट से सशक्त किया जाना चाहिए। संविधान में इस तरह की रचना करने से अधिकारों व नागरिकता को प्रतिबंधित करने वाले अनुच्छेदों की समस्या का समाधान किया जा सकता है। किंतु कई लोग इस सुझाव से सहमत नहीं भी हो सकते हैं। मैंने जो भी सुझाव दिए हैं, चूंकि उन सबके अपने-अपने लाभ तथा हानियां हैं, इसलिए अंतिम प्रारूप तैयार करने के लिए वाद-विवाद की जरूरत है।

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