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    Homeसाहित्‍यकवितागुनगुनाती हवा

    गुनगुनाती हवा

    airये गुनगुनाती हवा
    चुपके से जाने क्या
    कहकर चली जाती है।
    वक़्त हो चाहे कोई भी
    हर समय किसी का
    संदेशा दे जाती है।
    सुबह का सर्द मौसम
    और ठंडी हवा का झोंका
    किसी की याद दिला जाती है।
    दोपहर की तपती धूप
    और हवा की तल्खी
    दर्द की थपकी दे जाती है।
    शाम का खुशनुमा मौसम
    और हवा की नर्मी जैसे
    किसी से मिला जाती है।
    अंधेरी रात में ये हवा
    खुले आकाश के नीचे
    साथ मेरा निभा जाती है।
    गीत कोई गा रही है
    ये गुनगुनाती हवा
    जैसे किसी को बुलाती है।
    पत्तों की सरसराहट में
    अपनी खामोशी से
    नग़मा कोई छेड़ जाती है।
    फिर इन नग़मों में जैसे
    ज़िंदगी का फलसफा
    सिखा जाती है।

     

    लक्ष्मी जायसवाल
    लक्ष्मी जायसवालhttps://www.pravakta.com/author/lakshmijaiswal
    दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा तथा आज समाज जैसे समाचार पत्रों में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका साधना पथ में सहायक संपादक के रूप में कार्यरत। सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री लेखन में विशेष रुचि।

    2 COMMENTS

    1. “पत्तों की सरसराहट में
      अपनी खामोशी से
      नग़मा कोई छेड़ जाती है।
      फिर इन नग़मों में जैसे
      ज़िंदगी का फलसफा
      सिखा जाती है।”

      अति सुन्दर!

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