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    सुविधा के लिए जनता पर शुल्क तो असुविधा के लिए सरकार पर जुर्माना क्यों नहीं ?

    निर्मल रानी
    सरकार द्वारा देश के सभी राज्यों में जनता को जो भी सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं कमोबेश प्रत्येक सुविधाओं के बदले में शुल्क भी लिए जाते हैं। ये शुल्क लेने भी चाहिए और जनता ख़ुशी के साथ सभी सुविधा शुल्कों का भुगतान करती भी है। मिसाल के तौर पर आप बिजली का इस्तेमाल करते हैं इसके बदले में अपना बिजली का बिल जमा करते हैं। आप सरकारी पाइप लाइन वाला पानी प्रयोग करते हैं तो आप पानी के अपने बिल का भुगतान भी करते हैं। सीवर के नाम पर शुल्क देते हैं,कूड़ा उठाने के नाम पर शुल्क,आपके अपने मकान में रहने के बदले में गृह कर,सड़क पर वाहन चलाने के लिए रोड टैक्स,गोया सांस लेने के अतिरिक्त लगभग सभी मानव उपयोगी सुविधाओं के लिए आपको कर अथवा शुल्क अदा करना ही पड़ता है। इनमें कुछ शुल्क ऐसे हैं जिनका भुगतान खपत के अनुसार करना पड़ता है तो कुछ सुविधाओं के लिए निर्धारित भुगतान करने होते हैं।
    उदाहरण के तौर पर आप जितनी बिजली इस्तेमाल करते हैं उतनी यूनिट बिजली के बिल का शुल्क देना पड़ता है। पानी का बिल भी कहीं मीटर रीडिंग के अनुसार तो कहीं निर्धारित की गई दर के मुताबिक़ दिया जाता है। गृह कर आपको अपने मकान के क्षेत्र फल व भवन निर्माण के आधार पर देना पड़ता है। परन्तु सीवर,नाली की सफ़ाई,कूड़ा उठाने का शुल्क आदि निर्धारित दरों के अनुसार देना पड़ता है। यदि किसी कारण वश जनता इनका भुगतान नहीं कर पाती या समय पर नहीं कर पाती तो जनता को इसका ख़ामियाज़ा किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ता है। यदि बिजली का बिल नहीं भरा तो जुर्माना भी लगता है और आपूर्ति भी बंद कर दी जाती है। यदि आप ने रोड टैक्स नहीं भरा तो आपके वाहन का चालान हो जाता है और आपको जुर्माना भरना पड़ता है। इसी तरह नगर निगम व नगरपालिकाओं से जारी होने वाले गृह कर,कूड़ा संग्रह करने का बिल,तथा पानी, सीवर आदि के भुगतान न करने पर न केवल जुर्माना अदा करना पड़ता है बल्कि आपको किसी तरह का अनापत्ति प्रमाण पत्र संबंधित विभाग से तब तक नहीं दिया जाता जब तक आपने विभाग के सारे बक़ाए अदा न कर दिए हों।यहाँ तक कि सभी बक़ायों का जुर्माना सहित भुगतान किये बिना आपको राज्य अधिवास प्रमाण पत्र भी नहीं मिलता।
    निश्चित रूप से सरकार को जनता को दी जाने वाली सेवाओं व सुविधाओं के बदले में जनता से शुल्क लेने का अधिकार है तथा किसी भी सेवा व सुविधा के बदले में सरकार को दिया जाने वाला शुल्क भी वाजिब है। परन्तु यदि सरकार द्वारा समुचित सुविधाएँ भी न दी जा रही हों और सुविधाओं के बजाए सरकार की लापरवाही या अकुशलता या निष्क्रियता की वजह से घोर असुविधा व परेशानी का सामना करना पड़ता हो,सरकार व प्रशासन के निकम्मेपन की वजह से जनता को जान व माल का नुक़सान उठाना पड़ता हो तो इसकी लिए भी तो किसी न किसी की ज़िम्मेदारी निर्धारित होनी चाहिए ? उदाहरण के तौर पर रोड टैक्स नहीं दिया गया तो जनता का चालान होगा परन्तु यदि सड़कों पर गड्ढे हैं,कहीं कहीं मेन होल के ढक्कन खुले हैं,उनमें गिरकर किसी की जान चली जाती है या वह आंशिक रूप से घायल हो जाता है तो इसके लिए सरकार या प्रशासन ज़िम्मेदार क्यों नहीं ? सीवर के निर्धारित शुल्क लिए जाते हैं परन्तु आए दिन सीवर लाइन अवरुद्ध रहती है। आम लोगों के घरों में सीवर का गन्दा, बदबूदार विषैला पानी मल मूत्र की गंदिगी व कीड़े मकोड़ों के साथ प्रवेश कर जाता है। इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? हद है कि सीवर शुल्क निर्धारित होने की वजह से इस ‘दुर्व्यवस्था का शुल्क’ भी जनता को ही देना पड़ता है ? शहरों की नालियां व नाले प्रायः जाम ही रहते हैं जोकि बरसात के दिनों में अपना रौद्र रूप दिखाते हैं। लोगों के घरों में में कई फ़िट पानी भर जाता है। लाखों के फ़र्नीचर व अन्य घरेलू सामानों का नुक़सान हो जाता है। परन्तु सरकार या प्रशासन कोई उदाहरण देकर या कोई बहाना बना कर अपना दामन झाड़ लेती है।
    नाली से गंदे पानी की निकासी न होना,सीवर लाइन का सुचारु रूप से संचालित न होना तथा घरों में बरसाती पानी घुसने जैसी समस्याओं के पीछे भ्रष्टाचार भी एक बड़ा कारण है। सीवर के लिए गली मोहल्लों में जिन पाइप का प्रयोग किया गया है वे तुलनात्मक रूप से पतले हैं। सीवर लाइन के निर्माण में भी घोर भ्रष्टाचार हुआ है तभी कोई न कोई मेन होल दबा व क्षतिग्रस्त दिखाई पड़ता है तो किसी मेन होल का ढक्कन टूटा रहता है। इन सबके लिए यक़ीनन कम से कम आम जनता तो ज़िम्मेदार नहीं ? परन्तु इन दुर्व्यवस्थाओं का नुक़सान सीधे तौर पर जनता को ही उठाना पड़ता है।आख़िर किसी को तो यह ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए ? और उसी ज़िम्मेदार को सज़ा या जुर्माने का भागीदार भी होना चाहिए। इसी तरह नगर निगम व नगर पालिकाओं द्वारा गलियां व सड़कें ऊँची कराई जाती हैं। परिणाम स्वरूप जिन घरों में बरसाती पानी कभी भी नहीं घुसा वहां भी पानी भरने लगा है। गोया किसी आम आदमी के पूरे जीवन की कमाई से बनाया गया मकान सरकार की लापरवाही व भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। परन्तु संगठित नेटवर्क गलियाँ व सड़कें ऊँची कर आम लोगों को जल थल हो रहे घरों में उन्हें उनके हाल पर रहने के लिए छोड़ देता है। क्या इन दुर्व्यवस्थाओं के लिए भी जनता ही ज़िम्मेदार है ? हरगिज़ नहीं। जो इसके लिए ज़िम्मेदार हों उन्हें न केवल दण्डित किया जाना चाहिए बल्कि उनपर भारी जुर्माना भी लगाना चाहिए।
    ज़ाहिर है सरकार व भ्रष्ट प्रशासन यह समझता है कि देश की जनता असंगठित है। इसलिए इसे जैसे चाहे दबाया जा सकता है। यह सच भी है कि जनता फ़ुज़ूल के कामों के लिए तो एकजुट भी हो जाती और सड़कों पर भी उतर आती है। परन्तु उपरोक्त रोज़मर्रा की घोर समस्याओं के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर पाती। और सरकार व प्रशासन जनता की इसी कमज़ोरी का लाभ उठाते हैं। सरकार,प्रशासन व जनता को इस बात पर ईमानदारी से मंथन करना चाहिए कि यदि किसी सुविधा के लिए जनता से शुल्क लिया जाता है तो उसी प्रदत्त सुविधा की जगह होने वाली असुविधा के लिए सरकार व प्रशासन पर जुर्माना क्यों नहीं लगना चाहिए व इससे होने वाले जान या माल के नुक़सान के लिए आख़िर इनकी ज़िम्मेदारी क्योंकर निर्धारित नहीं होनी चाहिए ?

    निर्मल रानी
    निर्मल रानी
    अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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