लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

विश्वस्तर पर गरीबों, असहायों तथा शारीरिक व मानसिक रूप से असहाय लोगों की सेवा करने हेतु तरह-तरह के निजी व स्वयंसेवी संगठन कार्य कर रहे हैं। दुनिया में बड़े से बड़े दानी सज्जनों का भी एक ऐसा वर्ग है जो इस प्रकार के बेसहारा व कमज़ोर वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए मोटी से मोटी धनराशि उपलब्ध कराए जाने की कोशिश करता है। उदाहरण के तौर पर मानवता के कल्याण के लिए अभी कुछ समय पूर्व ही बिल गेटस,वारेन बफेट तथा अज़ीम प्रेमजी जैसे और कई विश्वविख्यात उद्योगपतियों द्वारा अपनी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा दान में दिया गया। निश्चित रूप से इन उद्योगपतियों का अपना कद तथा इनके द्वारा दान में दी गई रक़म दोनों ही इतने बड़े थे कि उसकी चर्चा विश्व मीडिया में होनी स्वाभाविक थी। इस प्रकार के महादान की चर्चा यूं भी होनी इसलिए ज़रूरी है ताकि महादान करने की हैसियत रखने वाले और भी दुनिया के तमाम उद्योगपति उपरोक्त उद्योगपतियों द्वारा किए गए महादान से प्रेरणा लेते हुए खुद भी इस महान कार्य में शामिल हों।

परंतु यदि हम निचले स्तर पर दान दिए जाने के सिलसिले को देखें तो हमें इसमें श्रद्धा,उपकार या समाजसेवा का पहलू तो कम जबकि दान के बहाने शोहरत हासिल करने व पाखंड करने का पहलू अधिक दिखाई देता है। लगभग सभी धर्मशास्त्र हमें यही सिखाते हैं कि किसी व्यक्ति या परिवार को दिया जाने वाला दान गुप्त रूप से दिया जाना चाहिए। इसकी मुख्य वजह यही है ताकि दान को स्वीकार करने वाले असहाय या मजबूर व्यक्ति को शर्मिंदगी का एहसास न हो। अपनी $गरीबी व मजबूरी के चलते वह स्वयं को अपमानित न महसूस करे। इसीलिए बंद मुठ्ठी से दान दिए जाने की बात कही गई है। इस्लाम धर्म तो यह कहता है कि यदि आप एक हाथ से किसी को दान स्वरूप कुछ दे रहे हैं तो आपके दूसरे हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए। परंतु आजकल जो दान से जुड़ी परंपराएं स्थापित हो रही हैं उन्हें देखकर तो यही लगने लगा है कि गोया दान का अर्थ ही सेवा, सहायता या किसी गरीब को मदद पहुंचाना तो कम शोहरत हासिल करना व पाखंड करना अधिक हो गया है। मज़े की बात तो यह है कि बड़े से बड़े धर्मस्थलों पर कम से कम दान देने वाला व्यक्ति भी अब यही चाहता है कि यदि उसने सौ या दौ सौ रुपये भी दानस्वरूप दी गई किसी वस्तु पर खर्च किए हैं तो उस धर्मस्थल पर आने वाले सभी दर्शनार्थियों व भक्तजनों को यह पता लगना चाहिए कि अमुक वस्तु दानस्वरूप किस व्यक्ति द्वारा दी गई है।

उदाहरण के तौर पर किसी मंदिर या किसी अन्य धर्मस्थल में यदि कोई एक टयूबलाईट या पंखा दानस्वरूप भेंट देता है तो वह उस टयूबलाईट की फट्टी पर या पंखे के ब्लेड पर अपना नाम या अपने परिवार के किसी सदस्य का नाम लिखवा देता है। ज़ाहिर है ऐसा करने का उसका मकसद तो यही है कि लोगों को पता लगना चाहिए कि यहां बैठकर जिस टयूबलाईट की रोशनी उसे प्राप्त हो रही है या जिस पंखे की हवा वे ले रहे हैं वह अमुक दानदाता के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। यह तो रही धर्मस्थानों में दिए जाने वाले दान की एक झलक। अब ज़रा गौर कीजिए निजी स्तर पर दान दिए जाने वालों का वर्तमान तौर-तरीका। इन दिनों $गरीब कन्याओं के सामूहिक विवाह आयोजित किए जाने का एक लगभग राष्ट्रव्यापी चलन चला हुआ है। निश्चित रूप से यह अत्यंत सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य है। इसे और भी बढ़ावा दिए जाने की ज़रूरत है। परंतु इस आयोजन में यदि दूल्हा-दुल्हन के नाम व उनके चेहरों को सार्वजनिक न किया जाए तो ऐसे आयोजनों की शोभा और अधिक बढ़ सकती है। ज़ाहिर है ऐसे सामूहिक विवाह के पंडाल में वही जोड़े आमतौर पर शरीक होते हैं जो गरीब,असहाय तथा निजी स्तर पर विवाह का आयोजन कर पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे में जो भी सामाजिक संगठन या संस्थाएं उन्हें आमंत्रित कर उनका विवाह रचाती हैं यहां तक कि उन जोड़ों को दहेज के रूप में मध्यम स्तर का सामान भी दिए जाते हैं, यदि ऐसे परोपकारों को खामोशी से किया जाए तो निश्चित रूप से उन गरीब दंपत्तियों को किसी के सामने शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ेगी।

हमारे देश में तमाम ऐसे समाजसेवी संगठन हैं जो गरीबों व असहाय विधवाओं को मासिक राशन वितरित करते हैं। इनके पास उन गरीब परिवारों की सूची होती है जिन्हें इन्होंने दान देने हेतु सूचीबद्ध किया होता है। परंतु इन्हीं में कई ऐसे संगठन व संस्थाएं भी हैं जो राशन तो कम वितरित करती हैं जबकि $गरीबों को राशन बांटने का ढिंढोरा ज़्यादा पीटती हैं। इसी प्रकार सर्दियों के मौसम में तमाम खबरें अखबारों में ऐसी दिखाई देती हैं जिससे पता चलता है कि $गरीब बच्चों को या झुग्गी-झोंपडिय़ों में कहीं कोई संस्था शाल या स्वेटर आदि बांट रही है तो कोई कंबल व रज़ाई आदि बांटकर इन लोगों को सर्दी से निजात दिलाने की कोशिश में लगा है। वास्तव में ऐसे सदकार्यों की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। परंतु इसके साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि प्रत्येक गरीब व ज़रूरतमंद के मान-सम्मान व उसके स्वाभिमान का भी ख्याल रखा जाए। यहां मिर्जा गालिब से जुड़ी एक दास्तान का जि़क्र करना प्रासंगिक होगा। मिर्जा गालिब को एक बार देश के आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने एक शानदार व बेशकीमती शेरवानी बतौर तोहफा पेश की। बाद में मिर्जा जी के गरीब साथी शायर ने जब उस शेरवानी को देखा तो उसके मन में लालच पैदा हुई। वह मिर्जा जी से शेरवानी की खूब तारीफ करने लगा। मिर्जा समझ गए कि मेरे दोस्त को यह शेरवानी बहुत पसंद है। उन्होंने उसे शेरवानी देने का निश्चय तो किया परंतु साथ-साथ उसके स्वाभिमान को आहत न होने देने का उपाय भी उन्होंने ढूंढ निकाला। बार-बार अपनी शेरवानी की तारीफ उसके मुंह से सुनने के बाद मिर्जा उसकी पुरानी शेरवानी की ओर देखकर बोले- यार तुम्हारी शेरवानी मुझे बहुत पसंद है। क्यों न अपनी शेरवानी मुझे दे दो। जब उसने अपनी शेरवानी मिर्जा को दे दी तब मिर्जा ने अपनी शाही शेरवानी उसे भेंट करते हुए कहा कि यह लो तुम नौजवान आदमी हो और तुम्हारे जिस्म पर यह शेरवानी बहुत अच्छी लगेगी। इस प्रकार उसके लाख मना करने के बावजूद मिर्जा ने उसे उसकी मनचाही चीज़ भी भेंट कर दी और साथ-साथ उसके स्वाभिमान की भी हिफाज़त की।

ऐसा नहीं है कि आज गुप्त दान करने वाले, बंद मुठ्ठी से लोगों की सहायता करने का जज़्बा रखने वाले लोगों की कोई कमी है। आज भी ऐसे परोपकारी विचार या स्वभाव रखने वाले लोग पर्याप्त मात्रा में हैं। परंतु इसमें भी कोई शक नहीं कि दान के नाम पर दिखावा करने वालों, दान के नाम पर पाखंड रचने वालों, यहां तक कि दान या परोपकार के नाम पर चंदा वसूलने व इसे व्यापार का रूप देने वालों की संख्या भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। लिहाज़ा दानदाताओं व दानी सज्जनों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि दान प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने मुंह से भले ही आपके परोपकारी होने का कितना ही ढिंढोरा क्यों न पीटे, परंतु किसी दानदाता पर यह कतई शोभा नहीं देता कि वह सार्वजनिक रूप से किसी गरीब या असहाय व्यक्ति या परिवार की आर्थिक बदहाली का मज़ाक़ उसे पहुंचाई जाने वाली सहायता को सार्वजनिक रूप से प्रचारित कर उड़ाए। असली दान तो वही माना जाएगा जो गुप्त रूप से दिया जाए तथा गुप्त रूप से स्वीकार किया जाए। जो दान या सहायता शोर-शराबे के बीच की जाए, सार्वजनकि रूप से उसका ढिंढोरा पीटा जाए,या ऐसे परोपकारी कार्यक्रमों को अखबारों की ससुर्खीयों में शामिल करने की कोशिश की जाए, उसे दान या उपकार करने के बजाए पाखंड या दान के बहाने शोहरत हासिल करने का उपाय कहना गलत नहीं होगा।

 

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