लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

Posted On by &filed under राजनीति.


नक्सलियों के सामने भारतीय राज्य की लाचारी के मायने क्या हैं

माओवादियों ने 15 फरवरी, 2010 को लालगढ़ के जंगलों में बंगाल पुलिस की एलीट फोर्स ईस्टर्न फ्रंटीयर राइफल्स के एक कैम्प को तहस-नहस कर 24 जवानों को मार डाला। हमारे केंद्रीय गृहमंत्री कह रहे हैं कि गलती हो गयी, चूक हुयी है। किंतु देश माननीय गृहमंत्री से यह जानना चाहता है कि इसकी गारंटी क्या है कि अब गलती नहीं होगी। जाहिर तौर पर हमारी विवश राजनीति, कायर रणनीति और अक्षम प्रशासन पर यह सवाल सबसे भारी है। नक्सली हों या देश की सीमापार बैठे आतंकवादी वे जब चाहें, जहां चाहें कोई भी कारनामा अंजाम दे सकते हैं और हमारी सरकारें लकीर पीटने के अलावा कर क्या सकती हैं। राजनीति की ऐसी बेचारगी और बेबसी लोकतंत्र के उन विरोधियों के सामने क्यों है। क्या कारण है कि हिंसा में भरोसा रखनेवाले, हमारे लोकतंत्र को न माननेवाले, संविधान को न माननेवाले भी इस देश में कुछ बुद्धिवादियों की सहानुभूति पा जाते हैं। सरकारें भी इनके दबाव में आ जाती हैं। नक्सली चाहते क्या हैं। नक्सलियों की मांग क्या है। वे किससे यह यह मांग कर रहे हैं। वे बातचीत के माध्यम से समस्या का हल क्यों नहीं चाहते। सही तो यह है कि वे इस देश में लोकतंत्र का खात्मा चाहते हैं। वे जनयुद्ध लड़ रहे हैं और जनता का खून बहा रहे हैं।

हमारी सरकारें भ्रमित हैं। लोग नक्सल समस्या को सामाजिक-आर्थिक समस्या बताकर प्रमुदित हो रहे हैं। राज्य का आतंक चर्चा का केंद्रीय विषय है जैसे नक्सली तो आतंक नहीं फैला रहे बल्कि जंगलों में वे प्रेम बांट रहे हैं। उनका आतंक, आतंक नहीं है। राज्य की हिंसा का प्रतिकार है। किसने उन्हें यह ठेका दिया कि वे शांतिपूर्वक जी रही आदिवासी जनता के जीवन में जहर धोलें। उनके हाथ में बंदूकें पकड़ा दें, जो हमारे राज्य की ओर ही तनी हुयी हों। लोगों की जिंदगी बदलने के लिए आए ये अपराधी क्यों इन इलाकों में स्कूल नहीं बनने देना चाहते, क्यों वे चाहते हैं कि सरकार यहां सड़क न बनाए, क्यों वे चाहते हैं कि सरकार नाम की चीज के इन इलाकों में दर्शन न हों। पुल, पुलिया, सड़क, स्कूल, अस्पताल सबसे उन्हें परेशानी है। जनता को दुखी बनाए रखना और अंधेरे बांटना ही उनकी नीयत है। क्या हम सब इस तथ्य से अपरिचित हैं। सच्चाई यह है कि हम सब इसे जानते हैं और नक्सलवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई फिर भी भोथरी साबित हो रही है। हमें कहीं न कहीं यह भ्रम है कि नक्सल कोई वाद भी है। आतंक का कोई वाद हो सकता है यह मानना भी गलत है। अगर आपका रास्ता गलत है तो आपके उद्देश्य कितने भी पवित्र बताए जाएं उनका कोई मतलब नहीं है। हमारे लोकतंत्र ने जैसा भी भारत बनाया है वह आम जनता के सपनों का भारत है। माओ का कथित राज बुराइयों से मुक्त होगा कैसे माना जा सकता है। आज लोकतंत्र का ही यह सौंदर्य है कि नक्सलियों का समर्थन करते हुए भी इस देश में आप धरना-प्रदर्शन करते और गीत- कविताएं सुनाते हुए घूम सकते हैं। अखबारों में लेख लिख सकते हैं। क्या आपके माओ राज में अभिव्यक्ति की यह आजादी बचेगी। निश्चय ही नहीं। एक अधिनायकवादी शासन में कैसे विचारों, भावनाओं और अभिव्यक्तियों का गला घुटता है इसे कहने की जरूरत नहीं है। ऐसे माओवादी हमारे लोकतंत्र को चुनौती देते घूम रहे हैं और हम उन्हें सहते रहने को मजबूर हैं।

नक्सलवादियों के प्रति हमें क्या तरीका अपनाना चाहिए ये सभी को पता है फिर इस पर विमर्श के मायने क्या हैं। खून बहानेवालों से शांति की अर्चना सिर्फ बेवकूफी ही कही जाएगी। हम क्या इतने नकारा हो गए हैं कि इन अतिवादियों से अभ्यर्थना करते रहें। वे हमारे लोकतंत्र को बेमानी बताएं और हम उन्हें सिर-माथे बिठाएं, यह कैसी संगति है। आपरेशन ग्रीन हंट को पूरी गंभीरता से चलाना और नक्सलवाद का खात्मा हमारी सरकार का प्राथमिक ध्येय होना चाहिए। जब युद्ध होता है तो कुछ निरअपराध लोग भी मारे जाते हैं। यह एक ऐसी जंग है जो हमें अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए जीतनी ही पड़ेगी। बीस राज्यों तक फैले नक्सली आतंकवादियों से समझ की उम्मीदें बेमानी हैं। वे हमारे लोकतंत्र की विफलता का फल हैं। राज्य की विफलता ने उन्हें पालपोस का बड़ा किया है। सबसे ऊपर है हमारा संविधान और लोकतंत्र जो भी ताकत इनपर भरोसा नहीं रखती उसका एक ही इलाज है उन प्रवृत्तियों का शमन। हमारा देश एक नई ताकत के साथ महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। ये हिंसक आंदोलन उस तेज से बढ़ते देश के मार्ग में बाधक हैं। हमें तैयार होकर इनका सामना करना है और इसे जल्दी करना है- यह संकल्प हमारी सरकार को लेना होगा। भारत की महान जनता अपने संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हुए देश के विकास में जुटी है। हिंसक और आतंकी प्रसंग उसकी गति को धीमा कर रहे हैं। हमें लोगों को सुख चैन से जीने से आजादी और वातावरण देना होगा। अपने जवानों की मौत पर सिर्फ स्यापा करने के बजाए हमें कड़े फैसले लेने होंगें और यह संदेश देना होगा कि भारतीय राज्य अपने नागरिकों की जान-माल की रक्षा करने में समर्थ है। इस मोर्चे पर तो भारतीय राज्य की लाचारी ही दिखती है, आगे के दिनों की कौन जाने।

– संजय द्विवेदी

3 Responses to “चिदंबरम जी ये क्या हो रहा है?”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *