लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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-अनिल अनूप
माँ के आँचल तले संतुष्टि से सोना की चाहे दुनिया की कोई ताकत आए में महफूज़ हूँ. पर बाल श्रमिक के लिए शायद ये सब सोचना भी फ़िज़ूल हैं.
भोपाल के रेल्वे प्लेटफॉर्म पर पॉपकार्न बेचने वाला विनोद अब यह भी नहीं जानता कि उसका घर कहां है ? विनोद अभी सात साल का है और पिछले तीन सालों से तो वह इसी प्लेटफॉर्म या उसके आसपास ही रहता आया है. उसके साथ रहती है उसकी गरीबी, भूख, असहायता और इन सबसे हर रोज की जद्दोजहद करती उसकी ज़िंदगी.
वह कभी प्लेटफॉर्म पर पॉपकार्न बेचता है, तो कभी रेल्वे कंपार्टमेंट में झाड़ू लगाता है. सोने का ठिकाना प्लेटफॉर्म, रिश्तेदारों के नाम संग फिरते चंद मासूम और शत्रुओं के नाम पर पुलिस और यह व्यवस्था. प्लेटफॉर्म पर रहने वाला अकेला विनोद नहीं हैं अपितु विनोद की तरह राज्य में हज़ारों बच्चे प्लेटफॉर्म को अपना आशियाना बनाये हुये हैं. अध्ययन कहता है कि भोपाल में रोजाना तीन नये बच्चे प्लेटफॉर्म पर आते हैं.
कबाड़खाने में काम करने वाला जुनैद उम्र- 8 साल पिछले दो वर्षों से मेकेनिकी सीख रहा है. सुबह 8 बजे से गैरॉज खोलता है और रात 10 बजे अपने घर लौटता है. वह 14 घंटे काम करता है और उसे मिलते हैं माह के 400 रूपये. वह अभी सीख रहा है, जब सीख जायेगा तो सीधा दूना यानि 800 रूपया मिलने लगेगा यानि 26 रूपया प्रतिदिन. जिस दिन काम नहीं, उस दिन पैसा भी नहीं. जुनैद ने न तो कभी स्कूल का मुँह देखा है और न ही जीवन के इस चक्रव्यूह में फंसने के बाद इसकी कोई उम्मीद है.
हमारे देश ने अंर्तराष्ट्रीय प्रतिबध्दताओं में यह माना है कि बच्चा यानि वह जिसने 18 वर्ष की उम्र पूरी ना की हो (बाल अधिकारों के लिये अंर्तराष्ट्रीय प्रतिबध्दता अनुच्छेद 1). वहीं संविधान 14 वर्ष की उम्र तक को ही बच्चा मानता है और उसी आधार पर अपने आंकड़े प्रस्तुत करता है. यही कारण है कि 14-18 वर्ष तक के बच्चों की कार्यशील जनसंख्या का कोई भी निश्चित ब्यौरा हमारे समक्ष नहीं है. इस जनसंख्या का एकमात्र स्त्रोत जनगणना है जिसके आंकड़े जब तक हमारे सामने आते हैं, वह संख्या कहीं और पहुंच चुकी होती है.
बच्चों के मामले में विसंगतियों की चाहरदीवारी इतनी ऊंची है कि कोई इसे चाह कर भी नहीं लांघ सकता. 0-6 वर्ष तक के बच्चों के लिये महिला एवं बाल विकास विभाग उत्तरदायी है. उसके बाद यानी 6-14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा विभाग की जिम्मेवारी तय की गई है. लेकिन 14-18 वर्ष तक की उम्र का कोई माई-बाप नहीं है.
परिभाषाओं की विसंगतियों का हाल ये है कि 10 अक्टूबर 2006 से पहले खतरनाक और गैर खतरनाक उद्योगों के मकड़जाल में ही हमारे क़ानून उलझे हुए थे. ज़रा सोचिये कि किसी बच्चे के काम करने को खतरनाक और गैर खतरनाक में कैसे बांटा जा सकता है, क्योंकि एक बच्चे के लिये तो काम करना ही सबसे खतरनाक है.
बहरहाल, बालश्रम अधिनियम 1986 में संशोधन के बाद केवल इतना भर हुआ कि घरों, ढांबों और होटलों में भी बच्चों का काम पर रखा जाना दंडनीय अपराध हो गया. इसके अनुपालन के लिए बाल श्रमिकों के मालिकों ने अपने संस्थान के बाहर “हमारे यहां कोई भी बाल श्रमिक नहीं है” का बोर्ड लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली और श्रम विभाग ने इन बोर्डों के प्रति पूरी आस्था जताते हुए इन बोर्डों के पीछे के भयानक सच से अपनी आंखें मूंद लीं.
मानव जगत में उत्साह, उमंगों एवं सपनों का सर्वोकृष्ट जीवित पुंज ‘बालक’ को माना गया है | बच्चे किसी भी राष्ट्र के भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं | वे देश के भावी कर्णधार एवं प्रगति का आइना हैं | उनका चमकता या मुरझाया हुआ चेहरा इस बात का प्रतीक है की वह देश कितना खुशहाल , संपन्न या विपन्न है | ये राष्ट्र की धरोहर होते हैं जिनकी समुचित देखभाल एवं विकास पर ही किसी भी राष्ट्र की प्रगति निर्भर करती है | वे सभ्यता एवं भविष्य के आधार हैं और निरंतर पुनजीर्वन का स्त्रोत भी, इन्ही के कन्धों पर मानवता के उज्जवल भविष्य की आधार-शिला रखी जा सकती है,किन्तु विडम्बना इस बात की हे कि इन बच्चों कि एक बड़ी संख्या ऐसे बच्चों कि है, जिनका जीवन संघर्षों एवं असामान्य परिस्थिति में बीतता है |
प्रश्न ये है कि जिन बच्चों का बचपन ही समस्याओं से घिरा हुआ है, उन बच्चों का भविष्य क्या होगा? क्या ये बच्चे बड़े होकर पढेंगे या बाल श्रमिक बनेंगे और वे समाज और राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान किस प्रकार से दे सकेंगे ?आज भी परिवार की आर्थिक विवशताओं के कारण हजारों बच्चे स्कूल की चौखट भी पार नहीं कर पाते और अनेकानेक बालकों को इन्हीं बाध्यताओं के कारण पढाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ती है और बाल श्रमिक आजीविका, शिक्षा, प्रशिक्षण और कार्यरत कौशल से वंचित रह जाते हैं | परिणामतः न उनका मानसिक विकास हो पता है और न ही बौद्धिक विकास संभव है |
किसी भी देश के बालकों की अच्छी अथवा बुरी दशा ही वहाँ के सांस्कृतिक स्तर का सबसे विश्वसनीय मापदंड होता है | आदि काल से बच्चों का पालन पोषण विशेष और महत्त्वपूर्ण समाजिक उत्तरदायित्व रहा है | इस सन्दर्भ में उसकी आवश्यकताओं की संतुष्टि में परिवार की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है | मनुष्य के जीवन में बाल्यावस्था एक ऐसी स्थिति है जिसमें उसको सबसे अधिक सहायता, देखभाल, प्रेम, सहानुभूति और सुरक्षा की आवश्यकता होती है | जिन व्यक्तिओं का बाल जीवन सुखी, संतुष्ट और सुरक्षित गुजरता है उनका व्यक्तित्व और भविष्य भी सामान्यतः संतुलित होता है और वे एक विकासशील, सशक्त और उन्नत समाज की संरचना में रचनात्मक सहयोग देते हैं |
प्राचीनकाल से ही बाल श्रमिक कृषि, उद्योग, व्यापार तथा घरेलु धंधों में कार्यरत रहे हैं परन्तु उस समय जनसंख्या के कम दबाव, गरीबी, अज्यनता, रूढ़िवादिता तथा भाग्यवादिता के कारण उनकी शिक्षा अवं उनके सर्वंगीण विकास की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया, बचपन ही मजदूरी की बेदी पर होम कर दिया जाता है ओर फिर उनके हाथों में कलम ओर किताब के स्थान पर हंसिया, फावड़ा, ओर श्रम के निशान ही सदैव दिखाई पड़ते हैं | बल श्रम को बढ़ावा देने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका उन उद्योगपतिओं, कारखानेदारों ओर संपन्न किसानों की है जो बच्चों को कम धंधों पर लगाना चाहते हैं, क्योंकि एक तो ये छोटे बच्चे आधी या और कम मजदूरी में ही काम कर लेते हैं, दूसरे गंदे और असुविधाजनक वातावरण में चुपचाप घंटों काम करते हैं |
बाल श्रम के पक्ष और विपक्ष दोनों में विचार व्यक्त किये गए हैं, पक्ष के विचारकों के अनुसार बाल श्रम आर्थिक प्रगति में योगदान देता है | विपक्षियों के अनुसार यह एक सामाजिक बुराई है क्योंकि इसमें बच्चों के विकास में बाधा पड़ती है और वे वयस्क होने पर एक नागरिक के रूप में सामाजिक विकास में अपना समुचित योगदान नहीं दे पाते हैं | विपक्षीय मत को इतनी व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है की बाल श्रम शब्द अब एक सामाजिक बुराई का ही बोध करता है |
बाल श्रम की सरमाया हर युग में किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है | भारत के कृषि समाज में बच्चे कृषि व पारंपरिक व्यवसाय करते हैं व मदद करते हुए काम सीखते थे | औद्योगीकरण के बढ़ने के साथ ही बाल श्रम का स्वरूप भी बदला | पारिवारिक व्यवसाय के बंधन टूटते गए और बच्चों को भी एक स्वतन्त्र व्यक्ति के रूप में अपने नियोक्ता के पास मजदूरी ले लिए जाना पड़ा | उसे अपनी समस्याओं से खुद ही जूझना पड़ा तथा काम के स्थान पर अभिभावकों के संरक्षण से वंचित भी रहना पड़ा |
यूनिसेफ ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है की बच्चों की खरीद, शोषण तथा दुकानों, खदानों, फैक्ट्रियों, उद्योगों, ईंट भट्टों और घरेलु कामों में जबरिया मजदूरी तथा शारीरिक दुर्व्यवहार की असंख्य डरावनी कहानियाँ हैं | लेकिन सभी बाल श्रमिकों का शोषण नहीं होता है और उनके द्वारा किया जाने वाला हर काम उनके विकास के लिए घातक नहीं होता है | रिपोर्ट में बांग्लादेश का उदहारण दिया गया है जहाँ वस्त्र उद्योग में ५५००० से अधिक बाल श्रमिक हैं और उनके योगदान से यह देश अमेरिका को करीब ७५ करोड़ डॉलर मूल्य के वस्त्रों का निर्यात करता है | बाल श्रमिकों द्वारा बनाये गए माल पर प्रतिबन्ध के कारण बांग्लादेश के नियोक्ताओं ने करीब ७५ प्रतिशत बालकों को नौकरी से हटा दिया | इससे ऐसे बाल श्रमिकों और उनके परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट और गहरा हो गया |
कामगार परिवारों की “जितने हाथ उतने काम” वाली मानसिकता ने भी बाल श्रम को बढ़ावा दिया है | यह मानसिकता बेहद घातक है और विकास की गति को पीछे ले जाती है | श्रमिक परिवार की इस मानसिकता ने भी बाल श्रम को बढ़ावा दिया है | बाल श्रमिक समाज के एक उपेक्षित अंग है, क्योंकि इन्हें स्कूलों में में पढ़ने के स्थान पर रोजी के लिए विवश होना पड़ता है | २००१ की जनगणना के अनुसार भारत में बाल श्रमिकों की संख्या १२६६६३७७ है |
बाल श्रम भारत की अन्य समस्याओं में एक कठिन समस्या है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है की भारत का भविष्य जो किसी कस्बे व नगर, महानगर की किन्ही बस्तियों में जन्म लेकर जीवन के ६ से ८ वर्ष की दहलीज को पार करते ही अपने पेट की चिंता में व सुबह शाम के पेट भरने की समस्या से बाध्य होकर उन बच्चों को चाय की दुकानों, हथकरघों और फुटपाथों पर काम करते देखा जा सकता है |
बच्चों को रोजगार ढूँढने के जो भी कारण हो प्रायः बालक ऐसी स्थितियों में काम करते हैं जो उनके स्वास्थ, कल्याण तथा विकास के लिए हानिकारक है जिससे अधिकतर बाल श्रमिक कभी स्कूल नहीं गए होते हैं या उन्हें पढाई बीच में ही छोड़कर रोजगार में लग जाना पड़ता है | कामकाजी बालक शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल प्राप्त करने से वंचित रह जाते है | जबकि यह आजीविका, पोषण तथा आर्थिक विकास के लिए पूर्व अपेक्षित है, चूँकि बालश्रम एक व्यापक समस्या है, इसलिए ये आम जनता, मजदूर संघों, समाज सेवा संगठनो, सरकार के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है |
बदलते दौर की विडंबना यह भी है कि सर्वाधिक बालश्रमिक 12-15 वर्ष के ही हैं ओर 18 वर्ष तक के बच्चों की संख्या करोडों में है, जिनकी गणना करना टेढ़ी खीर है. ज़ाहिर है, सरकारों की भी दिलचस्पी इनमें नहीं है.
वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार मध्यप्रदेश में 5-14 वर्ष तक के बाल श्रमिकों की संख्या 10,65, 259 थी, जबकि भारत में यह संख्या 1 करोड़ 26 लाख 66 हजार 377 थी.
सर्वशिक्षा अभियान के अनुसार जुलाई माह में प्रदेश में कुल 71000 बच्चे ही स्कूल की परिधि से बाहर हैं, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है. वर्ष 2005-06 में यह आंकड़ा 472242 था, जो वर्ष 2006-07 में 296979 बचा और चालू वर्ष में 71000 हो गया.
वास्तविकता यह नहीं हैं जो दिखाई जा रही है, वास्तविकता वह है जो दिखाई नहीं जाती. एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा भोपाल की झुग्गी बस्तियों में स्कूल से बाहर बच्चों की संख्या जानने हेतु किये गये सर्वेक्षण से यह बात उभरती हैं कि अकेले भोपाल के झुग्गी क्षेत्रों में 23000 बच्चे शिक्षा की परिधि से बाहर हैं.
जब राजधानी में बच्चों की यह स्थिति है तो फिर मंड़ला, डिण्डौरी तथा झाबुआ जिलों का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है.
मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में किये गये 300 बाल श्रमिकों का अध्ययन यह बताता है कि 176 बाल श्रमिक पूर्ण रूप से निरक्षर हैं, 114 कभी अध्ययनरत रहे हैं तथा महज 7 बच्चे ही माध्यमिक स्तर में अध्ययनरत रहे हैं. यह स्थिति रायसेन जिले की है, जहां सर्वाधिक साक्षरता दर्ज की गई थी.
100 नियोक्ताओं से कानून की जानकारी देते हुये शिक्षा के संदर्भ में सवाल किया गया तो नियोक्ताओं का यह मानना था कि शिक्षा से कुछ नहीं होगा बल्कि काम करेंगे तो ये आगे बढेंगे.
वहीं दूसरी ओर नगरीय क्षेत्र, भोपाल के 148 संगठनों के 9 से 12 वर्ष तक के 200 बाल मजदूरों पर किये गये अध्ययन से यह तथ्य उभरकर सामने आया कि 97 फीसदी बाल श्रमिक बीमार थे और 160 बच्चे नशाखोरी जैसी बुरी आदतों में लिप्त पाये गये. ये श्रमिक रोजाना 12 से 15 घंटे काम करते हैं और 150 रूपया मासिक मेहनताना पाते हैं.
महज़ 2 फीसदी बच्चे ही ऐसे पाए गए जिन्हें 350 रूपया मासिक मिलता है. इन बच्चों को सालाना 10 से 12 दिन का अवकाश भी मिलता है.
आज की स्थिति में जहां सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों से अपने हाथ लगातार खींच रही है, सरकार देश की एक चौथाई आबादी को साफ पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं करा पाई हैं, ऐसे में यह कहां तक संभव है कि सरकार बाल श्रम का उन्मूलन कर देगी ? और जब यह सरकार नहीं कर पायेगी तब यही होगा कि सरकार को विनोद और रईस जैसे लाखों- करोड़ों बाल श्रमिक नहीं दिखेंगे और जब ये नहीं दिखेंगे और परिभाषाओं के संजाल में नहीं आयेंगे तो किस बात का पुनर्वास ?
बाल श्रम क्या हैं ऐसे दो शब्द जिसने करोड़ो बच्चो की जिंदगियो से खिलवाड़ करके बचपन की यादो को, बचपन की मस्तियो को, और बचपन की सीखो को हमेशा हमेशा के लिए उनसे छीन लिया हैं. हर किसी को बचपन जीने का अधिकार हैं फिर क्यों ये बच्चे अपना सारा बचपन मिटटी की धुल में झोक आते हैं. इतनी छोटी सी उम्र में इतना बेबस हो जाते हैं की आपके और हमारे जूठे बर्तन तक उठाते हुवे हमे यही कही पास के ढाबो में अभी भी अक्सर दिखाई पड़ जाते हैं, इनकी जिंदगी में अभी भी बहुत कुछ बचा होता हैं,
कारखानों में काम करने के अलावा, और दिनभर धुप में बस स्टॉप में अखबार या चाय बेचने के अलावा, साथ ही बचा होता हैं बहुत से पडावो को जिंदगी में पार करना लेकिन वो सब बची हुई जरुरी चीज़े कही दब जाती हैं उन छोटे छोटे कंधो के तले काम के बोझ में..
समूची दुनिया में बाल श्रमिकों की संख्या २४ करोड़ से भी अधिक है। इनमें से एक तिहाई से भी अधिक ब’चे खदानों, खतरनाक मशीनों, खेतों, घरेलू कार्यों और दूसरे प्रतिबंधित कार्यों में लगे हुए हैं। यूनीसेफ की एक रपट के अनुसार, विश्व में शोशण एवं भेदभाव के शिकार करोड़ों बच्चे दुनिया से गायब हो चुके हैं। इस तरह बुनियादी सुविधाओं से वंचित ब’चों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। ब’चों की खराब स्थिति के मद्देनजर विश्व में भारत छठे स्थान पर है। वर्श २०११ की जनगणना के अनुसार, यहां लगभग बारह करोड़ बाल मजदूर है और ए सभी १४ वर्श से कम उम्र के हैं। हालांकि संसद में सरकार के कथनानुसार १५ वर्श से कम आयु के सवा करोड़ से कुछ अधिक बच्चे स्कूल जाने की बजाय पेट की भूख मिटाने के लिए कठोर श्रम करने विवश हैं। देश के विभिन्न रा’यों में स्थितियां अलग-अलग हैं परंतु शोशित, उत्पीडि़त, घर से भागे हुए, यौन उत्पीडऩ के शिकार और निश्द्घि क्षेत्रों में मजदूरी कर रहे बच्चे तो हर राज्य में है और इनकी संख्या लगातार बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि समाज में कानून का कोई डर नहीं है।
भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने १६ खतरनाक व्यवसायों एवं ६५ खतरनाक प्रक्रियाओं की बाकायदा सूची जारी कर उनमें १४ वर्श तक की उम्र के बच्चों को रोजगार देना निश्द्घि घोशित किया है। फिर भी शहर, हर गली-मुहल्ले में बच्चे प्रतिबंधित कार्यों में लगे हुए देखे जा सकते हैं। चाय के ठेलों, ढाबों, मोटर-गैरेज और घरों में कामगार के रूप में बच्चे की पहली पसंद होते हैं, क्योंकि कम मेहनताने पर अधिक काम लिया जा सकता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाला मीडिया भी बच्चों का शोशक है। हर शहर, रेल्वे स्टेशन, बस स्टैंड और सड़कों पर अखबार बेचते बच्चे बाल श्रम का प्रमाण हैं। मगर कोई पत्रकार, ग्राहक या अखबार मालिक इस बाल श्रम के विरूद्घ आवाज नहीं उठाता। कैसी विडंबना है। सरकार ने स्कूल चलें अभियान चलाया है, मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था की है, शिक्षा को बच्चों का अधिकार घोशित किया है। लेकिन बच्चों का बचपन सुरक्षित नहीं हो पा रहा है। वे शोशित और कुपोशित ही हैं। कोई शासकीय योजना उनके उ’जवल भविश्य की गारंटी नहीं बन पा रही है तो दोश किसका है ? राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर महिला बाल विकास विभाग तथा बाल अधिकार संरक्षण आयोग के होते हुए भी बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं। उन्हें श्रम से मुक्ति नहीं मिल पा रही है, आखिर क्यों ?
कभी सोचा हैं वो नन्हे नन्हे हाथ क्यों काम का दामन पकड़ लेते हैं. और बाद में जब इन्ही नन्हे नन्हे हाथो को 2 पैसे मिलते हैं तो इनका दिल
खुशियों के समन्दर से भर जाता हैं बिना इन्हें ये मालुम हुये कि ये धीरे धीरे वे शोषण के जाल में फंस रहे हैं.
आप जानते हैं सबसे घटिया बात क्या हैं इस बाल श्रम की! बच्चो का काम करना? जी नहीं. छोटी सी उम्र में बचपन को खो देना? जी नहीं! उन छोटे छोटे मासूमो का शोषण होना? जी बिलकुल भी नहीं! सबसे घटिया हैं सबका जागरूक रहकर भी इस कृत्य में साथ देना. क्या वे ढाबे वाले , कारखाना चलाने वाले, छोटी – मोटी दुकान चलाने वाले नहीं जानते की बाल श्रम करवाना एक गैर क़ानूनी काम हैं. आज के समय में हर व्यक्ति इस चीज़ से वाकिफ हैं की बाल श्रम मजदूरी एक ऐसा काम हैं जिसमे आपको
3 साल की सजा और 10,000 रुपयों का जुर्माना भी भरना पड़ सकता हैं तथा इस कृत्य को वापस दोहराने पर दोगनी सजा और जुर्माने का प्रवाधान भी हैं . लेकिन बावजूद इसके कम लागत पर अपना काम बनते हुवे देखना इनकी संवेदनशीलता को ख़त्म कर देता हैं और बच्चो को श्रमिक बनवाने में अहम भूमिका निभाते हैं.`
बाल श्रम को लेकर समाज में जागरूकता :
लेकिन क्या आप जानते हैं भला इनसे भी घटिया क्या हैं जी हां! इनसे भी घटिया. इनसे भी घटिया हैं हमारे समाज में आपका और मेरा ये सब देख कर भी, जानकार भी मूक रहना. क्या हमने बचपन में जो सिखा, जो पढ़ा वो इसीलिए की जहा पर हमे अपनी आवाज़ बुलंद करनी चहिये वहाँ पर हम भीगी बिल्ली बन जाएं. और एक ऐसे नीच सोच रखने लग जाएं की भला हमे क्या मतलब इनसे. मतलब हैं जब तक हम इंसान हैं इस संसार में हैं. हमे हर उस गैर क़ानूनी और गैर इंसानियत काम के खिलाफ अपनी आवाज़ मजबूत करके बोलना चाहिए, आगे बढ़ना चाहिए. यदि आप सक्षम हैं तो कृपया कर पीछे ना हटे. कुछ तो करे बच्चो को उस दलदल से निकालने के लिए क्युकी यदि आप इस चीज़ में आगे बढ़ेंगे तभी तो असल रूप मे
समाज में जागरूकता फैलेगी. नहीं तो हर व्यक्ति यही सोचेगा की भला उसे क्या मतलब. और अगर आप इस चीज़ में सक्षम नहीं हैं की उनको सच में वहाँ से बाहर ना भी निकले पर अपनी तरफ से कुछ तो करे. जैसे की यदि आप अपनी सोशल नेटवर्किंग साईट पर इस चीज़ से सम्बंधित कुछ लिख कर अपना जानने वालो में लगातार जागरूक बना सकते हैं. क्युकी यदि आप जागरूक रहेंगे तभी समाज भी जागरूक रहेगा. बस इसको खत्म करने में निरंतर प्रयास करते रहिएगा चाहे छोटे मोटे स्तर पर करे.
वो सुंदर से दिन बिना किसी इर्ष्या बिना किसी गलत भावना से, मोह माया से दूर बस अपनी ही धुन में मस्त मगन रहना. दोस्तों के साथ खूब मौज करना. ये सब के बारे में नहीं जानते बाल श्रमिक . क्या इनका मन नहीं करता होगा दुसरे बच्चो को देख के खेल खेलने का. क्या इनका मन नहीं करता होगा. दोस्तों के साथ मस्ती करने का, क्या इनका मन नहीं करता होगा की इनके छोटे छोटे हाथो को
माँ बाप का हाथ मिले और स्कूल की तरफ इनके भी कदम पड़े. आखिर क्यों? उस छोटी सी उम्र में ये सब ना मिल पाना अलग हैं पर इनका मन भी ना करे ये तो असंभव हैं. क्युकी उस उम्र में दिल चाहता क्या है. कुछ नया करना. किसी बड़े के प्यार और दुलार के साए में रहना.
-अनिल अनूप

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