माता पिता की सेवा से सन्तानों को स्वर्गीय सुख प्राप्त होता है

मनमोहन कुमार आर्य

                सभी मनुष्यों के जीवन में माता-पिता होते हैं जो सन्तानों को जन्म देने के साथ उनका पालन भी करते हैं। सन्तान को जन्म देने में माता-पिता को अनेक कष्टों से गुजरना पड़ता है। माता-पिता यदि सन्तान की रक्षा व पालन न करें तो सन्तान का जीवित रहना भी सम्भव नहीं होता। सन्तान को सब प्रकार का आवश्यक ज्ञान माता व पिता ही कराते हैं। उसके शरीर में जो बल व सोचने के लिये बुद्धि आदि होती है, उसके निर्माण में माता का दुग्धपान व पालन ही मुख्य होता है। बच्चों की शिक्षा व उसके बाद उनके विवाह व रोजगार आदि दिलानें में भी माता-पिता का महत्वपूर्ण योगदान होता है। आजकल देखा जाता है कि पाश्चात्य शिक्षा पद्धति, कुसंस्कारों  व सामाजिक वातावरण के कारण सन्तानें अपने माता-पिता के उपकारों को भुला देती हैं और जिस भावना से उन्होंने उनका पालन किया होता है, सन्तानों के जीवन व व्यवहार में वह भावनायें व उनके अनुरूप व्यवहार दृष्टिगोचर नहीं होता। यह एक प्रकार की कृतघ्नता होती है जिससे सन्तानों का अपयश होता है। सन्तानें भले ही आज युवा हों परन्तु कुछ वर्ष बाद उन पर भी वृद्धावस्था आनी ही है। ऐसी अवस्था में उन्हें भी अपनी सन्तानों से सहारे व सेवा की आवश्यकता होगी। यदि वृद्धावस्था में उनको उनकी सन्तानें सहारा व आश्रय न दें, तो उनका अपना जीवन भी दुःखद व दूभर बनेगा। ऐसी अवस्था में सभी युवा सन्तानों को सोच विचार कर अपने कर्तव्यों का ध्यान करना चाहिये और जिस भाव व समर्पण से माता-पिता ने अपनी सन्तानों का पालन किया होता है, उन्हीं भावनाओं से सन्तानों को भी अपने माता-पिताओं का सहारा बनना चाहिये। ऐसा करने से सन्तानों को जीवन व परलोक में अनेक लाभ होते हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो सन्तानों को ईश्वर की इस व्यवस्था में अपने कर्मों के अनुसार क्षति पूर्ति करनी होगी जिसका परिमार्जन बाद में कदापि नहीं किया जा सकता। आवश्यकता है कि इसके लिये वैदिक साहित्य को पढ़ा जायें और इसमें पितृयज्ञ के अन्तर्गत सन्तानों के जो कर्तव्य कहे गये हैं, उनका गम्भीरता से पालन किया जाना चाहिये। इसी में सभी सन्तानों का हित है।

                माता निर्माता होने के कारण माता कहलाती है। वस्तुतः सन्तान का स्वास्थ्य एवं उसकी आत्मिक एवं शारीरिक उन्नति माता के द्वारा ही होती है। पिता का इसमें प्रमुख योगदान होता है। यदि पिता श्रम करके धनोपार्जन न करे और बच्चों की शिक्षा का उचित प्रबन्ध न करे तो सन्ताने शिक्षित एवं संस्कारी नहीं बन सकती। देश का दुर्भाग्य है कि हमारे स्कूलों में चरित्र निर्माण तथा माता-पिता द्वारा सन्तानों के निर्माण में योगदान की शिक्षा नहीं दी जाती। माता पिताओं के त्याग व सन्तानों पर उनके उपकार के विषय में सन्तानों को ज्ञान कराया जाना चाहिये। इसके साथ ही वेदों व वैदिक साहित्य में सन्तानों के क्या कर्तव्य बतायें गये हैं तथा इतिहास के ग्रन्थों से माता-पिता की सेवा के प्रमुख प्रेरक प्रसंगों को भी उन्हें पढ़ाया जाना चाहिये। हमारे सभी शास्त्रों में माता पिता के सन्तानों पर ऋणों व उनकी सेवा सुश्रुषा करने की प्रेरणा की गई है। मनुस्मृति में कहा गया है कि दस उपाध्यायों से एक आचार्य, सौ आचार्यों की अपेक्षा एक पिता और हजार पिताओं की अपेक्षा एक माता का गौरव में अधिक है। बाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग आता है जिसमें रामचन्द्र जी लक्ष्मण को कहते हैं कि माता तथा मातृ भूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होते हैं। रामायण का श्लोक है ‘अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।’ अर्थात् हे लक्ष्मण! मुझे सोने की लंका बिल्कुल पसन्द नहीं है, मेरे लिए तो जन्म देने वाला जननी माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।

                महाभारत का यक्ष-युधिष्ठिर संवाद देश देशान्तर में प्रसिद्ध है। यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि पृथिवी से भारी क्या है? आकाश से भी ऊंचा क्या है? इसके उत्तर में युधिष्ठिर जी ने कहा कि माता पृथिवी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। महाभारत में एक स्थान पर यह भी कहा गया है कि ‘नास्ति मातृसमो गुरुः’ अर्थात् माता के समान दूसरा कोई गुरु नहीं है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द जी ने लिखा है कि माता, पिता और आचार्य देवता होते हैं क्योंकि इन्हीं के धार्मिक व विद्वान होने से सन्तान का सबसे अधिक उपकार होता है। रामायण के दण्डकारण्य गमन के प्रसंग में राम जी की पितृ भक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है जैसा विश्व के इतिहास में दूसरा नहीं है। राम ने माता कैकेयी को कहा था कि मेरे पिता दशरथ यदि मुझे जलती चिता में प्रवेश करने को कहेंगे तो मैं बिना विचार किये उनकी आज्ञा का पालन करुंगा। यदि वह मुझे हलाहल विष पीने को कहें तो उसे भी मैं पी लूंगा। ऐसे उत्तम विचारों के कारण भारतीय वैदिक संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति थी तथा आज भी है। अथर्ववेद के मन्त्र 3/30/2 में ईश्वर द्वारा मनुष्यों को शिक्षा देते हुए कहा गया है कि पुत्र अपने पिता का आज्ञाकारी हो। माता के समान मन वाला हो अर्थात् माता तथा पुत्र के मन एक समान एक जैसे विचारों वाले तथा परस्पर सम्मान व एक दूसरे का हित सिद्ध करने वाले हों। हमें शास्त्रों की यह मान्यता भी स्मरण रखनी चाहिये जिसमें कहा गया है कि माता सन्तान के लिये देवतुल्य है। पिता भी अपनी सन्तानों के लिए देवतुल्य होता है। सभी सन्तानों को अपने माता पिता के साथ देवताओं के प्रति किया जाने जैसा व्यवहार ही करना चाहिये। ऐसा न करना अधर्म व पाप श्रेणी में आता है। इसका अर्थ है कि जो सन्तानें माता पिता की भावनाओं के विपरीत कार्य करती हैं तथा अपने आचार व व्यवहारों से उन्हें दुःख देती हैं वह पाप व अधर्म करती हैं जिसका फल उन्हें ईश्वर से दुःख आदि तथा सामाजिक अपयश के रूप में उनको मिलता है।

                जो सन्तानें माता पिता के साथ अच्छा व्यवहार करती हैं व उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए पूर्ति करती हैं उनसे माता-पिता प्रसन्न रहते हैं और उन पर आशीर्वादों की वर्षा करते हैं। इससे सन्तानों को जन्म जन्मान्तरों में सुख मिलता है। माता पिता ने सन्तानों को जन्म देने से लेकर उनके पालन व शिक्षा दीक्षा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होती है। इस ऋण के अनुरूप ही सन्तानों को अपने अपने माता-पिता के प्रति सद्व्यवहार करना चाहिये। यदि वह ऐसा नहीं करते वह कृतघ्नता के पाप से बच नहीं सकते। माता पिता की सेवा करने से सन्तानों को एक लाभ यह भी होता है कि बच्चें जब अपने माता-पिता को अपने दादा-दादी की सेवा करते देखते हैं तो उन पर इसका संस्कार पड़ता है। बड़े होकर वह भी इसी प्रकार करेंगे। यदि माता-पिता अपने अपने माता-पिता की सेवा सुश्रुषा में कमी करते हैं तो इससे माता-पिताओं को कालान्तर में अपनी सन्तानों द्वारा ज बवह बड़ी होगी तथा माता-पिता वृद्ध होंगे, तब सन्तानें उनके प्रति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे। वृद्धावस्था तो संसार में सभी मनुष्यों को अनिवार्य रूप से आती ही है और सभी माता-पिता अपनी सन्तानों से माधुर्य युक्त सद्व्यवहार तथा रोग व अभाव आदि की स्थिति में पालन व आश्रय की इच्छा करते ही हैं। अतः युवा सन्तानों को माता-पिता की सेवा के पुण्य कार्य को कभी अपने हाथों से जाने नहीं देना चाहिये। स्वाध्याय से यह भी जाना जाता है कि यदि हम माता-पिता की सेवा करेंगे तो हमारा परजन्म वा पुनर्जन्म उत्तम योनि में होगा और हमें वहां सुख का परिवेश प्राप्त होगा। यदि माता पिता के प्रति हमारा व्यवहार निन्दनीय होगा तो हमें इसका फल भी परजन्म में मिलेगा जहां हमें अनेक प्रकार के दुःख प्राप्त होंगे।

                माता-पिता की सेवा करने वाली सन्तानों को यश की प्राप्ति होती है। माता-पिता की सेवा करने वाले बच्चों को लोग प्रायः कह देते हैं कि यह दूसरा श्रवणकुमार है। श्रवणकुमार की कथा भारत में जन जन में प्रचलित रही है। आज भी इस कथा को माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को बाल्यकाल में ही सुनाना चाहिये जिससे उन पर माता पिता की सेवा के संस्कार पड़े। माता पिता की सेवा से हमारा समाज सुव्यवस्थित रहता है तथा इससे सन्तानों को भी परिवार में वृद्ध अनुभवी शुभचिन्तक व मित्र प्राप्त होते हैं। यह भी परमात्मा की व्यवस्था है कि जब हम त्याग व दूसरों की सेवा करते हैं तो हमें इससे आत्म सन्तोष रूपी सुख मिलता है। यदि हम अपने माता-पिता की सेवा करेंगे तो निश्चय ही हमें आत्म सन्तोष रूपी सुख प्राप्त होगा। माता पिता की सेवा पर आर्यसमाज के कीर्तिशेष संगीत सम्राट श्री पं. सत्यपाल पथिक जी ने एक अत्यन्त लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण गीत लिखा व गाया है जो उन्हीं के स्वर में यूट्यूब आदि पर उपलब्ध है। गीत अत्यन्त प्रभावशाली एवं भावनात्मक है। भजन के बोल है ‘हम कभी माता पिता का ऋण चुका सकते नहीं। इनके तो अहसान हैं जितने गिना सकते नहीं।।’ हमने इस भजन को लगभग अनेक बार सुना है व अब भी यदा कदा सुनते रहते हैं। सभी परिवारों में इस भजन को सन्तानों को समय समय पर सुनाया जाना चाहिये। इससे भी बचपन में ही संस्कार मिलेंगे और उनका सुधार होगा।                 माता-पिता के त्याग तथा सन्तानों के माता पिता के सम्मान, आज्ञा पालन तथा सेवा आदि के अनेक उदाहरण पुस्तकों व कथाओं में सुनने को मिलते हैं। ऐसे प्रसंगों की पुस्तकों का प्रकाशन होकर हमें उनका नियमित स्वाध्याय करना चाहिये। यदि ऐसा होगा तो समाज में आज जो स्थिति है उसमें सुधार होगा। ईश्वर करें कि सभी सन्तानें माता पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझे और उनका पालन करें जिससे कोई माता पिता सन्तानों के व्यवहार आदि से किंचित दुःखी न हो।

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