तालिबानी सोच पर लगे पूर्ण विराम

-विनोद बंसल

राष्ट्रीय प्रवक्ता-विहिप

अफगानिस्तान में जब से तालिबान बन्दूक के बल पर कब्जे की ओर बढ़ा है तभी से भारत के चरमपंथियों की तालिबानी मानसिकता को भी खाद-पानी मिलने लगा है। एक ओर जहां ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सरेआम तालिबान की तारीफ में कसीदे पढ़ रहा है वहीं समाजवादी पार्टी के सांसद जिन्हें मेकर कहा जाता है, लॉ ब्रेकर का काम सरेआम कर रहे हैं। यह ‘माननीय’ वही हैं जिन्होंने भरी संसद में वंदेमातरम का अपमान करते हुए विरोध किया था। वे अपनी तालिबानी और इस्लामिक जिहादी सोच के बारे में बहुचर्चित हैं। उन्होंने कोरोना काल में भी किस तरह के वक्तव्य दिए थे, सभी जानते हैं। तालिबान के बढ़ते आतंकी प्रभाव से मुग्ध इन महाशय ने तो हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को ही कलंकित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी। जिन स्वतंत्रता सेनानियों पर संपूर्ण भारत को गर्व है उसकी तुलना तालिबानियों से करके उन्होंने सम्पूर्ण राष्ट्र को ही शर्मसार कर दिया। इतना ही नहीं, जिनको मशहूर शायर कहा जाता है वह भी तालिबानियों के तलवे चाटने लगे। धीरे-धीरे करके भारत में भी तालिबानी मानसिकता न सिर्फ पनप रही है अपितु, उसके महिमा-मंडन करने वाले लोग सरेआम आगे आ रहे हैं।

शायद इसी का परिणाम है कि मोहर्रम के जुलूस में बिहार के कटिहार में मरीजों पर हमला हो या उज्जैन सहित भारत के कई स्थानों पर हिंदुस्तान मुर्दाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे या फिर इंदौर के बॉम्बे बाजार में दलित बेटी को बचाने गई पुलिस पर जिहादियों का सामूहिक आक्रमण, सभी में मानसिकता एक ही स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम खाएंगे भारत का और गाएंगे पाकिस्तान का। कहलायेंगे हिंदी और काम करेंगे पाकिस्तानी। जिस थाली में खाते हैं उसी थाली में छेद करने की इनकी पुरानी सोच बार-बार उजागर होती है। तालिबानी मानसिकता के जनक के रूप में दारुल उलूम देवबंद को कौन नहीं जानता। दारुल उलूम के असंख्य मदरसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में मानवता के विरुद्ध मुसलमानों को इस्लामिक कट्टरपंथी व जिहादी शिक्षा के विशेष केंद्र बन चुके हैं।

अभी हाल ही में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने युवक-युवतियों के आपसी संबंधों और अन्तर्धार्मिक निकाहों पर प्रतिबंध स्वरूप एक गाइडलाइन जारी की है। इसमें उसने मस्जिदों, इमामों, दीनी शिक्षा देने वालों, उलेमा-इकरान तथा मुस्लिम लड़कियों के अभिभावकों को विशेष हिदायत देते हुए कहा कि  लड़कियों को लड़कों के साथ न पढ़ाएं, लड़कियों की शिक्षा अलग करें, लड़कियों के मोबाइल पर नजर रखें। उन्हें कुरान और हदीस की शिक्षा के साथ बताएं कि गैर मुस्लिम के साथ कोई संबंध न बनाएं, स्कूल में लड़कियों को पढ़ाने का प्रयास न करें और यह देखें की लड़कियां मोबाइल फोन पर क्या करती हैं। वे कहीं स्कूल के बाहर तो समय व्यतीत नहीं करतीं, गैर मुसलमानों के साथ तो नहीं रहतीं। इसमें यह बात भी स्पष्ट तौर पर कही गई की नस्ल की सुरक्षा के लिए और अपनी कौम को बर्बादी से बचाना है तो अंतर धार्मिक विवाह को रोकें। इस्लाम की सही तालीम मां-बाप बच्चों को नहीं दे रहे हैं। इसलिए, इमामों, धर्मगुरुओं और उलेमाओं के द्वारा मुस्लिम बच्चों को समझाया बुझाया जाए।

महत्वपूर्ण बात यह है कि एक तरफ गंगा-जमुनी की बात करते हैं, भाई-चारे का ढोंग करते हैं, संविधान की दुहाइ देते हैं, सौहार्द की बात करते हैं और अगर मुस्लिम लड़का किसी गैर मुस्लिम से संबंध बनाता है, निकाह करता है, उसका धर्मांतरण करता है तो उसे पुरुस्कार दिया जाता है जबकि दूसरी ओर, अगर कोई मुस्लिम लड़की किसी गैर मुस्लिम से गलती से भी प्यार कर बैठे तो इनका इस्लाम खतरे में पड़ जाता है। अधिकांश ऐसे हिन्दू लड़के, उनके परिजन तथा कई बार तो लडकी की भी जान ले ली गई। लव जिहाद, धर्मांतरण और नारी उत्पीड़न के लिए कुख्यात इस्लामिक जिहादी लगातार गैर मुसलमानों और उनकी बेटियों पर कुदृष्टि लगाए रखते हैं। उत्तर प्रदेश में लव जिहाद व धर्मान्तरण विरोधी कानून जब से बना है उसको अभी 1 वर्ष भी पूरा नहीं हुआ लेकिन उस कानून के अंतर्गत 100 से अधिक मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। दर्जनों चार्ज शीट हो कर सलाखों के पीछे हैं। अन्य राज्यों में भी जहां कानून बने, उसका प्रतिसाद जनता ने देखा। लेकिन दुर्भाग्य से अभी भी अनेक राज्य, बल्कि मैं कहूंगा कि अधिकांश राज्य ऐसे हैं जहां पर इस तरह के कानून के अभाव में जिहादी खुलेआम नारियों का चीरहरण, उनका धर्मांतरण, बलात्कार, हत्या व आतंकवाद में संलिप्त हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, दारुल उलूम देवबंद तथा कट्टरपंथी सोच के जिहादियों व देश विरोधियों पर अंकुश लगे। भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद, तालिबान जिंदाबाद, नारा-ए-तकबीर अल्ला-हू-अकबर जैसे नारों पर विराम लगे और कट्टरपंथियों, जिहादियों व देशद्रोहियों के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही हो। धारा 370 हटने के बाद कश्मीर घाटी में अभी भी कुछ लोग तालिबानी और जिहादी मानसिकता के महबूब और महबूबा बने हुए हैं। उन पर भी समय पर शिकंजा जरूरी है। बार-बार वे कहते थे तिरंगे को उठाने वाले नहीं मिलेंगे, वे अब भी धमकी देने का दुस्साहस कर रहे हैं कि हमारे सब्र का बांध टूट जाएगा। ऐसी मानसिकता पर अब भारत में पूर्ण विराम का समय आ चुका है।

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