कांग्रेस को तुष्टिकरण ने पहुंचाया है अर्श से फर्श पर

विवेक कुमार पाठक
मप्र में सीएम उम्मीदवार के लिए नाम का मामला पौराणिक काल के स्वयंवर से कम नजर नहीं आ रहा।
सीएम प्रत्याशी के लिए ऐसे ऐसे नेता नाम चला रहे हैं जिनकी राजनीति सत्तारुढ़ दल और सीएम से मधुर संबंधों के बदौलत चल रही है। सीएम उम्मीदवार का हल निकालने से पहले कांग्रेस पार्टी को बीजेपी से मुकाबले के लिए बहुत कुछ बीजेपी वालों से सीखना ही होगा।
उनके मातृ संगठन की नाक भौं सिकोड़कर कितनी बुराई कर लो मगर कांग्रेस की हालत इस मामले में खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली है। खुद पचास साल तक सत्ता में रहकर क्यों आरामतलब राजनीति करते रहे कांग्रेसी नेता। अगर देश में 1982 में 2 सीट वाली भाजपा अगर आज 300 के लगभग पहुंचकर राज कर रही है तो कुछ तो उसने किया ही होगा।
भाजपा की इस सफलता के पीछे असली कारण कांग्रेसी विफलता है। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में बहुत कुछ किया है मगर ये भी एकदम सच है कि कांग्रेस इतने लंबे शासनकाल में इससे बहुत ज्यादा कर सकती थी। कांग्रेस का वर्तमान स्वरुप उसकी तुष्किरण राजनीति का परिणाम है।
पूरी दुनिया मे हिन्दुओं की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत में हिन्दुओं को लंबे समय तक उपेक्षा मिली है। हिन्दू हित की जायज बात कहने वालों को साम्प्रदायिक कहना इसी पार्टी के राज्य में शुरु हुआ।
इस जुमले का बाद में सपा बसपा से लेकर वामपंथियों और तमाम क्षेत्रीय दलों ने भी जमकर उपयोग किया। 1982 के बाद से देश के नक्शे पर भाजपा का बढ़ता प्रभाव समाज से बहुसंख्यकों की जबाबी प्रतिक्रिया स्वरुप सामने आ रहा है।
हिन्दुओं का ये तर्क विचारणीय है कि देश का बहुसंख्यक हिन्दू समाज अगर हिन्दुस्तान में आत्मसम्मान नहीं पाएगा तो फिर क्या यूएई और सउदी अरब में पाएगा।
मुसलमानों को थोकबंद वोट के लिए इस्तेमाल करने वाले दलों ने तुष्टिकरण के लॉलीपाप से लंबे समय तक सत्ता भोगी है। देश भर में केसरिया रंग बहुसंख्यकों की इसी प्रतिक्रिया का पर्याय है। अगर ऐसा न होता तो राहुल गांधी अखिलेश यादव ममता बनर्जी और अन्य विपक्षी नेताओं का मौजूदा व्यवहार सामने नहीं आता।
राहुल गांधी को देश भर के मठ मंदिरों में दर्शन की ब्रांडिंग से लेकर खुद को जनेउधारी तक बताना पड़ रहा है।सपा के चिरंजीव अखिलेश यादव को अपने पुस्तैनी गांव में विशालकाय हिन्दू आराध्य प्रतिमा लगानी पड़ रही है। बंगाल में बात बात पर हिन्दुओं की उपेक्षा करने वाली ममता बनर्जी ने भी बहुत गुणा भाग लगाकर ऐतिहासिक गंगासागर मेले पर ध्यान दिया है।
इन नेताओं को ऐसा विशेष करने की कोई जरुरत नहीं थी मगर इनके बयानों और आरोपों ने सहृदयी हिन्दू समाज को लंबे समय तक छलनी किया है। पूरी दुनिया में अब तक हिन्दुओं ने कट्टरता से दूर रहते हुए एक सभ्य समाज के रुप में पहचान बनाई है। यकीनन दुनिया के दूसरे धर्मों के लोग भी कम अदब पसंद और सभ्य नहीं हैं मगर इतिहास के विभिन्न कालखंडों में हम ऐसा बहुत कुछ देख चुके हैं जिसे बताने की फिलहाल जरुरत नहीं है।
भारत को धर्मनिरपेक्षता का हाल में बेबजह ज्ञान बांटने वाले बराक ओबामा का अमरीकी समाज कितना नस्लभेदी है पिछले साल दुनिया खूब देख चुकी है।
दुनिया के मुस्लिम देशों में क्या क्या हो रहा है अब आए दिन टीवी चैनलों पर सामने आ रहा है। भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज जिओ और जीने दो वाला रहा है। अपवाद हर जगह होते हैं और कुछ बिगड़ैल हर परिवार और समाज की पनौती बनकर पैदा होते हैं सो उनका उपचार समाज में समय समय पर होता रहता है।
देश में भाजपा का निरंतर विस्तार असल में हिन्दु समाज की जवाबी प्रतिक्रिया है। दूसरे दलों की दनादन हार से साफ है कि उन्हें वोट से पहले विश्वास कायम करना होगा।
ये तुष्टिकरण का भूत भारत की विपक्षी पार्टियों को ठिकाने लगा रहा है। इसे सही नीयत से बंद किया गया तो देश की राजनीति में बाकी बदलाव के रास्ते भी खुल जाएंगे क्योंकि किसी समाज ने सत्ता में बने रहने का पट्टा किसी एक दल के नाम नहीं किया है।
जो सबको इज्जत सम्मान और सुरक्षा देगा कुर्सी पर
वही बैठेगा।

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