कांग्रेस को चाहिए एक असली गांधी

भारत में कांग्रेस लम्बे समय तक शीर्ष पर रही; पर अब उसके अवसान के दिन हैं।
उनका कहना है कि वे चिंतन-मंथन कर भावी सफलता की योजना बनाएंगे; पर
बीमारी का मूल कारण समझे बिना उसका इलाज संभव नहीं है। अतः उन्हें थोड़ा
पीछे जाकर अपनी सफलता की पृष्ठभूमि समझनी होगी।
1947 के बाद कांग्रेस की सफलता के दो कारण थे। पहला था गांधीजी का नेतृत्व।
असल में अफ्रीका से लौटने से पहले ही गांधीजी यहां चर्चित हो चुके थे। सत्याग्रह
की शक्ति से उन्होंने वहां अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया था। भारत आकर
पहले वे पूरे देश में घूमे। इस दौरान उन्होंने गरीबी का नंगा नाच देखा। अतः
उन्होंने जीवन भर आधे वस्त्र पहनने का निर्णय लिया। इससे उनके आभामंडल में
त्याग की सुनहरी किरण जुड़ गयी।
जब वे भारत आये, तो कांग्रेस में नेतृत्व के नाम पर खालीपन था। लाल, बाल, पाल
और गोखले राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो रहे थे। इस शून्यता को गांधीजी ने
भरा। धीरे-धीरे गांधीजी और कांग्रेस एक दूसरे के पर्याय हो गये। यद्यपि वे कभी
पार्टी के सदस्य नहीं बने; पर उनकी इच्छा के बिना वहां कुछ होता नहीं था। त्रिपुरी
अधिवेशन में उनकी इच्छा के विरुद्ध अध्यक्ष बने सुभाष बाबू को अंततः त्यागपत्र
देना पड़ा। आजादी से पूर्व सभी राज्य समितियां सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के
पक्ष में थीं; पर गांधीजी ने वीटो लगाकर नेहरू के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ
कर दिया। अर्थात कांग्रेस में कुछ नहीं होते हुए भी सर्वेसर्वा वही थे।
गांधीजी के नैतिक आभामंडल का एक कारण यह भी था कि उन्होंने या उनके
किसी परिजन ने पार्टी और शासन में कोई पद नहीं लिया। आजादी मिलने पर
जहां नेहरू और उनके साथी जश्न में डूबे थे, वहां गांधीजी बंगाल में हो रहे मजहबी
दंगों के पीडि़तों के बीच घूम रहे थे। इसलिए गांधीजी के नाम और काम का लाभ
कांग्रेस को हमेशा मिलता रहा।

कांग्रेस की सफलता का दूसरा कारण विपक्ष में नेतृत्व का अभाव था। आजादी से
पहले कांग्रेस में विभिन्न विचारधारा वाले लोग थे। इसीलिए 1947 में गांधीजी ने
कांग्रेस को भंग करने को कहा था; पर सत्तालोभी नेहरू राजी नहीं हुए। गांधीजी की
हत्या से वे शासन और पार्टी दोनों के मालिक हो गये। उनसे नाराज होकर आचार्य
कृपलानी, आचार्य नरेन्द्रदेव, डा. लोहिया, सी. राजगोपालचारी, जयप्रकाश नारायण,
मोरारजी देसाई आदि जो लोग पार्टी से निकले, उन पर भी कांग्रेस का लेबल ही
लगा रहा। इसलिए वे नेहरू से बड़ी लकीर नहीं खींच सके। नेहरू के बाद इंदिरा
गांधी तक यही कहानी चलती रही।
पर इसके बाद कांग्रेस का प्रभाव घटने लगा। यद्यपि राजीव गांधी को अभूतपूर्व
जीत मिली; पर वह इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति के कारण थी। उधर
वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर आदि का तत्कालीन नेतृत्व भी मूलतः कांग्रेसी ही था। इसलिए
एक ओर असली कांग्रेसी, तो दूसरी ओर कांग्रेस से निकले कांग्रेसी। ऐसे में लोगों ने
असली कांग्रेसियों को ही समर्थन देना जारी रखा।
पर आज भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसा नेतृत्व है, जो कभी कांग्रेस में नहीं
रहा। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेन्द्र मोदी, राजनाथ
सिंह, अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा तक सब ऐसे ही नेता हैं। इनका
सामाजिक प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हुआ है। कांग्रेस में अपने परिवार
को, जबकि संघ में देश को सर्वोपरि माना जाता है। संघ अपनी सैकड़ों समविचारी
संस्थाओं, हजारों शाखाओं और लाखों सेवा कार्यों से देश के हर नागरिक तक पहुंच
रहा है।
कांग्रेस के पीछे गांधीजी जिस नैतिक बल के प्रतिनिधि थे, वह भूमिका भी अब संघ
निभा रहा है। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार बनी; पर संघ
वाले इस कोलाहल से दूर हैं। अपै्रल से जून तक देश भर में लगभग 150 स्थानों
पर संघ के प्रषिक्षण वर्ग लगे हैं। इनमें लगभग 50,000 कार्यकर्ताओं ने प्रशिक्षण
पाया है। जैसे आजादी के बाद के जश्न से दूर रहकर गांधीजी बंगाल में घूम रहे

थे, ऐसे ही भा.ज.पा. की चुनावी सफलता से अलिप्त रहकर संघ के कार्यकर्ता
प्रशिक्षण पा रहे हैं।
1947 में कांग्रेस के पास नेहरू जैसा नेतृत्व और गांधीजी की नैतिक शक्ति थी,
जबकि विपक्ष नेतृत्वहीन था। आज भा.ज.पा. के पास मोदी जैसा नेतृत्व और
नैतिक शक्ति से लैस संघ है, जबकि कांग्रेस नेतृत्व दिग्भ्रमित है। तभी तो भारी
पराजय के बावजूद उनमें नेता बदलने का साहस नहीं है, जबकि भा.ज.पा. ने भारी
जीत के बावजूद नया अध्यक्ष चुन लिया।
ऐसे में यदि कांग्रेस वाले अपनी पार्टी को जिन्दा करना चाहते हैं, तो उन्हें
राजनीतिक पदलिप्सा से दूर रहने वाले एक नये और असली गांधीजी ढूंढने होंगे;
पर वहां तो लोग आते ही खाने-कमाने के लिए हैं। इसलिए वह लगातार पीछे
खिसक रही है। शायद यही उसकी नियति भी है।

  • विजय कुमार, देहरादून

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