लेखक परिचय

डॉ.कैलाश चन्द्र

डॉ.कैलाश चन्द्र

सुनहरी बाग अपार्टमेंट, सेक्टर13, रोहिणी,दिल्ली110085. मो. नं.9899176787

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कर्नाटक की पिछली कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक पारित करवाया था। जिसके अंतर्गत उन सभी लोगों को, जिनका व्यक्तिगत मन्दिर है और वे मन्दिर भी जो ट्रस्ट के आधीन चलाए जा रहे हैं, उन्हें प्रतिवर्ष सरकार को कर अदायगी करनी पड़ेगी। ऐसा नहीं करने पर सरकार उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई करेगी। इस प्रकार का कानून केवल हिन्दू मन्दिरों पर ही लागू किया गया, मस्जिदों एवं चर्चों पर नहीं। संविधान की धारा 27 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को अपने धार्मिककृत्य के लिए टैक्स नहीं देना पड़ेगा और यदि सरकार टैक्स लगाने का प्रावधान करती है तो यह सभी मजहबों पर लागू होगा। क्या यह संविधान की धारा 27 का खुला उल्लंघन नहीं था?

हिन्दुओं के मन्दिरों से प्राप्त होने वाली आय को मदरसों को अनुदान एवं हज यात्रा पर जाने के लिए प्रयोग किया जाता रहा है। कर्नाटक की पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा मन्दिरों के धन को किस प्रकार मस्जिदों एवं चर्चों को दिया गया उसका एक उदाहरण :

वर्ष 1997 में कर्नाटक के दो लाख चौसठ हजार मन्दिरों से कुल प्राप्त होने वाली आय बावन करोड़ पैतीस लाख रुपए थी। इसमें से नौ करोड़ पच्चीस लाख रूपया मदरसों एवं तीन करोड़ रुपया चर्चों के लिए खर्च किया गया।

वर्ष 1998 में प्राप्त होने वाली राशि अट्ठावन करोड़ पैंतीस लाख रुपए थी। इसमें से चौदह करोड़ पच्चीस लाख रुपये मदरसों एवं पांच करोड़ रुपया चर्चों के लिए खर्च किया गया।

1999 में मन्दिरों से प्राप्त पैंसठ करोड़ पैंतीस लाख रुपयें में से सत्ताइस करोड़ रुपया मदरसों एवं आठ करोड़ रुपए चर्चों के लिए खर्च किया गया।

सन 2000 में कुल प्राप्त राशि उनहत्तर करोड़ छियान्वे लाख रुपए थी उनमें से पैतीस करोड़ रुपए अर्थात पचास प्रतित से भी ज्यादा राशि मदरसों एवं हज सब्सिडी पर एवं आठ करोड़ रुपए चर्चों पर खर्च किए गये। तेरह करोड़ इक्कीस लाख रुपया हज यात्रियों के लिए सुरिक्षत रखा गया।

वर्ष 2001 में कुल प्राप्त राशि इकहत्तर करोड़ रुपए में से पैतालीस करोड़ रुपए मदरसों एवं हज सब्सिडी पर (अर्थात साठ प्रतित से ज्यादा) और दस करोड़ चर्च के हेतु खर्च किया गया।

वर्ष 2002 में कुल बहत्तर करोड़ की धनराशि में से पचास करोड़ रुपए हज खर्च एवं मदरसों के लिए एवं दस करोड़ रुपए चर्च के पर व्यय किया गया।

हिन्दुओं के मन्दिरों की धनराशि  इनको देने का सीधा परिणाम यह निकला कि सौलह हजार मन्दिरों मंदिरों पर ताला पड़ गया, दूसरी और न जाने कितने हिन्दू ईसाई बनाये गये और अलगाववाद ओर उग्रवाद की फसल कितनी ब़ गई। कौन नहीं जानता कि मदरसें आतंकवादियों के निर्माण की फैक्ट्री ही हैं तथा चर्चों का एकमेव कार्य हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करना और भारत में नागालैण्ड, मिजोरम जैसे अनेक छोटेबड़े ईसाई राज्यों का निमार्ण करना ही है।

मन्दिरों से प्राप्त धन राशि का मदरसों एवं चर्चो के पर खर्च किए जाने का मतलग क्या यह नहीं है कि मन्दिर की धनराशि  को मंदिरों के ही विरुद्ध प्रयोग किया जा रहा है? क्या इसका मतलग उन्हीं संस्थाओं को हिंदुओं के पैसे से पोशित करना नही जो हिन्दुओं को बुतपरस्त घोशित करके उनके विरुद्ध अभियान चलाकर धर्मपरिवर्तन कराने का उपक्रम रचते हैं?

भारत ही संभवतः विव का पहला गैर मुस्लिम दो है जिसके अंतर्राश्ट्रीय हवाई अड्डे पर हज यात्रियों के लिए अलग टर्मिनल की व्यवस्था की गई है और भारत ही संभवतः विव का अकेला दो है जहां हिन्दू भावनाओं को कुचलते हुए हज यात्रियों को सब्सिडी देती है। पिचम के उदारवादी दों की बात छोडिए अरब, पाकिस्तान अफ्रीका एवं एाशिया के मुस्लिम बहुल दो भी हज यात्रियों के लिए किसी भी प्रकार का अनुदान नहीं देते। परंतु भारत सरकार हज यात्रियों की सब्सिडी पर अरबों रुपये खर्च करती है, जो प्रायः हिन्दुओं से ही टैक्ट के द्वारा प्राप्त किया होता है।

भारत सरकार हज यात्रियों के जाने, मक्का में ठहरने तथा वहां उनके स्वाथ्य की देखभाल एवं वापसी का प्रबंध करती है। 199394 में प्रति हज यात्री हवाई यात्रा में सात हजार रुपए की रियात दी जाती थी, 2002-2003 में यह ब़कर बाइस से पच्चीस हजार रुपए के बीच हो गई थी अब तो यह और भी अधिक हो गई है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में चलने वाली मनमोहन सरकार अनेक प्रकार से मुस्लिमों के लिए सरकारी खजाना लुटा रही है। जोकि संविधान की भावना के एकदम प्रतिकुल है।

 

3 Responses to “कांग्रेस का मुगलिया अंदाज”

  1. sunil patel

    अगर टैक्स लगता है तो सभी पर होना चाइये. मंदिरों का पैसा मंदिर, स्कूल, अस्पताल में लगे तो ठीक, मदरसों और चर्चो पर क्यों खर्च किया जा रहा है. बहुत आश्चर्यजनक निर्णय है.

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  2. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    हिदू सोये रहेंगे तो और न जाने क्या-क्या होगा.

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  3. vikas

    बर्तमान बीजेपी की कर्णाटक सर्कार इस कानून को बदलती क्यों नहीं है

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