कर्नाटक में कांग्रेस का कुटिल दांव – हिंदू लिंगायत विभाजन

प्रवीण गुगनानी

भारत में हिंदू को अल्पसंख्यक बनाने के षड्यंत्र पूर्वक प्रयास पिछले कई दशकों से चल रहें हैं. प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष चलने वाले इन षड्यंत्रों को कई रूपों में अलग अलग प्रकार से चलाया जाता है. मुस्लिम व ईसाई जनसंख्या को वभिन्न माध्यमों से बढ़ाने के अतिरिक्त एक और अन्य  तरीका अपनाया गया है हिन्दूओं को देश में अल्पसंख्यक बनाने का और वह है हिन्दूओं के विभिन्न समुदायों को अलग धर्म का दर्जा देना. कानूनी तौर पर सिख समाज को अलग धर्म का दर्जा देना, जैन समाज को अलग करके उन्हें अल्पसंख्यक मानना और अब कर्नाटक के लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक होने का झुनझुना पकड़ाना इस जनसांख्यिकीय षड्यंत्र का ही एक हिस्सा है. वो तो भला हो सिख समाज व जैन समाज का जिसे अलग कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी इन दोनों समुदायों ने हिंदू समुदाय से स्वयं को कभी अलग नहीं समझा व न ही हिन्दूओं में भी इन दोनों समुदायों के प्रति अलग समझने की प्रवृत्ति विकसित हुई. देश के सभी  राज्यों में बड़ी संख्या निवास करने वाले सिख व जैन समुदाय स्वयं को हिंदू समुदाय से अलग नहीं मानते हैं किंतु इस देश में जो षड़यंत्र पूर्वक कानूनी प्रबंध किये गए हैं वे यह विभेदकारी व्यवस्था देते हैं कि ये दोनों समुदाय स्वयं को दूसरों से पृथक मानें.

देश में भीतर ही भीतर वामपंथियों, कम्युनिस्टों, कांग्रेसियों व तथाकथित सेकुलरों ने भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज को बांटने का कोई अवसर नहीं छोड़ा. समय समय पर इस हेतु को पूर्ण करने के लिए समाज में विभिन्न विभाजक रेखाएं जान बूझकर बनाई जाती हैं. हमें अपनों के ही विरुद्ध खड़ा किया जाता है व हम हो भी जातें हैं.

कर्नाटक में बहुतायत से निवास करने वाले लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय के मिलने वाले लाभों का लालच देकर अलग धर्म का दर्जा देना देश को बांटने व हिंदू को अल्पसंख्यक करने का एक और ज्वलंत उदाहरण है. आगामी विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत केवल चुनावी लाभ को सिद्ध करने के लिए कर्नाटक की सिद्धारमैया नेतृत्व वाली कांग्रेसी सरकार ने एक और घृणित चाल चल दी है. यद्दपि इस विषय पर, राज्य सरकार से आये प्रस्ताव पर निर्णय लेने का अधिकार केंद्र सरकार के पास रहता है. केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस विषय पर अपना कड़ा, स्पष्ट व चुनावी हार जीत की तात्कालिक दृष्टि से ऊपर उठा हुआ निर्णय दे दिया है. अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देकर उन्हें हिंदू धर्म से अलग करने के षड़यंत्र को सफल नहीं होने देगी. अमित शाह के इस निर्णय से आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती उपस्थित हो सकती है किंतु हिंदू धर्म के लिए यह निर्णय एक मील का पत्थर निर्णय सिद्ध होगा. 3000 मठों की संख्या वाला यह प्रभावशाली लिंगायत समुदाय कर्नाटक के अतिरिक्त महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश व तेलंगाना में भी बड़ी संख्या में निवास करता है. यदि चुनावी लाभ को सिद्ध करने हेतु केंद्र की भाजपा सरकार लिंगायतों को अलग धर्म का मान लेती तो भविष्य में इन राज्यों में भी वैसी ही मांग जोर पकड़ती व अन्य समुदायों में भी स्वयं को अलग धर्म का मनवाने की होड़ चल पड़ती.

कर्नाटक की 6 करोड़ जनसंख्या में कम से कम 20 प्रतिशत संख्या वाले लिंगायत समुदाय में दो वर्ग हैं एक लिंगायत और दूसरे वीर शैव दोनों  अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आते हैं तथा इन्हें सरकारी नौकरियों में 15 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ हैं. ये शिव के उपासक यानी शैव हैं  इसलिए इन्हें  लिंगायत भी कहा जाता है.  1881 में अंग्रेजों ने लिंगायतों को हिन्दूओं से अलग करने की चाल चली थी जिसे अब कांग्रेस पूर्ण करने का प्रयत्न कर रही है. 12 वीं सदी में इस  समुदाय में एक महान समाज सुधारक संत   वासवराज या वस्वन्ना  ने सामाजिक  कुरीतियों के विरुद्ध जनजागरण किया था. कालांतर में उनको अपना गुरु मानने वाले अपने आपको वीर शैव या वीर शैव लिंगायत कहने लगे.

उल्लेखनीय है कि विभिन्न कारणों से कांग्रेस से मूंह फेर लाने वाले लिंगायत समुदाय के कारण ही 2008 में पहली बार इस दक्षिणी राज्य में भाजपा की सरकार बनी और इस समुदाय के बड़े नेता  बीएस येदिरुप्पा राज्य के मुख्यमंत्री बने. अब कांग्रेस की दृष्टि इस बात पर ही केन्द्रित है कि यदि लिंगायत समुदाय ने भाजपा के मुख्यमंत्री पद के घोषित प्रत्याशी येदिरुप्पा के नेतृत्व को एक तरफ़ा मतदान कर दिया तो कर्नाटक में पुनः भाजपा सरकार बन जायेगी.
कर्नाटक विधानसभा में इस समय लिंगायत समूदाय के 54 विधायक हैं. कर्नाटक की 100 विधानसभा सीटों पर प्रभावशाली संख्या वाले इस समुदाय इसके साथ ही इस  समुदाय के मतदाता  लगभग 100 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में हैं. राजनैतिक अवसरवाद के सधे हुए खिलाड़ी, सत्ता हेतु दलबदल करने वाले व सिद्धांतहीन कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केवल भाजपा से लिंगायतों को दूर करने हेतु यह धर्म विभाजक खेल खेला है. भाजपा पर सांप्रदायिक व वर्ग विशेष की राजनीति करने के आरोप लगाने वाली कांग्रेस व संतो को सदा कोसने, संतो का अपमान करने वाली व मठों आश्रमों से दूरी बनाये रखने वाली कांग्रेस ने यहां तक तुष्टिकरण करते हुए  चुनावी खेल खेला  कि ऐन चुनाव के पूर्व सभी शासकीय कार्यालयों में संत वासवराज जी का चित्र लगाना भी अनिवार्य कर दिया. हिंदू धर्मावलम्बियों को परस्पर विभाजित करने हेतु कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार ने पिछले महीनों में वीर शैव बंधुओं का एक सम्मेलन प्रायोजित कराया जिसमें लिंगायतों को गैर हिंदू और अल्पसंख्यक घोषित करने का एक प्रस्ताव पारित कर सरकार को दिया गया कुछ ही  समय बाद लिंगायत महासभा से  भी राजनैतिक चालें चल कर ऐसी ही  मांग कर डाली. आसन्न चुनावों के दृष्टिगत  मुख्यमत्री ने तुरंत सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री नाग मोहन दास की अध्यक्षता में  विशेषज्ञ समिति का गठन किया, जब इस समिति ने इस काम के लिए कम से कम छ:माह का समय  मांगा पर उसे दो माह में अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया. समिति ने अपनी रिपोर्ट मार्च, 18 के पहले सप्ताह में सरकार को सौंप दी. आनन फानन में गठित समिति व आपाधापी में बनी इस समिति की रिपोर्ट पर  मंत्रिमंडल की दो बैठकों में कहने मात्र को विचार विमर्श हुआ. मंत्रिमंडल में दो लिंगायत मंत्रियों ने इसका विरोध किया किंतु उनके विरोध के बाद भी समिति की अनुसंशा मान ली  गई जिसमें  दोनों लिंगायत समुदायों  को गैर हिदू और अल्पसंख्यक मान लिया गया और इस प्रकार हिंदू धर्म पर एक और कुठाराघात कर दिया गया. वो तो भला हो देश के क़ानून व संविधान का की किसी  समुदाय या जाति का दर्जा बदलने का अधिकार  केवल  केंद्र के पास है इसलिए कर्नाटक सरकार ने अपनी अनुसंशा केंद्र की मोदी सरकार को भेज दी. इस संदर्भ में मोदी सरकार ने बड़ा ही श्रेयस्कर,दीर्घकालीन व दुस्साहसी निर्णय लिया व चुनावी लाभ हानि से ऊपर उठ कर कह दिया कि शिव पूजक लिंगायतों को हिंदू धर्म से अलग का नहीं माना जा सकता है.

स्वाभाविक है की इस प्रकार के सुविधापूर्ण, लालीपाप भरे निर्णयों से अन्य समुदायों में अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त कर शासकीय सुविधाओं व आरक्षण का लाभ पाने का मोह बढ़ जाता है. कांग्रेस इसी मोह को हिंदू धर्मावलम्बियों में बढ़ाना चाहती है. कांग्रेस की यह दुराशयी चाल सफल हुई व अब कर्नाटक सरकार के सामने एक और समुदाय ने अपनी मांग रखी है. राज्य के कोडवा समुदाय ने अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने की मांग की है. कोडवा समुदाय को कूर्ग भी कहा जाता है. इस समुदाय के दो प्रतिनिधियों एमएम बंसी और विजय मुथप्पा ने राज्य सरकार को एक ज्ञापन भेजकर अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग की है. राज्य के अल्पसंख्यक विभाग ने इस ज्ञापन को कर्नाटक के अल्पसंख्यक आयोग को भेजा है. सूत्रों के मुताबिक आयोग ने इस मांग को स्थगित कर दिया है. महाराष्ट्र में भी लिंगायतों  को हिंदुओं से अलग करने का षड़यंत्र प्रारम्भ हो गया है. औरंगाबाद जिले में ऑल इंडिया लिंगायत को-ऑर्डिनेशन कमिटी ने स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित किये जाने की मांग के साथ  साथ जुलूस निकाला व प्रदर्शन किया.

यदि हिन्दुओं को धर्म आधारित या समुदाय आधारित आधारों पर इस विभाजित करने की तुष्टिकरण की नीति यदि इस देश में तनिक भी और आगे बढ़ी तो निश्चित ही कानूनी स्तर पर स्वयं को हिंदू मानने वाला समाज अत्यंत क्षीणतर आकार में दिखाई पड़ने लगेगा.

 

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