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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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लेखक- लालकृष्ण आडवाणी

 भारत अगस्त 1947 में स्वतंत्र हुआ था। यह देश के इतिहास का महान क्षण था। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन भी हुआ। इससे भी अधिक दुख की बात यह थी कि द्वि-राष्ट्र सिध्दांत के समर्थकों के कारण देश को विभाजन का मुंह देखना पड़ा।

भारत के नेतागण पाकिस्तान निर्माण के लिए सहमत हुए, परंतु भारत ने द्वि-राष्ट्र सिध्दांत को स्वीकार नहीं किया। स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण करते समय संविधान सभा दृढ़ता से उसी सिध्दांत पर अटल रही, जिस पर संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन चलता रहा था, अर्थात् अनन्त काल से भारत एक देश रहा है, और सभी भारतीय, चाहे वह किसी धर्म, जाति या भाषा के हों, एक जन हैं। हम मानते हैं कि हमारी एकता का आधार हमारी संस्कृति है।

लोकमान्य बाल गंगाधार तिलक का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था; महर्षि अरविन्द घोष बंगाल से थे; महात्मा गांधी गुजरात के थे। परंतु स्वतंत्रता आंदोलन के इन महान नेताओं का संपूर्ण उद्यम, संपूर्ण तपस्या, भारत माता के लिए थी।

संघ ही क्यों-परिसंघ क्यों नहीं

इस प्रसंग में जब संविधान सभा में देश के नाम पर विचार किया जा रहा था तो वहां एक महत्वपूर्ण चर्चा हुई। क्या भारत को राज्यों का संघ कहा जाए या इसे राज्यों का परिसंघ कहें? संविधान के मूल प्रारूप में इसे राज्यों का परिसंघ कहा गया था। बाद में प्रारूप में इस शब्द को बदल कर ‘संघ’ शब्द का प्रयोग किया गया।

संविधान के प्रमुख निर्माता डा. अम्बेडकर ने प्रारूप में इस परिवर्तन के लिए मूलाधार प्रस्तुत करते हुए कहा था:
”कुछ आलोचकों ने संविधान के प्रारूप के अनुच्छेद 1 में भारत को राज्यों का संघ कहने पर आपत्ति की है। कहा गया है कि सही शब्दावली ‘राज्यों का परिसंघ’ होनी चाहिए। यह ठीक है कि दक्षिण अफ्रीका, जो एकात्मक राज्य है, को संघ कहा जाता है, परंतु कनाडा जो परिसंघ है, उसे भी एक ‘संघ’ कहा जाता है।

इस प्रकार भारत को एक ‘संघ’ कहने से इसके संविधान के परिसंघीय स्वरूप के बावजूद ‘संघ’ शब्द के प्रयोग से कोई उल्लंघन नहीं होता है। परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि संघ शब्द का प्रयोग जानबूझकर किया है। मैं नहीं जानता कि कनाडा के संविधान में ‘संघ’ शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है, परंतु मैं आपको बता सकता हूं कि प्रारूप में इसका प्रयोग क्यों किया।

प्रारूप समिति यह स्पष्ट कर देना चाहती थी कि यद्यपि भारत परिसंघ होगा, परंतु परिसंघ राज्यों द्वारा परिसंघ में शामिल होने के किसी अनुबंधा का परिणाम नहीं है और क्योंकि परिसंघ किसी अनुबंधा का परिणाम नहीं है, इसलिए किसी राज्य को उससे अलग होने का अधिकार नहीं है। परिसंघ एक संघ है क्योंकि इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। यद्यपि देश और लोगों को प्रशासन की सुविधा के लिए राज्यों में बांटा जा सकता है, परंतु देश संपूर्ण एक भाग होता है, इसके लोग एक जन होते हैं जो एक ही स्रोत से प्राप्त एक सत्ता के अधीन रहते हैं।

अमरीकियों को यह स्थापित करने के लिए सिविल युध्द छेड़ना पड़ा था कि राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं है और उनका परिसंघ अमिट है। प्रारूप समिति ने सोचा कि बेहतर यही है कि आरंभ से ही इसे स्पष्ट कर दिया जाये, इसकी बजाय कि बाद में किसी तरह के अनुमान या विवाद का स्थान बना रहे।’

अनेक परिसंघीय संविधानों में, उदाहरण के लिए अमरीका के संविधान में, दोहरी नागरिकता को स्वीकार किया गया है-एक परिसंघीय और दूसरी राज्यों की नागरिकता। अत: इस प्रकार की भिन्नता ऐसी स्थितियों में अस्वाभाविक नहीं है, जहां कोई परिसंघ उसमें शामिल होने वाले राज्यों के बीच एक अनुबंधा के आधार पर बना हो। भारत में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एकदम अलग है। प्राचीन काल में उस समय भी जब देश विभिन्न साम्राज्यों में विभाजित था, तब भी देश की समान संस्कृति ने एकता और एकत्व के भाव को बनाए रखा था।

विविधता पर बल देने के खिलाफ अम्बेडकर की चेतावनी

‘विविधाता में एकता’ को भारतीय राष्ट्रवाद का प्रमाण-चिन्ह माना गया है। मेरे विचार में यह उक्ति हमारे जैसे किसी भी विशाल देश पर लागू हो सकती है।

संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डा. अम्बेडकर ने सावधान किया था कि यदि दोहरी राज्यव्यवस्था में सत्ता के विभाजन से उदभूत विविधाता एक निश्चित सीमा को पार कर जाती है तो उससे अव्यवस्था फैल सकती है। उन्होंने आगे कहा था:
‘संविधान के प्रारूप में ऐसे उपाय और प्रणाली रखने का प्रयास किया है जिससे भारत एक परिसंघ होगा और साथ ही देश की एकता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य सभी बुनियादी मामलों में एकरूपता रहेगी। संविधान के प्रारूप में इसके लिए तीन उपाय किए हैं:
1. एक ही न्यायपालिका;
2. नागरिक तथा दाण्डिक – सभी मूल विधियों में एकरूपता; और
3. महत्वपूर्ण पदों पर एक समान अखिल भारतीय सिविल सेवा की व्यवस्था।’

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व हम सभी ने एकता पर जोर देने का सजग प्रयास किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विविधाता पर बल दिया जा रहा हैं। कभी-कभी यह बल खतरनाक स्थिति तक पहुंच जाता है।

‘पृथक स्व-राज्य’ सिध्दांत खतरनाक

कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने केंद्र राज्यों के संबंधों पर रिपोर्ट देने तथा इन पर सिफारिश देने के लिए सरकारिया आयोग को एक ज्ञापन प्रस्तुत कर कहा था:
”……भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद ऐतिहासिक रूप से अधिकांश समय से चली आ रही देश की सीमाओं के विभाजन का आधार मात्र प्रशासनिक नहीं रह गया है। अब ये विभिन्न भाषायी सांस्कृतिक समूहों के समझ-बूझ कर बनाए गए ‘स्व-राज्य’ हैं। वस्तुत: इन समूहों की अलग राष्ट्रीयताएं बनती जा रही हैं।”

मैं इस पृथक ‘स्व-राज्य’ के सिध्दांत को बहुत खतरनाक सिध्दांत मानता हूं। इस ‘द्वि-राष्ट्र सिध्दांत’ के कारण भारत का विभाजन हुआ, इस बहुराष्ट्रीय सिध्दांत के कारण देश छोटे छोटे टुकड़ों में बंट सकता है।

यह प्रशंसनीय है कि सरकारिया आयोग ने इस सिध्दांत को साफ-साफ अस्वीकार कर दिया है और पुष्टि की है कि ‘संपूर्ण भारत देश के प्रत्येक नागरिक का ‘स्व-राज्य’ है; किंतु यह उक्ति जम्मू कश्मीर प्रदेश के मामले में दुखद रूप से अपवाद प्रतीत होती है।

अस्थायी अनुच्छेद 370 को स्थायी बनाने का प्रयास

संविधान सभा में सरकार की ओर से बोलते हुए, स्वयं श्री गोपालस्वामी आयंगर ने खेद प्रगट किया था कि जब सभी राजा-महाराजाओं की रियासतों का देश के साथ पूरी तरह विलय हो गया है, जम्मू और कश्मीर को एक अपवाद बनाया जा रहा है। परंतु उन्होंने आगे इस बात पर बल दिया कि यह व्यवस्था अस्थायी है तथा जल्दी ही जम्मू और कश्मीर का भी अन्य प्रदेशों की तरह संघ के साथ पूरी तरह से विलय हो जाएगा। त्रासदी यह है कि संविधान सभा में जो विधिवत् आश्वासन दिया गया था उसे राजनीतिक इष्टसिध्दि के कारणों से आज तोड़ा जा रहा है तथा अस्थायी प्रावधान को स्थायी बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस प्रसंग में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) द्वारा सरकारिया आयोग को दिये ज्ञापन का संदर्भ देना चाहूंगा, जिसका चिंतन भारतीय राष्ट्रवाद के मुकाबले द्वि-राष्ट्र सिध्दांत या शेख अब्दुल्ला के त्रि-राष्ट्र सिध्दांत की सीमा भी पार कर जाता है। वादियों का सदैव यह दृष्टिकोण रहा है कि भारत एक बहुराष्ट्रीय राज्य है।

संविधान निर्माताओं की नेकनीयती पर संदेह

संविधान में जो ‘एकात्मवादी प्रवृत्ति’ दिखाई पड़ती है, उसकी आलोचना करते हुए मार्क्‍सवादियों के ज्ञापन में भारत के संविधान निर्माताओं की नेकनीयती पर ही संदेह किया है। वे लिखते हैं:
”स्वतंत्रता के बाद जो संविधान बनाया गया उसमें विकास के लिए पूंजीवादी मार्ग की आवश्यकताओं को ध्‍यान में रखा गया, जिसके लिए एकीकृत एकल, सजातीय बाजार की आवश्यकता होती है। इसमें जमींदारों के साथ सम्बध्द बड़े-बड़े पूंजीपतियों की आवश्यकताओं की झलक मिलती है…”

उपर्युक्त विश्लेषण में यह कथन कि संविधान की एकात्मवादी प्रवृत्ति का दरअसल कारण यह है कि इसके निर्माताओं ने बड़े जमींदारों और पूंजीपतियों के हितों को धयान में रखा, अनर्गल और दुराग्रहपूर्ण है। यह विकृत दृष्टिकोण का एक विशिष्ट उदाहरण है जिससे पता चलता है कि यदि वैचारिक मताग्रह के काले चश्मे से देखने का हठ रखा जाए तो निश्चय ही इतिहास की प्रमुख घटनाएं भी विकृत रूप में सामने आएंगी।

संविधान सभा में हुई चर्चा को देखने से सहज ही पता चलता है कि इस प्रतिष्ठित निकाय ने पूरी तरह माना है कि भारतीय समाज बहु-वर्णी है और इसका एक रंग नहीं है, परंतु साथ ही वह इस विविधता में निहित सांस्कृतिक एकता के प्रति सक्रिय रूप से सजग थी। उसने देश के लिए जो राजनीतिक दस्तावेज बनाया उसमें इस एकता को रेखांकित किया है तथा एक राष्ट्र पर बल दिया है।

विकेंद्रीकरण के लिए सुदृढ़ आधार

मुझे यह महसूस होता है कि संविधान बनाते समय संविधान निर्माताओं को स्पष्ट रूप से परिकल्पना नहीं थी कि आगे आने वाले समय में राज्यों को अपने विकास संबंधी दायित्वों का निर्वाह करने के लिए कितना बोझ सहना पड़ेगा।

अब राज्यों को दिए गए संसाधन अत्यंत कम हैं और उनमें लचीलापन भी नहीं है। केंद्र को आवंटित संसाधन अपार हैं। इसका परिणाम यह है कि राज्यों को अपनी सामाजिक तथा औद्योगिक आधारभूत संरचना जो कि तेजी से सामाजिक आर्थिक विकास के लिए पूर्वपेक्षित है, तैयार करने की प्रारंभिक जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए केंद्र की आर्थिक सहायता पर लगातार निर्भर करना पड़ता है। मेरा विचार है कि यह मामला स्पष्ट है कि राज्यों को और अधिक वित्तीय सहायता दी जानी चाहिए।

प्रशासनिक तथा विधायी मामलों के बारे में भी सरकारिया आयोग ने ठीक ही कहा है कि बहुत समय से शक्तियों के केंद्रीयकरण की सामान्य प्रवृत्ति अधिकाधिक बढ़ती गई है।’ उसने आगे लिखा है: ‘इस बात में पर्याप्त सच्चाई है कि अनावश्यक केंद्रीयकरण से केंद्र का रक्तचाप बढ़ता है और उसकी परिधि में रक्त की कमी रहती है।’ इसका अनिवार्यत: परिणाम रूग्णता और अकुशलता में परिणत होता है।’ इससे भी खराब बात यह है कि हम महसूस करते हैं कि इस अतिकेंद्रीकरण ने राष्ट्रीय एकता को कमजोर बनाने में योगदान किया है। अत: राष्ट्रीय एकता के हित में हमारे लिए आवश्यक है कि राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों शक्तियों का और अधिक विकेंद्रीकरण किया जाये।

कश्मीर मामले में समझौतावादी प्रवृत्ति से राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ेगी।

पश्चिमी पर्यवेक्षक हमें बिना बात कश्मीर के बारे में परामर्श देते रहते हैं और स्वायत्ताता देने की समस्या से निपटने से लेकर यह राज्य पाकिस्तान अथवा भारत के साथ मिले या स्वतंत्र बना रहे, इस बारे में मतसंग्रह कराने के सुझाव देते रहते हैं। वे सामान्य रूप से इसे केवल भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की समस्या समझते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार उनके पहले प्रस्ताव को स्वीकार करने की इच्छुक है और वह ‘आजादी से कम’ कुछ भी रियायत देने की बात कर रही है।

किंतु हमें समझ लेना चाहिए कि हम इस समस्या का समाधान किस ढंग से करते हैं, इसका प्रभाव देश की एकता पर पड़ेगा। जैसा मैंने पहले कहा है कि राज्यों को और अधिक शक्तियां देने के औचित्य का आधार सुदृढ़ है। परंतु इसे केवल जम्मू और कश्मीर के मामले में ही लागू करना और वह भी इन यंत्रणापूर्ण पांच वर्षों में वहां फैली हिंसा तथा तोड़-फोड़ की गतिविधियों के आगे झुक कर, इसका अर्थ यह होगा कि हम विद्रोही गतिविधियों को शह दे रहे हैं। कश्मीर में समझौतावादी प्रवृत्ति अपनाने से पूरे देश पर अप्रत्यक्ष रूप से बुरा प्रभाव पड़ेगा और विधवंसकारी ताकतों को हर तरह से बढ़ावा मिलेगा।

डा. राजेन्द्र प्रसाद का विवेकपूर्ण परामर्श

मैं मानता हूं कि एकता के परिप्रेक्ष्य में भारत के संविधान की पर्याप्त अच्छे ढंग से रचना हुई है। फिर भी यदि स्वतंत्रता के लगभग छह दशकों के बाद आज देश में पृथकतावाद और विद्रोही गतिविधियों, आतंकवाद और हिंसा से एकता को गंभीर खतरा है तो इसमें दोष संविधान का नहीं, अपितु प्रमुख रूप से दोष इस बात में है कि जो संविधान को कार्यान्वित करने के लिए जिम्मेदार हैं वे गलत ढंग से इसे अमल में ला रहे हैं।

जब 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में औपचारिक रूप से संविधान स्वीकार किया गया था तो संविधान सभा के अधयक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद ने अपने समापन भाषण में कहा था:
”यदि निर्वाचित प्रतिनिधि योग्य होंगे तथा चरित्रवान और निष्ठावान होंगे तो वे दोषपूर्ण संविधान का भी सर्वश्रेष्ठ उपयोग कर सकेंगे। यदि उनमें अपनी ही कमी हुई तो संविधान किसी भी देश के लिए मददगार नहीं बन सकता। आखिरकार संविधान तो मशीन की तरह निर्जीव है, इसमें प्राण तो वह व्यक्ति डालता है जो यंत्र को नियंत्रित करता और चलाता है तथा आज भारत की सर्वाधिक आवश्यकता ईमानदार व्यक्तियों की है, जिनके सामने देश का हित सर्वोपरि हो।’

हम संविधान में ऐसे परिवर्तन और संशोधन करने के बार में सोच सकते हैं, जिनसे संविधान राष्ट्रीय एकता को और अधिक प्रभावकारी ढंग से कारगार बना सके, परंतु हमें सदैव डा. राजेन्द्र बाबू के अत्यंत बुध्दिमत्तापूर्ण परामर्श को धयान में रखना होगा।

(लेखक लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं)

(यह लेख डॉ. मुकर्जी स्मृति न्यास द्वारा प्रकाशित संकल्प विशेषांक से साभार यहां प्रस्तुत है)

4 Responses to “भारतीय संविधान और राष्ट्रीय एकता”

  1. manoj kumar chouksey

    जनवरी का माह सन , १९५० और अब २०१२ इन दोनों के बीच ६२ साल का वक्त जिसके कड़े अनुभव और उबलता सम्पूर्ण भारत ,वर्तमान संविधान कि सार्थकता पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा करता है , भारत में वर्तमान में राष्ट्र-मंडलीय {कामन-वेल्थ ,जिसकी सम्पूर्ण जनता ब्रेटन कि महारानी की नागरिक है } -की मान्यता प्राप्त व्यवस्था पर काबिज होने वाली भारत में व बहार याने सार्क देशो में भी राजनैतिक पार्टिया है उनेह सोचना पडेगा , और सोचना चाहिए हमें अब एक पूर्ण स्वाधीन परिसंघ जिसमे सार्क देशो कि जनता के लिए विधान न की {संविधान} के निर्माण की परिकल्पना की और बड़ना , बडाना चाहिए ||.

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  2. monesh kumar jain

    sangh aur prisangh ka anter prabhavpurn aur samvidhan par satik vishleshan.

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