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    धर्मांतरण : एक घिनौना षड्यंत्र

    जिहादी शक्ति यदि ताड़का हैं तो मसीही पूतना। जैसे पूतना ने माता के वेष में हमारे सांस्कृतिक नायक श्रीकृष्ण के प्राण लेने का षड्यंत्र रचा था वैसे ही तमाम चर्च, उसमें काम करने वाले पादरी और मदर्स-सिस्टर्स सेवा और ममता की आड़ में हमारे भोले-भाले, निर्धन-वंचित वनवासियों को लुभाकर उनका धर्मांतरण करते हैं। उन्होंने पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक धर्मांतरण का यह धंधा चला रखा है। पहले सौ वर्षों में उन्होंने अफ़्रीकन देशों को धर्मांतरित किया और बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी उन्होंने एशियाई देशों मुख्यतया भारत के अलग-अलग धर्मावलंबियों को ईसाई धर्म में धर्मांतरित करने का लक्ष्य तय कर रखा है। भारत में उन्हें ख़ूब सफलता भी मिली। वे जानते थे कि धर्म पर प्राण न्योछावर करने वाला मरना स्वीकार करेगा, पर अपने धर्म, अपनी परंपरा और संस्कृति को नहीं छोड़ेगा। इसलिए वे शिक्षा, सेवा, चिकित्सा की आड़ में रूप बदलकर आए और उन्हें लुभाया जो साधनहीन थे, वंचित थे, अभावग्रस्त थे। और फिर धीरे-धीरे उनके मन में विभाजन के विष-बीज बोए। उनका यह कार्य आज भी निर्बाध ज़ारी है। मोदी सरकार ने जिन चार हजार से भी अधिक एनजीओज को प्रतिबंधित किया है, उनमें से कई धर्मांतरण के इस धंधे में बराबर के हिस्सेदार थे। यों ही नहीं मोदी सरकार का नाम सुनते ही उनके पेट में मरोड़ने आने लगती हैं, उनका दिमाग़ बजबजाने लगता है, ज़ुबान कड़वी हो जाती है। और जिन लोगों को लगता है कि मोदी सरकार ने क्या किया उन्हें इन मसीही पादरियों से एक बार मिलना चाहिए। 
    बड़ी आयोजना और धूर्त्तता से चर्च और पश्चिम प्रेरित एनजीओज द्वारा भोले-भाले, साधनरहित गरीबों-वंचितों-वनवासियों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर, शिक्षा-चिकित्सा की आड़ लेकर हिंदू धर्म से ईसाई संप्रदायों में मतांतरित किया जाता है। इस मतांतरण के लिए ईसाई मान्यता वाले देशों एवं वैश्विक स्तर की मसीही संस्थाओं द्वारा पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। नव मतांतरित व्यक्तियों-समूहों के समक्ष अपने नए संप्रदाय यानी ईसाई धर्म के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने का अतिरिक्त दबाव बना रहता है। हिंदू मतों, हिंदू संस्थाओं या साधु-संतों पर किया गया हमला उन्हें वहाँ न केवल स्थापित करता है, अपितु नायक जैसी हैसियत प्रदान करता है। इसलिए ये नव मतांतरित लोग अधिक कट्टर एवं धर्मांध होते हैं। इन मासूम और भोले-भाले वंचितों-वनवासियों-गरीबों के बीच मतांतरण को बढ़ावा देने वाली शक्तियाँ इस प्रकार के साहित्य वितरित करती हैं, इस प्रकार के विमर्श चलाती हैं कि धीरे-धीरे उनमें अपने ही पुरखे, अपनी ही परंपराओं, अपने ही जीवन-मूल्यों, अपने ही विश्वासों के प्रति घृणा की भावना परिपुष्ट होती चली जाती हैं। उन्हें पारंपरिक प्रतीकों, पारंपरिक पहचानों, यहाँ तक कि अपने अस्तित्व तक से घृणा हो जाती है। उन्हें यह यक़ीन दिलाया जाता है कि उनकी वर्तमान दुरावस्था और उनके जीवन की सभी समस्याओं के लिए उनकी आस्था, उनकी परंपरा, उनकी पूजा-पद्धत्ति, उनका पुराना धर्म, उनके भगवान जिम्मेदार हैं। और उन सबका समूल नाश ही उनके अभ्युत्थान का एकमात्र उपाय है। उन्हें उनकी दुरावस्थाओं से उनका नया ईश्वर, उनकी नई पूजा पद्धत्ति ही उबार सकती है। ग़लत ईश्वर जिसकी वे अब तक पूजा करते आए थे का विरोध उनका नैतिक-धार्मिक दायित्व है। यह उन्हें उनके नए ईश्वर का कृपा-पात्र बनाएगा। कभी सेवा के माध्यम से, कभी शिक्षा के माध्यम से, कभी साहित्य के माध्यम से, कभी आर्य-अनार्य के कल्पित ऐतिहासिक सिद्धांतों के माध्यम से नव मतांतरितों के रक्त-मज्जा तक में इतना विष उतार दिया जाता है कि सनातन परंपराओं के प्रतीक और पहचान भगवा तक से उन्हें आत्यंतिक घृणा हो जाती है। यह घृणा कई बार इस सीमा तक बढ़ जाती है कि वे हिंदू साधु-संतों और उनके सहयोगियों पर प्राणघातक हमले कर बैठते हैं।
    दुर्भाग्य है कि आज कुछ मैकॉले प्रणीत शिक्षा के सह-उत्पाद, औपनिवेशिक मानसिकता के गुलाम काले अंग्रेज और पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण का पर्याय मान बैठे कुछ अँग्रेजीदा लोगों की देखा-देखी कुछ भोले-भाले लोग भी क्रिसमस पर बधाई देने लगे हैं, क्रिसमस ट्री लगाने लगे हैं और सपने में संता के आने का स्वप्न सँजोने लगे हैं। आश्चर्य है कि जिन तथाकथित आधुनिक-आधुनिकओं को शिवलिंग पर दूध-जल चढ़ाना जल और दूध की बर्बादी लगती है, पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना अंधविश्वास लगता है, भगवान के अवतरण पर घर-द्वारा को सजाना पिछड़ापन लगता है, उन्हें सांता का चॉकलेट और उपहार लेकर बच्चों के सपनों में आना बड़ा वैज्ञानिक और तार्किक लगता है। बाज़ार आज त्योहारों पर भी हावी हैं। बाज़ार की सहायता से क्रिसमस और न्यू ईयर को भारत में भी एक महोत्सव की तरह प्रस्तुत-प्रचारित किया जाता है। जबकि भारत की संस्कृति से इन त्योहारों का कोई सरोकार नहीं रहा है।
    प्रणय कुमार

    प्रणय कुमार
    प्रणय कुमार
    शिक्षक, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। जीविकोपार्जन हेतु अध्यापन। आईआईटी, कानपुर में 'शिक्षा सोपान' नामक सामाजिक संस्था की संकल्पना एवं स्थापना। हाशिए पर जी रहे वंचित समाज के लिए शिक्षा, संस्कार एवं स्वावलंबन के प्रकल्प का संचालन। विभिन्न विश्वविद्यालयों, संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में राष्ट्रीय, सनातन एवं समसामयिक विषयों पर अधिकारी वक्ता के रूप में उद्बोधन। जन-सरोकारों से जुड़े सामाजिक-साहित्यिक विमर्श में सक्रिय सहभाग।

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