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    Homeराजनीति'कोरोना' ने बिहार चुनाव को बनाया 'खर्चीला'

    ‘कोरोना’ ने बिहार चुनाव को बनाया ‘खर्चीला’

                        प्रभुनाथ शुक्ल 

    बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है जहाँ कोरोना संक्रमण के दौर में पहला चुनाव होने जा रहा है। चुनाव आयोग के लिए यह बड़ी चुनौती और अनुभव की बात है। वहीं चुनाव से जुड़ने वाले राजनीतिक दल, मतदाता और राजनेताओं के लिए भी यह चुनाव एक नया प्रयोग होगा। अब आयोग इन चुनौतियों से कैसे निपटता यह देखने की बात होगी। लेकिन  चुनावी खर्च के लिहाज से यह बेहद महँगा चुनाव साबित होगा। ‘कोविड- 19’ की वजह से आयोग ने विशेष तरह की गाइडलाइन जारी की है। उसके अनुपालन पर काफी खर्च भी आएगा। जिसका सीधा प्रभाव आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। 

    बिहार चुनाव की वजह से अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त भार पड़ेगा। जिसकी वसूली आम आदमी से टैक्स के रूप में की जाएगी। कोविड संक्रमण और बढ़ते खर्च को देखते हुए आयोग को ‘ऑनलाइन वोटिंग’ सरीखी व्यवस्था पर अमल करना चाहिए था। इस प्रयोग को अमल में लाकर जहाँ चुनावी खर्च को कम किया जा सकता था वहीं ‘कोरोना संक्रमण’ से भी बचा जा सकता था। क्योंकि देश भर में कोविड संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। इस हालात में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बहाल करने के साथ- साथ आम की सुरक्षा का भी ख़याल लाज़मी होता।

    ‘कोविड’ संक्रमण को देखते हुए आयोग ने आम आदमी और उसकी सुरक्षा का फ़िलहाल विशेष ख़याल रखा है। आयोग ने वोटिंग का समय बढ़ा दिया है। अब शाम छह बजे तक वोट डाले जाएंगे। मतदान केंद्र पर सभी कर्मचारी कीट में होंगे। वोटिंग के लिए ‘पोलिंग बूथ’ पर आने वाले मतदाताओं की ‘थर्मल स्क्रीनिंग’ यानी उनके शरीर का तापमान मापा जाएगा। ‘वोटिंग मशीन’ पर अपने मन पसंद उम्मीदवार पर वोट करने से पहले ‘दस्ताना’ पहनना अनिवार्य होगा। अंतिम एक घंटे ‘कोविड संक्रमित’ मरीजों के लिए होंगे जो अपना वोट इत्मीनान से डाल सकते हैं। इसके अलावा वह अपने मताधिकार का प्रयोग ‘पोस्टल बैलेट’ से भी कर सकते हैं। लेकिन यह सुविधा सिर्फ़ उन्हीं के लिए होगी जो आयोग के दिशा- निर्देश की श्रेणी में आएंगे। 

    मतदान स्थल पर सभी को ‘सोशल डिस्टेसिंग’ का पालन करना ज़रूरी होगा। ‘पोलिंगबूथ’ पर हाथ धोने के लिए सेनेटाइजर, साबुन और पानी की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध होगी। आयोग ने नामांकन में भी बदलाव किया है। नामांकन स्थलों पर भीड़ और जुलूस से बचने के लिए  उम्मीदवार अपना नामांकन परम्परागत तरीके से करने के बजाय ‘ऑनलाइन’ भी कर सकता है। चुनावी रैली में अधिक भीड़ जमा करना भी गुनाह होगा। सिर्फ़ पांच गाड़ियों की अनुमति होगी। जनसम्पर्क में पांच आदमियों से अधिक लोग नहीँ होंगे। हर बूथ पर अधिकतम एक हजार वोटर ही होंगे। बूथ को 72 घंटे पहले से सैनिटाइज किया जाएगा। इस तरह के एतिहाद बरतने के निर्देश दिए गए हैं। अब अनुपालन कितना होगा यह तो वक्त बताएगा। 

    बिहार चुनाव राजनीति दलों की अग्नि परीक्षा के साथ आयोग की भी परीक्षा होगी। ‘कोविड- 19’ संक्रमण की वजह से चुनाव पर खर्च होने वाली राशि में कई गुना इजाफा होगा। क्योंकि ‘कोरोना संक्रमण’ के लिए जो निर्देश दिए गए हैं उसके अनुपालन में परंपरागत चुनावी खर्च स्वभाविक रूप से बढ़ जाएगा। इस बार वोटरों और मतदान कर्मियों के लिए ‘कोरोना किट्स’ दस्ताने, सैनिटाइज, साबुन, थर्मल मीटर समेत कई अतिरिक्त वस्तुओं और सुविधाओं के साथ ट्रांसपोर्ट पर अधिक खर्च करना पड़ेगा। चुनाव वैसे भी महँगे होते जा रहे हैं, संक्रमण की वजह से यह और महँगा हो जाएगा। जिसका सबसे अधिक प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर पड़ेगा। जबकि राजनीति इसे लेकर बेफ्रिक है। 

    कोरोना की वजह से देश आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। लगातार जीडीपी गिर रहीं है। ‘वैश्विक मंदी’ का दौर है। उस हालत में आयोग के लिए सबसे बेहतर विकल्प ‘ऑनलाइन वोटिंग’ की सुविधा होती। आयोग को ‘बिहार चुनाव’ में विकल्प के तौर पर इसका प्रयोग करना चाहिए था। चुनाव आयोग ने  लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा बढ़ा दिया था। पूर्व की व्यवस्था में एक उम्मीदवार 40 लाख रुपए तक खर्च कर सकता था लेकिन आयोग ने इसे बढ़ा कर  70 लाख और छोटे राज्यों में 22 से बढ़ा 54 लाख कर दिया है। जबकि विधान सभा में बड़े राज्यों में अधिकतम  28 लाख रुपये कर दिया है। हालांकि कोई भी उम्मीदवार कुल मतों का छठा हिस्सा नहीँ प्राप्त करता है तो उसकी जमानत राशि जब्त हो जाएगी। 

    चुनावी खर्च लगातार बढ़ रहा है। जबकि यह पैसा आम आदमी की जेब से जाता है। अगर इसे कम कर दिया जाय तो अर्थव्यवस्था को नई उड़ान मिलेगी, लेकिन यह मसला हमारी अंधी- बहरी राजनीति का कभी हिस्सा नहीँ बन पाया। एक आंकड़े के मुताबिक 1952 में हर एक वोटर पर जहाँ सरकार को 62 पैसे का खर्च करना पड़ता था वहीं 2004 में यह 17 रुपये और 2009 में 12 रुपये प्रति वोटर पर जा पहुँचा। 2009 के लोक सभा चुनावों में यह खर्च 1,483 करोड़ था जो कि 2014 में तीन गुना बढ़कर 3,870 करोड़ रुपये हो गया। जबकि 2019 के आम चुनाव में यह राशि सारे आंकड़े ध्वस्त करते हुए 80 अरब यानी 8 हजार करोड़ रुपये पहुँच गया। आयोग के निर्धारित खर्च से कई गुना चुनावों में अधिक खर्च होता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक एक सीट पर एक प्रत्याशी न्यूनतम 15 करोड़ रुपये खर्च करता है। लेकिन संसद और राजनीति इस पर कभी गम्भीर नहीँ दिखी। 

    बिहार विधानसभा के 2015 में हुए चुनाव में सरकार के खजाने पर लगभग 300 करोड़ रुपए का भार आया था। यह सिर्फ़ सरकारी खर्च था इसमें राजनीतिक दलों का खर्च नहीँ शामिल नहीँ है। यह 2010 के विधानसभा चुनाव से डेढ़ गुना अधिक था। अब सोचिए चुनावों पर हम इतनी राशि क्यों खर्च कर रहे हैं। जब देश ‘कोरोना संक्रमण’ की वजह से आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। जीडीपी की रेटिंग और रैंकिंग दोनों गिर रहीं है। फ़िर चुनावी खर्च कम करने के लिए हम विचार क्यों नहीँ करते। जब हम ‘ऑनलाइन’ नामांकन कर सकते हैं फ़िर ‘ऑनलाइन वोटिंग’ क्यों नहीँ ?  स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराना आयोग का नैतिक दायित्व है। लेकिन भारी भरकम के बाजाय संतुलित और तकनीकी सुविधायुक्त चुनाव कराना भी आयोग की नैतिक जिम्मेदारी है। आयोग को ‘ऑनलाइन वोटिंग’ की शुरुवात बिहार से करनी चाहिए। क्योंकि यह कोरोना संक्रमण से बचाव का सबसे अच्छा तरीका साबित हो सकता है। आयोग को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। 

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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