झाड़फूंक से नहीं, जागरूकता से हारेगा कोरोना

सौम्या ज्योत्सना

मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार

कोरोना के कहर से पूरा देश लगातार जूझ रहा है। भले ही आंकड़ों के कम होने पर देश के कई राज्य अनलॉक की प्रक्रिया अपना रहे हैं लेकिन स्थिति के अभी भी सामान्य होने की उम्मीद दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है। पहले डेल्टा और अब डेल्टा प्लस वैरियंट ने सरकार से लेकर वैज्ञानिकों तक की चिंता बढ़ा दी है। लगभग एक साल से लोग कोरोना से ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। कुछ महीने पहले ही देश में कोरोना का भयंकर प्रकोप लोगों के बीच इस कदर टूटा है कि वह अपनों को खोने के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक आखिरी विदाई भी नहीं दे सके।

देश में हर दिन आंकड़ों की रिपोर्ट आती हैं, लेकिन इसका दर्द केवल वही इंसान समझ सकता है, जिसके अपने भी इन आंकड़ों में शामिल हैं। हालांकि केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकारें इस महामारी के कारण बिगड़े हालातों से लड़ने में अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे थे, लेकिन हमारा कमज़ोर स्वास्थ्य ढांचा इससे लड़ने में नाकाफी साबित हुआ, जिससे मौत का आंकड़ा तेज़ी से बढ़ा। इस दौरान कई राज्यों के उच्च न्यायलयों और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी सराहनीय थी, तो कई संस्थाओं और व्यक्तिगत रूप से लोगों ने भी आगे बढ़ कर इंसानियत को बचाने में अपना अतुलनीय योगदान दिया था।

कोरोना की दूसरी लहर ने शहरों के साथ साथ देश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपना रौद्र रूप दिखाया है। जिसके कारण देश में मौत का आंकड़ा भी तेज़ी से बढ़ा है। पहली लहर की तुलना में इस बार ग्रामीण क्षेत्र भी कोरोना की चपेट में आए। एक आंकड़े के मुताबिक देश के 13 राज्यों के ग्रामीण इलाकों में कोरोना वायरस फैला था। इनमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश प्रमुख है। संक्रमण के नये मामलों में यहां के ग्रामीण इलाकों ने तो शहरी क्षेत्रों को पीछे छोड़ दिया है। बढ़ते आंकड़े इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि तत्काल किसी ऐसे उपायों को अपनाने की ज़रूरत है, जिससे आने वाली संकट पर समय रहते काबू पाया जा सके। कोरोना की दूसरी लहर के थमने से पहले ही उसकी तीसरी लहर की चर्चा अपने शबाब पर है, जिसमें बच्चों में संक्रमण का खतरा बताया जा रहा है। हालांकि अभी भी इस मुद्दे पर विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद ऐसी हालत में जरूरत है कि कोरोना की दूसरी लहर की आपदा से सीख लेकर आने वाले संकट की तैयारी की जाए।

कोरोना की दूसरी लहर ने शहरों के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है। गांवों में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की कमी ने इस संकट को और भी गहरा कर दिया था। इसके अलावा जागरूकता की कमी ने भी महामारी को अपना पैर पसारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पूरे देश में लगभग साढ़े 6 लाख गांव हैं, जिनमें 90 करोड़ की आबादी रहती है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया था। इन आंकड़ों में वैसे लोग शामिल थे, जिन्होंने अपना टेस्ट करवाया था। हालांकि अब भी ऐसे कितने लोग हैं, जिनका टेस्ट तक नहीं हुआ। वहीं अधिकांश लोगों को कोरोना के लिए करवाए जाने वाले टेस्ट्स की जानकारी तक नहीं थी। गांवों में प्रशिक्षित लैब कर्मी, डॉक्टर, सुविधाओं से लैस अस्पताल, ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी को अनदेखा किये जाने के कारण ही समस्या को इस स्तर तक पहुंचाया है। इसके अलावा जागरूकता की कमी के कारण भी लोग कोरोना के लक्षणों से अंजान थे, जिस कारण सर्दी-खांसी के लिए मामूली कफ सिरप का सहारा ले रहे हैं। वहीं ग्रामीणों के लिए उनके दवाई दुकानदार ही डॉक्टर हैं, जिनकी निगरानी में रहकर वह अपना आधा अधूरा इलाज करवा रहे थे।

लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों को जिस चीज़ ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया, वह था उनका अंधविश्वास। शिक्षा की कमी के कारण लोग इस महामारी को चिकित्सीय दृष्टिकोण की जगह अंधविश्वास की नज़रों से देखने लगे। इसका इलाज कराने की जगह इसे दैवीय प्रकोप समझने लगे और टीका की जगह इसे धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से दूर करने के उपाय ढूंढने लगे। इस बीमारी के खतरे से लापरवाह ग्रामीण सामाजिक दूरियों को अपनाने की जगह शादी ब्याह और अन्य गतिविधियों में मशगूल रहे। सरकार और प्रशासन ने भी धरातल पर सामाजिक दूरियों का पालन करवाने की जगह विज्ञापनों के माध्यम से संदेश पहुंचा कर अपनी इतिश्री पूरी कर ली। अंधविश्वास और लापरवाही ने कोरोना से बचने के सभी सामाजिक नियमों को ध्वस्त कर दिया, जिसके गंभीर परिणाम ग्रामीण क्षेत्रों को भुगतनी पड़ी।

एक खबर के अनुसार राजस्थान में नागौर के मकराना, मंगलाना, बोरावड़ सहित इनसे जुड़े गांवों में महिलाएं बच्चों को कोरोना की तीसरी लहर से बचाने के लिए जादू-टोना का इस्तेमाल कर रहीं हैं। यहां 18 साल से कम उम्र के बच्चों की लावण झाड़ने अर्थात नजर उतारने का काम किया जा रहा है। कोरोना वायरस की नजर बच्चों पर ना पड़े इसलिए महिलाएं मन्नत मांगते हुए तेल भरी बाती जलाकर लावण, नज़र उतारती हैं। यह कार्यक्रम लगभग 15 मिनट तक चलता है, जिसमें बच्चों समेत घर के बड़े-बुजुर्ग बहुत मन लगाकर बैठते हैं। अचंभित करने वाली बात यह भी है कि कोरोना के डर ने कई परंपराओं को दोबारा जिंदा करने का काम किया है, जिसमें लावण झाड़ना भी एक है।

हालांकि बच्चों को इस आपदा से बचाने के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयासरत है। वह सभी राज्य सरकारों के साथ मिल कर इस दिशा में समन्वय बनाने का काम भी कर रही है। बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए जहां ऑनलाइन कक्षाएं चलाई जा रही हैं, वहीं दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं को रद्द कर दिया गया। इसके अतिरिक्त दिल्ली से लेकर पटना और देश के कई भागों में बच्चों की वैक्सीन के लिए क्लिनिकल ट्रायल का काम भी शुरू हो चुका है। उम्मीद की जा रही है कि किसी अन्य आपदा के आने से पहले पहले बच्चों के लिए भी टीकाकरण का काम शुरू हो जाएगा। ताकि बुज़ुर्गों और युवाओं के साथ साथ शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक के नौनिहालों की ज़िंदगी बचाई जा सके। लेकिन इससे पहले ज़रूरी है लोगों को जागरूक करना। विशेषकर देश के ग्रामीण क्षेत्रों को कोरोना के प्रति वैज्ञानिक सोच के साथ तैयार करना, उन्हें वैक्सीन से होने वाले फायदों को बताना, वैक्सीन को लेकर उनके संशय को दूर करना, इसे लेकर फैलाई जा रही किसी भी अफवाहों के प्रति उन्हें सचेत करना ताकि वह अंधविश्वास से खुद को और अपने बच्चों की ज़िंदगी को बचा सकें।

आपदाओं या विपदा के साथ एक सकारात्मक बात यह होती है कि वह सुधार की प्रक्रिया को तेज करने का काम करती है। देश में जब बच्चों के लिए दूध की किल्लत थी, तब श्वेत क्रांति द्वारा नौनिहालों की भूख को शांत किया गया था। जब देश में अन्न नहीं था, तब हरित क्रांति द्वारा लोगों को भरपूर अनाज मुहैया करवाई गई थी। वहीं आर्थिक विपन्नता होने पर आर्थिक सुधार लागू किया गया था। इन सब बातों से सीख लेकर अब स्वास्थ्य क्रांति की ओर कदम बढ़ाने का समय है, इसके लिए शहर से लेकर ग्रामीण स्तर तक लोगों में अलख जगाने की ज़रूरत है ताकि वह झाड़फूंक की जगह वैज्ञानिक रूप से कोरोना को हरा सकें।

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