कॉरपोरेट्स को बैंकिंग लाइसेंस देना कितना जायज

सतीश सिंह

कॉरपोरेट्स घरानों को बैंकिग लाइसेंस देने का रास्ता अब साफ हो गया है। इनको लाइसेंस देने के लिए जरुरी कवायद तकरीबन छह माह किया जा रहा था। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में घोषणा कि थी कि चालू वित्तीय वर्ष यानि 2011-12 के अंत तक बैंकिंग लाइसेंस देने के नियमों की घोषणा कर दी जाएगी। गौरतलब है कि बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने के लिए कारोबारी घराने लाबीइंग के जरिए सरकार को अपने पक्ष में करने की कोशिश कई सालों से कर रहे थे।

इस परिप्रेक्ष्य में 29 अगस्त, 2011 को भारतीय रिजर्व बैंक ने नये बैंकिंग लाइसेंस से संबंधित मसौदे के दिशा-निर्देश को जारी किया। नये नियमों के अनुसार वर्तमान वित्तीय कंपनियों को बैंक में तब्दील किया जा सकता है। स्वतंत्र रुप से नये बैंकों को भी खोला जा सकता है। पर इसके लिए प्रमोटर का ट्रेक रिकार्ड बेदाग होना चाहिए। साथ ही उसे 10 सालों तक वित्तीय क्षेत्र में काम करने का अनुभव भी होना चाहिए। ताकि वह बैंक को सुचारु तरह से चला सके।

इस बाबत सबसे महत्वपूर्ण शर्त्त प्रस्तावित बैंक के पास 500 करोड़ रुपयों का पेड-अप कैपिटल का होना है। उसे अपने नेटवर्क की 25 फीसदी शाखाओं को उन ग्रामीण या पिछड़े इलाकों में खोलना पड़ेगा जहाँ बैंकिंग की सुविधा पहले से न हो।

ध्यान रहे कि बैंक खोलने के इच्छुक कॉरपोरेट्स को बैंक खोलने के लिए कर्ज लेने की मनाही है। साथ ही विदेशी निवेशक 49 फीसदी से ज्यादा इन नये बैंकों में निवेश भी नहीं कर सकेंगे।

प्रमोटर कंपनियों को 10 साल के अंदर अपने हिस्से को कम करके 20 फीसदी करना होगा। इसी तारतम्य में रिजर्व बैंक ने कंपनियों के द्वारा नये बैंकों के कैपिटल में एक निष्चित मात्रा में षेयर रखने की सीमा तय की है। ताकि किसी एक कारोबारी घराने की बपौती बैंक पर कायम न हो सके और एक समूह के माध्यम से बैंक का संचालन किया जा सके।

इन नये बैंकों को दो साल के अंदर षेयर बाजार में लिस्टिंग करवाना होगा। हां, इसका मालिकाना हक एक अलग होल्डिंग कंपनी के पास हो सकता है।

नये बैंकों के लाइसेंस देने के आलोक में ही भारतीय रिजर्व बैंक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए कर्ज वितरण, जोखिम के लिए पर्याप्त प्रोविजनिंग तथा पूंजी से जुड़े नये नियम बनाने के लिए भी मन बना रहा है। इस सिलसिले में एनबीएफसी के लिए पूंजी पर्याप्तता अनुपात को बढ़ाकर 12 फीसदी तक किया जा सकता है। इसके पीछे भारतीय रिजर्व बैंक की मंशा एनबीएफसी को कड़े माप-दंडों को पूरा करने के मामले में बैंकों के समकक्ष लाना है। फिलवक्त कॉरपोरेट्स एनबीएफसी के लिए लागू आसान शर्तों की आड़ में जमकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं। रिजर्व बैंक के इस कदम से एनबीएफसी के कार्यकलापों की गुणवत्ता में इजाफा होने की संभावना है। साथ ही इस कदम से एनपीए से संबंधित जोखिम में भी कमी आएगी।

ज्ञातव्य है कि फिलहाल नये बैंकिंग लाइसेंस पाने की दौर में टाटा, एवी बिड़ला समूह, बजाज, एलएंडटी, एलआईसी हाऊसिंग, एमएंडएम, श्रीराम समूह, रिलायंस, एडीएजी, पीएफसी, आईएफसीआई, इंडिया इंक, रेलिगेयर जैसी नामचीन कंपनियां हैं।

हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने नये बैंकों को खोलने के लिए आवष्यक दिशा-निर्देषों को जारी कर दिया है। फिर भी यह निष्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि सभी शर्तों को पूरा करने के बाद भी इच्छुक कंपनियों को आसानी से लाइसेंस मिल जाएगा। क्योंकि इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक लाइसेंस देने के लिए केस टू केस बेसिस के नियम को अमलीजामा पहना सकता है। जाहिर है भारतीय रिजर्व बैंक का उद्देष्य ऐसे बैंकों को लाइसेंस देना है जिसका ध्यान लाभ अर्जित करने के साथ-साथ सामाजिक कल्याण की तरफ भी हो।

दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक चाहता है कि वह नये बैंक खोलने का लाइसेंस कारोबारी घरानों को देने के बाद भी उनपर अपना प्रभावी नियंत्रण रख सके।

अस्तु इसके लिए उसने ऐसा प्रावधान किया है, जिसके तहत उसकी स्थिति प्रस्तावित नये बैंक के बोर्ड से ऊपर होगी। इतना ही नहीं इस संदर्भ में 5 फीसदी से अधिक निवेश करने के लिए इच्छा रखने वाले कारोबारियों पर भी रिजर्व बैंक अपनी निगाह रखेगा। निवेशक के अयोग्य होने की दशा में रिजर्व बैंक ऐसे निवेश पर रोक भी लगा सकेगा।

भारतीय रिजर्व बैंक यह मान रहा है कि अपने नियमों व शर्तों के द्वारा वह नये निजी बैंकों पर काबू रख सकेगा। उसका यह भी मानना है कि नये बैंकों की गतिविधि के संदेहास्पद होने की अवस्था में वह नये बैंक के पूरे बोर्ड को आसानी से भंग कर सकेगा।

यहाँ पर यह साफ करना जरुरी है कि भारतीय रिजर्व बैंक की सोच और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। वित्तीय वर्ष 2003-04 में ‘कोटक महिन्द्रा बैंक’ अस्तित्व में आया था, जोकि एक निजी बैंक है। इसके प्रमोटर श्री उदय कोटक हैं। निजी क्षेत्र का दूसरा महत्वपूर्ण बैंक ‘यस बैंक’ है। दोनों बैंक लगातार निवल लाभ अर्जित कर रहे हैं। लेकिन उनका समाज के प्रति दायित्व नगण्य है। दूसरे निजी व विदेशी बैंकों की भी ऐसी ही दशा व दिशा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति न्यून है या फिर इनका कामकाज सामाजिक दायित्वों से विमुख है। ऐसे में यह मानना कि नये बैंक अपनी 25 फीसदी शाखा ग्रामीण या पिछड़े इलाकों में खोलेंगे या अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा करेंगे, पूर्ण रुप से संदेहास्पद है। सरकारी योजनाओं को लागू करने में निजी व विदेशी बैंकों का पिछड़ना इसी सच्चाई की ओर इशारा करता है।

निजी बैंकों के द्वारा ज्यादा ब्याज दर प्रभारित करना या अधिक प्रोसेसिंग फीस वसूलना आज आम बात है। निजी बैंक एनपीए की वसूली के लिए गुंडों व मवालियों की मदद लेने से भी परहेज नहीं करते हैं।

गाँवों में जिस तरीके से निजी फाइनेंस कंपनियों के द्वारा ट्रेक्टर फाइनेंस करने के दरम्यान भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों की अनदेखी की जा रही है, वह रिजर्व बैंक के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

निजी फाइनेंस कंपनियां किसानों के द्वारा डिफॉल्ट करने की स्थिति में उनको असामाजिक तत्वों के द्वारा या तो पिटवाते हैं या उनका ट्रेक्टर उठवा लेते हैं। इस तरह के मामले में पुलिस भी कुछ नहीं करती है। बस किसान चुपचाप फाइनेंस कंपनियों के जुल्मों-सितम को सहते रहते हैं।

इसके बरक्स में दूसरी उलटबांसी यह हैं कि कॉरपोरेट्स की प्रतिबद्धता कभी आम लोगों के प्रति नहीं रही है। उनका सरोकार हमेशा लाभ कमाना रहा है। विकास के नाम पर सरकार भी उनको पूरा सहयोग देती है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय समग्रता की संकल्पना को पूरा करने या पिछड़े क्षेत्रों तक बैंकिंग सुविधा को पहुँचाने के लक्ष्य का पूरा होना असंभव है।

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