लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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राजीव गुप्ता

वी.डी.सी. , प्रधानी , स्कूल , ईंट का भट्टा , और राशन – तेल का कोटा भी उन्ही के पास है ! उनकी कई गाड़ियाँ चलती है ! कंधें पर दू-नाली लाइसेंसी बन्दूक लटकाए उनके आदमी हाट – बाजार के दुकानदारों से जबरन चुंगी वसूलने के लिए आते है ! अपनी ताक़त का एहसास कराने के लिए बाजार में घुसने से पहले वो हवाई फायर भी करते है ! सब कुछ वो ब्लैक कर देते है ! घर में बेटी की शादी हो तो भी हमें हर जरूरी सामान ब्लैक में ही खरीदना पड़ता है ! साहब हमें आजतक कभी न तो राशन कार्ड के मुताबिक न तो पूरा राशन मिला और न ही कभी मिटटी का तेल ! वो कुछ भी कर सकते है ! हम गरीब – दुखिया की कौन सुनेगा ? पुलिस वाले भी उन्हें सलाम ठोंकते है ! थानेदार और दरोगा साहब तो हर महीने उनके घर पर मेहमान की तरह आते रहते है ! साहब उनके खिलाफ अदालत में गवाही देने की बात तो दूर की है साहब,पूरे गाँव में किसी की क्या मजाल जो उनके खिलाफ कुछ बोल दे ? अगर किसी ने हिम्मत जुटाई तो उसका या तो राम – नाम सत्य हो गया या तो गवाही देने वाला ही जेल चला गया ! साहब वो पैसे वाले है ! जज साहब को भी वो फीस देकर उल्टा उसे ही फसवा कर जेल भिजवा देते है ! अन्ना साहब ने यह कसम खायी है कि वो कचहरी के भ्रष्ट जजों के खिलाफ करवाई करवाने के लिए कानून बनवायेगे ! इसलिए उनके समर्थन में मै अपनी तीन बेटियों और दो बेटों को घर पर अकेले छोड़कर अपनी पत्नी के साथ यहाँ रामलीला मैदान में अपनी खेती को भगवान् – भरोसे छोड़कर आया हूँ , बिना किसी बिछौने के भीगी हुई घास पर लेटे हुए , रात्रि लगभग 2 बजे , भिंड जिले के खरका गाँव के मिजाजी लाल जी ने अपनी व्यथा बताते हुए रामलीला मैदान में आने का करण बताया ! आप सब शहर के लोग पढ़े-लिखे हैं, और यहाँ शहर में रहते है आप सब भी कुछ दिन की छुट्टी लेकर हमारे साथ तपस्या कीजिये क्या पता आप सब की सरकार जल्दी सुन ले ! साहब आप लोगों की तपस्या से हम बेचारे गरीब-दुखिया को गाँव में सताया नहीं जायेगा, हमें भी पूरा राशन मिलेगा , हमारे बच्चे भूखे नहीं सोयेगे कहते हुए उनकी धर्म पत्नी ने हमसे रामलीला मैदान में आने का आग्रह किया !

साहब ! हमें पूरी मजदूरी मिलेगी , ठेकेदार और प्रधान को हिस्सा नहीं देना पड़ेगा , पीला / लाल राशन – कार्ड बनवाने के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा ! एक बात और बताऊ साहब जी बड़े अस्पताल में ( सरकारी अस्पताल ) डाक्टर को भर्ती करने के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा ! साहब हमारी एक ही बहु थी , गर्भवती थी , भर्ती कराने के लिए बड़े अस्पताल ले गया , डाक्टर साहब ने भर्ती करने के लिए मोटी रकम मांगी , मैं नहीं दे पाया तो डाक्टर साहब ने मेरी बहु को भर्ती नहीं किया ! अस्पताल के बाहर ही दर्द के मारे छटपटाते हुए बहु ने पोते को जन्म देकर हमसे रूठ कर भगवान् के पास चली गयी ! अब आप ही बताइए साहब हम गाँव के किसान मेहनत – मजदूरी करके अपना पेट भरते है , घूस देने के लिए इतना पैसा कहा से लायें ! “भालत माता ती – तय” , कहते हुए एक करीब पांच साल का बच्चा हाथ में तिरंगा लिए हुए और “मै अन्ना हूँ” की टोपी लगाये हुए यूं.पी. के एक खालौर गाँव के रामावतार जी की गोद में आकर बैठ गया ! यही हमारा पोता है साहब ! आप स्कूल जाते हो ? मैंने उस बच्चे पूंछा ! वो बच्चा हमारी तरफ देखने लगा शायद उसको समझ नहीं आया ! अभी ये तो बहुत छोटा है ये 5 कि.मी. दूर स्कूल कैसे जायेगा ? रात्रि लगभग 3 बजे बीडी पीते हुए , उस बच्चे की तरफ से जबाब रामावतार जी ने दिया !

हम नेत्रहीनों को आज भी भीख मांग कर अपना पेट भरना पड़ता है , और तो और सरकारी सहायता पाने के लिए रकम का लगभग आधा हिस्सा घूस देना पड़ता है ! इसलिए मै अपनी नेत्रहीन पत्नी के साथ अन्ना जी के समर्थन आया हूँ , रात्रि करीब 4 बजे फरीदाबाद के सच्चिदानंद जी ने हमें अपने रामलीला मैदान में आने का करण बताया ! हमारे बहुत आग्रह करने पर सच्चिदानद एक देशभक्ति गीत ” ये मेरे वतन के लोगों…” सुनाया ! इसके बाद मेरी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई !

अन्ना जी के ऊपर सरकार द्वारा किये गए चार जून की रात्रि का जलियावाला बाग – सा अपना घनघोर कु-कृत्य दोहराना चाहती थी परन्तु समय रहते जनता ने सरकार के मंसूबों को भांप लिया और अन्ना जी की समर्थन में सड़क पर आ गयी ! जहां एक तरफ अन्ना समर्थन में छत्रसाल स्टेडियम में आम लोगों के द्वारा दी गयी स्वतः गिरफ्तारी हो रही थी तो दूसरी तरफ सरकार के दांव-पेंचों से दिल्ली की सड़कों पर अन्ना जी भ्रमण कर रहे थे ! अंत में सात दिन के लिए सरकार के वकील-मंत्रियों ने अन्ना जी को सरकारी आवास अर्थात तिहाड़ जेल मुहैया करवा दी और अगले ही कुछ पलों में उन्हें छोड़ दिया गया ! बस यही से भारत का भोला जनमानस सरकार की इस क्रूरता के खिलाफ और भारत के संविधान द्वारा नागरिको को प्रदत्त मौलिक अधिकार के हनन के मुद्दे पर सारी जनता अर्थात सड़क से लेकर संसद तक अन्ना जी के समर्थन में आ गयी ! परिणामतः दिल्ली में अनशन न करने देने की जिद पर अड़ी सरकार को मजबूरी में रामलीला मैदान देना पड़ा ! मेरे मन में यह प्रश्न लगातार उठ रहा था की इतने लोग दिल्ली जैसे शहर में आये कैसे ? कौन थे ये लोग ? इन प्रश्नों का उत्तर जब मै स्वयं रामलीला मैदान गया तो मुझे स्वयं ही मिल गया !

बहरहाल , भारत की जनता के बारे में प्रायः ऐसा कहा जाता है कि यहाँ की जनता समझदार के साथ – साथ बहुत भोली है ! जनता के बीच जाकर उनसे बात करने के बाद लगा मुझे लगा कि लोग सच ही कहते है, मै इस बात से पूर्णतः सहमत भी हूँ ! परन्तु 16 अगस्त , 2011 को जिन मांगों को लेकर अन्ना जी ने अपने साथियों के साथ भारत से लगभग 65 % भ्रष्टाचार ख़त्म करने कि बात कही थी, क्या अन्ना जी की वो मांगे 27 अगस्त , 2011 तक सरकार द्वारा मान ली गयी ? मसलन :-

सरकार अपना कमजोर बिल वापस ले। नतीजा : सरकार ने बिल वापस नहीं लिया।

सरकार लोकपाल बिल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाये। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।

लोकपाल के दायरे में सांसद भी हों : नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र नहीं।

तीस अगस्त तक बिल संसद में पास हो। नतीजा : तीस अगस्त तो दूर सरकार ने कोई समय सीमा तक नहीं तय की कि वह बिल कब तक पास करवाएगी।

बिल को स्टैंडिंग कमेटी में नहीं भेजा जाए। नतीजा : स्टैंडिंग कमिटी के पास एक की बजाए पांच बिल भेजे गए हैं।

लोकपाल की नियुक्ति कमेटी में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।

जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा नियम 184 के तहत करा कर उसके पक्ष और विपक्ष में बाकायदा वोटिंग करायी जाए। नतीजा : चर्चा 184 के तहत नहीं हुई, ना ही वोटिंग हुई।

उपरोक्त के अतिरिक्त तीन अन्य वह मांगें जिनका जिक्र सरकार ने अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में किया है वह हैं :-

सिटिज़न चार्टर लागू करना,

निचले तबके के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना,

राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति करना। प्रणब मुखर्जी द्वारा स्पष्ट कहा गया कि इन तीनों मांगों के सन्दर्भ में सदन के सदस्यों की भावनाओं से अवगत कराते हुए लोकपाल बिल में संविधान कि सीमाओं के अंदर इन तीन मांगों को शामिल करने पर विचार हेतु आप (लोकसभा अध्यक्ष) इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजें।

मुझे ऐसा लगता है कि 15 अगस्त 1947 देश जहां खड़ा था आज भी वही खड़ा है ! कही टीम अन्ना द्वारा किए गए समझौते ने देश को उसी बिंदु पर लाकर तो नहीं खड़ा कर दिया ? जनता के विश्वास की सनसनीखेज सरेआम लूट को विजय के नारों की आड़ में छुपाया तो नहीं जा रहा है ? क्या एक बार फिर भोली जनता के विश्वास का चीर – हरण होगा ? ….. फैसला आप करें।

15 Responses to “कहीं जनता के विश्वास का फिर चीरहरण तो नहीं होगा ?”

  1. sunil patel

    श्री गुप्ता जी ने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है. वाकई प्रश्न की तरह उत्तर तो साफ़ है की सरकार कोई फैसला नहीं लेने वाली है. कोई मान नहीं मानने वाली है. कोई ठोस कानून नहीं बन्ने वाला है. कोई भी राजनैतिक दल अपने पारो पर कुल्हारी तो नहीं मरेगा. भ्रष्टाचार बंद तो ९९% राजनितिक दल भी समाप्त हो जायेंगे.

    श्री मुकेश जैन जी ने कहा है की ……….. कल देश अमेरीका का गुलाम होगा तो जयचन्द और मीरजाफर की लिस्ट में एक ओर नाम होगा ‘शातिर अन्ना हजारे’ – दारा सेना…………..
    यह तो ठीक है की वर्तमान सरकार के क्रिया कलाप के द्वारं कुछ सालो में भारत हो सकता है प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से पूरी तरह अमेरिका का गुलाम हो जाय. किन्तु अन्ना हजारे जी से इसे जोड़ना वाकई “बमूर में भाता लगाने” जैसे बात होगी. हाँ यहाँ यह सही है की अन्ना आन्दोलन में कुछ विवादस्पद लोग इसमें जुड़े है. उन्हें दूर किया जा सकता सकता था. किन्तु श्री अन्ना हजारे जी की मांग तो जन लोकपाल बिल की थी. वोह यह तो नहीं मांग रहे थे की उनके लोग नेता बनेंगे. मेरे खयान से आजाद भारत में यह पहला मौका होगा जब देश के हर कोने से लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट हुए है. हर व्यक्ति भ्रष्टाचार से उकता चूका है और जड़ से उखर फेकना चाहता है.
    रही बात अमेरिका से पैसा खाने की तो – अभी सरकार जो कर्म कर रही है उससे तो लाखो-करोडो गुना कम ही पैसा खा रहे होंगे. जांच होने दीजिये, अगर गलत होगें तो बचेंगे कोई भी नहीं.

    भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत जनमानस का आन्दोलन है इसे थमने नहीं देना है. isse कोई फर्क नहीं पड़ता है की स्वामी रामदेव जी कर रहे है या श्री अन्ना जी.

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  2. mukesh jain

    प्रेस विज्ञप्ति 20-8-11.
    कल देश अमेरीका का गुलाम होगा तो जयचन्द और मीरजाफर की लिस्ट में एक ओर नाम होगा ‘शातिर अन्ना हजारे’ – दारा सेना.

    धर्मरक्षक श्री दारा सेना ने कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी के इस ब्यान ‘’अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को अमेरिका का सहयोग मिल रहा है। अन्ना हजारे को मिल रही विदेशी ताकतों की जांच की जानी चाहिए।’’को सही समय पर दिया गया साहस भरा सटिक सही ब्यान बताया।.
    दारा सेना के अघ्यक्ष श्री मुकेश जैन ने कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी के वक्तव्य ‘‘इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि क्या कोई ताकत है, जो इस आंदोलन को समर्थन दे रही है जो न सिर्फ सरकार को बल्कि देश को अस्थिर करना चाहती है।’’ को भी सही बताया। भाजपा के नेता एम.वेंकैया नायडू द्वारा काग्रेस के बयान को बुरा और बेवकूफी भरा बताने पर दारा सेना के अध्यक्ष श्री मुकेश जैन ने कहा कि विपक्षी पार्टियों का ऐसे गम्भीर ब्यान को हल्के में लेना उनका गैर जिम्मेदारी भरा राष्ट्र् के लिये घातक व्यवहार है।भाजपा और विपक्षी पार्टिया को यह नहीं भूलना चाहिये कि कुछ ही साल पहले अमेरीका ने कैसे रासायनिक हथियारों का झूठा मामला खड़ा करके भारत के नजदीकी और मित्र देश इराक को नेस्तनाबूत करके गुलाम बना लिया। और आज अमेरीका अफगानिस्तान पर कब्जा करके हमारे सिर पर बैठ गया है।.
    श्री जैन ने कहा कि शातिर अन्ना ने देश को कितने बडें संकट में डाल दिया है।यह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की अन्ना मामले में संसद में जतायी चिन्ता ‘‘कई ताकतें हैं जो भारत को दुनिया के देशों में उसकी सही जगह पर देखना नहीं चाहती।’’’से ही जाहिर है और इसका मतलब न समझने पर एम.वेंकैया नायडू जैसे वरिष्ट नेता की बंुद्धि पर तरस आता है। श्री मुकेश जैन ने कहा कि शातिर अन्ना के साथ जुड़े अग्निवेश और अखिल गोगई जैसे देश के दुश्मन आतंकवादी शायद वेक्या नायडू जानबूझ कर नहीं देख रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिये कि अग्निवेश को उन्हीं की छत्तीसगढ़ सरकार ने कट्टर नक्सली आतंकवादी सबूतों के साथ बताया है। और अखिल गोगई के बारे में असम सरकार के मुख्य मंत्री तरूण गोगई का कहना है कि यह उल्फा का कट्टर आतंकवादी हैं।इन आतंकवादी गिरोहों को अन्तरराष्ट्र्ीय चर्च मदद करते हैं ये भी भारत सरकार ने 10 दिसम्बर 96 और 4 मई 1954 को संसद के बताया था।.
    दारा सेना के अध्यक्ष श्री मुकेश जैन ने देशवासियों को शातिर अन्ना की साजिश से सावधान रहने की अपील करते हुए आगाह किया कि शतिर अन्ना द्वारा अमेरीकी चर्च के साथ मिल कर पैदा की जा रही इस अस्थिरता के कारण देश एक बड़े संकट में फंस चुका है और कल देश यदि अमेरीका का गुलाम होता है तो जयचन्द और मीरजाफर की लिस्ट में एक और नाम होगा शातिर अन्ना हजारे।.
    श्री जॅन ने सरकार से भी अपील की है कि इस राष्ट्र्ीय संकट के समय में सर्व दलीय बैठक बुलाकर कल के मीरजाफर शातिर अन्ना हजारे और उसकी देश की दुश्मन चण्डाल चौकड़ी का कच्चा चिट्ठा देश के सामने खोला जाये । इस मामले में दारा सेना हर प्रकार से सरकार का साथ देगी।.

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    आपकी तडप मैं महसूस कर सकता हूँ.आपके उम्र में मैं भी शायद ऐसा ही सोचता था,पर आज सोचता हूँ की ऐसा सोचना गलत है.अभी तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध विधिवत लड़ाई का आगाज हुआ है.अभी पहली बार यह समझा गया है की जब तक क़ानून में बदलाव नहीं आयेगा तब तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान सफल नहीं होसकता.जेपी ने इसकी परिकल्पना सम्पूर्ण क्रान्ति वाले अपने अभियान में की थी,इसीलिए उन्होंने राइट टू रिकाल यानि वापस बुलाने के अधिकार को संविधान में समाहित करने को कहाथाऔरजनता पार्टी में सम्मिलित नेताओं के स्वार्थ ने वैसा होने नहीं दिया,क्योंकि सत्ता में आते ही वे अपना वादा भूल गए अन्ना जी के अभियान के अगले क़दमों में से एक वापस बुलाने के अधिकार वाला भी है.सच पूछिए तो इस बार का अनशन जागरण के लिए एक आवाज था.जन लोकपाल बिल तो भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में एक अशक्त कदम मात्र है.हमें अगर सचमुच भ्रष्टाचार को समाप्त करना है है तो मंजिल तक पहुँचने लिए ऐसे अनेक कदमों या सोपानो की आवश्यकता पड़ सकती है.सरकार को भी एक मौक़ा दिया गया है कुछ करने के लिए .जो लोग कहते हैं की हमने तो कुछ माना ही नहीं उनके लिए बिहार में एक कहावत है की थेथर यानि ढीठ के शरीर के पिछले भाग में पेड़ उग आया फिर भी वह मानने को तैयार नहीं हुआ की छांह हुआ.आन्दोलन का अगला आगाज भारत के किसी सुदूर देहात से होना चाहिएऔर वहां से बढ़ते हुए उसे शहर की ओर पहुंचना चाहिए .कोई जरूरी नहीं है की उसमे अनशन भी शामिल हो.अनशन की आवश्यकता भी पड़ सकती है,पर अभी तो यह देखना है हमारे गिरे हुए सांसद अपने को कितना उठा पाते हैं?

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  4. Ranjana

    बारह दिन का अनशन कोई ट्वेंटी ट्वेंटी का मैच नहीं था भाई साहब…यहाँ समस्या यह है की सबको ट्वेंटी ट्वेंटी मैच की आदत पड़ गयी है …और लोग तुरंत अकुला जाते हैं रिजल्ट के लिए…

    अरे भैया, यहाँ तो बिल्ली के गले में घंटी नहीं फंदा डालने वाली बात है…उसके मुंह से गोस्त छीन उसे दाल भात से पेट भरने को कहने वाली बात है…बिल्ली क्या कहेगी – आओ आओ चूहों…मेरी अंतरात्मा जाग गयी..अब मैं तौबा करती हूँ…तुम मेरे गले घंटी बाँध दो और मेरी हर गतिविधि पर नजर रखो…

    इतने वर्षों में परत दर परत जमी काई एक झटके में थोड़े न छूट जियेगी…लम्बी लड़ाई लडनी होगी इसके लिए…और यूँ भी यह मुकाबला निहत्थों और हथियार वालों के बीच है…

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  5. k . mishra

    राजीव गुप्ता जी !
    आपका लेख बहुत ही अच्छा लगा ,कृपया लिखते रहिये l के.मिश्र

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  6. Dr. Anwer Jamal

    भाई साहब ! इंसान अपने डर और लालच को जीतता आया है ईश्वर अल्लाह पर ईमान की बदौलत। आज यह ताक़त कम इंसानों के पास है और ज़्यादातर लोग इससे ख़ाली हैं।
    कौन आज ईश्वर को मानता है ?
    और कौन ईश्वर की मानता है ?
    कौन कर्मफल में विश्वास रखता है ?
    जब न तो विश्वास है और न ही वह किसी अनुशासन को मानता है तो फिर एक अन्ना ही कैसे मिटा सकता है देश से भ्रष्टाचार ?
    भ्रष्टाचार मिटाने के लिए ईमान चाहिए और अल्लाह के हुक्म की फ़रमांबरदारी।
    जिसे हमारी बात बुरी लगे, वह सही तरीक़ा हमें बता दे।

    जय हिन्द !
    वंदे ईश्वरम् !!

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  7. ajay kumar

    प्रत्येक व्यक्ति का किसी भी मुद्दे पैर विचार रखने का अधिकार है मैं राजीवजी के विचारो से थोडा सहमत हूँ पैर जहाँ तक अनशन तोड़ने का सवाल है तो मैं भी मानता हूँ की अन्ना ने अनशन तोड़कर सही किया

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  8. Shailendra Saxena

    ladai abhi lambi hai dost. chinta nahin chintan karna hai netaon ki pol kholna abhi baaki hai.
    in logon ko aik baar se adhik ticket hi na diya jai chahe vo kisi bhi party ka ho.aadha bhrastachaar apne aap khatm ho jayega.
    Shailendra saxena”sir”
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  9. Satyarthi

    अन्ना हजारे का आन्दोलन बिना किसी विशेष उपलब्धि के समाप्त हो गया यह सत्य है. इस आन्दोलन के कई पहलू शंका उत्पन्न करने वाले थे. अन्ना स्वयं भी बिलकुल दूध के धुले नहीं हैं. एक भूतपूर्व आई पी एस अफसर श्री वाई पी सिंह जिन्हों ने नौकरी में रहते हुए २००३ के अन्ना के अनशन में भाग लिया था ने लिखा था की महाराष्ट्र सर्कार के साथ अन्ना के बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं. कहा जाता है की अन्ना महाराष्ट में सर्कार के सहयोग से एक प्रकार की सामानांतर सर्कार चलाते रहे हैं.और विलासराव देशमुख और सुशील शिंदे के बिरुद्ध आदर्श घोटाले में संलिप्त होने के पर्याप्त सबूत प्राप्त होने के बावजूद भी अन्ना ने चुप्पी साध ली.ऐसा ही उन्होंने शरद पवार की सुपुत्री सुप्रिया सुले के लवासा घोटाले प्रकरण में भी किया. सोनिया गाँधी के अन्ना से अच्छे सम्बन्ध हैं लोकपाल बिल पर दोनों पक्षों में काफी दिनों से विमर्श चल रहा था. ४ अप्रैल २०११ को सोनिया गठित एन ए सी के एक वर्किंग ग्रुप की बैठक अरुणा रॉय की अध्यक्षता में हुई जिसमे अन्ना के सभी प्रमुख सहयोगी –शांति भूषण, प्रशांत भूषण,संतोष हेगड़े,अरविन्द केजरीवाल स्वामी अग्निवेश इत्यादि उपस्थित थे उसके अगले ही दिन अन्ना का जंतर मंतर का अनशन शुरू हुआ और मात्र चार दिन में समझौते के साथ समाप्त हो गया. मीडिया ने अन्ना को जैसी पब्लिसिटी दी वह अभूत पूर्व थी. सारांश यह की उस समय तक अन्ना सर्कार के चहेते थे और ऐसा समझा जाता है की अन्ना का प्रयोग स्वामी रामदेव के प्रभाव को विफल करना था.लगता है की बाद में इन संबंधों में कुछ खटास पैदा हो गई .
    अन्ना के सहयोगिओं को अमेरिकी स्रोतों से मिलने वाली प्रचुर वित्तीय सहायता शंका का एक और ठोस कारण है.अन्ना का जन लोकपाल पर ही केन्द्रित रहना और भ्रष्टाचार उन्मूलन के अनेक अपेक्षाकृत सरल उपायों पर ध्यान न देना भी चिंता का विषय है.
    जो भी हो अन्ना के आन्दोलन ने देश हित में एक बड़ा काम जो किया वह था देश के मध्यम तथा साधनहीन वर्गों में भ्रष्टाचार तथा बढती मंहगाई से उत्पन्न आक्रोश तथा पीड़ा को अभिव्यक्ति देना. यह आशा करना की देश का शासक वर्ग जो इतने वर्षों से अपने पदों का दुरूपयोग अपने स्वार्थसाधन के लिए करने का अभ्यस्त हो चुका है शीघ्र ही अपनी आय तथा गुरुत्व पर अंकुश लगाने वाले उपायों को आसानी से कार्यान्वित होने देगा अव्यवहारिक है. अभीतक भारत की जनता मूक रह कर अन्याय अत्याचार सहती आई है .अब आशा जगी है की नवोदित भारत का युवा वर्ग जिसने अन्ना के आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया एक लम्बे संघर्ष के लिए कृत संकल्प होगा . यदि यह यह आन्दोलन किसी न किसी रूप में अगले निर्वाचन तक चलता रहे तो अवश्य ही कुछ अच्छे परिणाम सामने आयेंगे

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  10. vimlesh

    अजय कुमार जी निश्चय ही मुद्दा सही है किन्तु कहने का भी तरीका होता है .

    मानलो आपके पड़ोस में कोई गामी
    (किसी की मृत्यु ) हो जाय उस वक्त क्या आप उस शोकाकुल परिवार को अपने बर्थडे पार्टी का निमंत्रण देंगे.
    आप जैसे लोग दे भी सकते है फिर क्या मनाईये खुशिया बाटो मिठाई .

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  11. राजीव गुप्ता

    Rajeev Gupta

    मै भी आप सबके साथ हूँ….शायद आप लोग नहीं समझ पा रहे जो मैंने कोशिश कि है लिखने की ! .मै भी इस देश का आम आदमी ही हूँ , हम सभी इस भ्रष्टाचार के कैंसर रूपी बीमारी से त्रस्त है …. हम सबको इस बीमारी का इलाज़ चाहिए….ये भी सही है….अर्थात उद्देश्य तो ठीक है और सबका एक ही है कि खुशहाल भारत देखने की ! दिक्कत ये है कि हम सभी जिसे आजकल अन्ना टीम कहा जाता है , हमने उद्देश्य पूर्ति के मार्ग चुनने में या तो ज्यादा आशावादी हो गए थे या तो व्यवस्था से टकराने की तैयारी सही से नहीं कर पाए ……मसलन :-
    १. जबतक मांगे पूरी नहीं हुई अनशन से उठे क्यों…..????
    २. अनशन सिर्फ अन्ना जी ने ही क्यों किया ( और लोगों अर्थात सदस्यों ने बारी बारी से क्यों नहीं किया , कोई व्यक्ति कितने दिन तक भूखा रह सकता है )….?????
    ३. रामलीला मैदान तो पंद्रह दिन ( बाद में बढाया भी जा सकता था ) के लिए मिला ही था , धरना क्यों ख़त्म किया….????
    ४. IBN7 ( हिंदी न्यूज चैनल ) के एक कार्यक्रम , एजेंडा में कांग्रेस के प्रवक्ता श्री शकील अहमद ने कल ( २ सितम्बर , २०११ ) को ताल ठोकते हुए कहा कि हमें अन्ना जी की एक भी मांगे नहीं मानी , ये कहने का अवसर उन्हें हमने क्यों दिया….?????
    ५. कांग्रेस के एक राजनेता श्री संजय निरुपम जी ने नवभारत में एक लेख लिखा है कि ” वो क्या था जिसका जश्न मनाया गया “…… उन्हें ऐसा कहने की नौबत क्यों आई …..?????
    ६.आज सभी अन्ना सहयोगियों को परेशान किया जा रहा है क्यों …..????

    अंत में मुझे ऐसा लगता है कि इसे आर पार की लड़ाई लडनी चाहिए थी , जब तक मांगे न मान ली जाती , अन्ना जी की अनुपस्थिति में भी बारी बारी से लगातार अनशन और धरना चलते रहना चाहिए था और लोकतंत्र को पुनः परिभाषित करना चाहिए था कि ” जनता ही जनार्दन है या सत्ता नहीं ” ! हमने समझौता करके सुनहरा अवसर गवा दिया ….और अब पुनः ऐसा आन्दोलन खड़ा करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी , और तब तक सत्ताधारी भी “सचेत” हो जायेंगे…..! हो सकता है कि मेरे लेख में कुछ त्रुटी हो आप सबके आशीर्वाद और मार्गदर्शन से समय के साथ ठीक हो जायेगी परन्तु मेरी व्यथा ठीक है ऐसा मुझे लगता है ! हम सब मिलकर एक सशक्त और खुश-हाल भारत का निर्माण कर विकसित भारत बनाने में अपना अपना योगदान देंगे , ऐसी मेरी सभी भारत-वासियों से अपेक्षा है !
    आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन का आकांक्षी
    राजीव गुप्ता

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  12. आर. सिंह

    आर.सिंह

    श्री राजीव गुप्ता,आपको शायद यह जान कर बुरा लगे की मेरे विचार से इस बार आपने इस लेख में अपनी बचपना दिखा दी.व्यंग की भाषा का इस्तेमाल करते हुए लेख का आरम्भ तो आपने एक तरह से ठीक ही किया था,पर बाद में आप बहक गये.बाद में आप भी भीवहीं पहुँच गए जहाँ स्वार्थी लोग आम जनता को पहुंचाना चाहते हैं.मैंने हीनहीं अन्य लोगों ने भी बार बार कहाहै की न जन लोक पाल राम बाण है न इसका लागू होना इतना आसान है.आप लोग भी जब अनपढ़ भोली जनता की तरह बातें करते हैं तो दू:ख होता है .अन्ना हजारे ने केवल एक रास्ता दिखाया है.उन्होंने समझाने का प्रयत्न किया है की आप लोग जगो.उन्होंने ये भी कहा है की भ्रष्टाचारख़त्म होने में दस पन्द्रह वर्ष लग सकते हैं ,पर यह भी तब सब सम्भव है जब अधिकाँश लोग स्वार्थ से ऊपर उठ कर इसके लिए प्रयत्न करे,अपनी मानसिकता बदलें.हमें तो अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों का शुक्र गुजार होना चाहिए की उन्होंने हमें एक रास्ता तो दिखाया.सच पूछिए तो इस आन्दोलन ने कुछ हद तक मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया की हर तरफ से निराश होने की आवश्यकता नहीं है.अगर हम प्रयत्न करे तो हमें रास्ता दिखाने के लिए आज भी कोई है.अन्ना हजारे को देख कर मुझे कबीर दास के साखी की ये पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती है,
    कबीरा खड़ा बाजार में ,लिए लुकाठी हाथ,
    जो घर जारे आपना चले हमारे साथ.

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  13. vimlesh

    गुप्त जी आपने लिखा अच्छा किन्तु अंत में भटक गए प्रस्तुतीकरण में कुछ खामी है आपके लेख की नीचे की ४-५ लाइनों को दुसरे तरीके से भी लिखा जा सकता था जो ज्यादा प्रभावी वा सार्थक होता .

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  14. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    पूर्वाग्रहों से भरा भटकानेवाला लेख.

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  15. विपिन किशोर सिन्हा

    आपने एक कटु सत्य से हमें परिचित कराया है। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जनजागरण अवश्य हुआ है लेकिन अन्नाजी के आन्दोलन से तत्काल कुछ हासिल होता नहीं दीख रहा है। सरकार अन्नाजी एवं उनकी टीम को संवैधानिक दांव-पेंच, संसद की गरिमा, संसदीय स्थाई समिति और लफ़्फ़ाजी के चक्रव्यूह में फंसाने में कामयाब हो गई है, ऐसा प्रतीत हो रहा है। अपने जनलोकपाल बिल को स्थाई समिति में विचारार्थ भिजवाने के लिए अन्नाजी को १२ दिन तक अनशन करना पड़ा, करोड़ों हिन्दुस्तानियों को सड़क पर उतरना पड़ा, लेकिन अरुणा राय, डा. जय प्रकाश नारायण और दलित मोर्चे को बिना किसी मिहनत और संघर्ष के अपने बिल को समिति में विचारर्थ रखने की स्वीकृति सरकारी अनुकंपा से अपने आप मिल गई. जनलोकपाल बिल की धार को कुन्द करने का यह नियोजित प्रयास है. यह सरकार न जन लोकपाल की भावनाओं के अनुसार विधेयक लायेगी और न काले धन की वापसी के लिए कोई काम करेगी। सरकार और सुपर सरकार के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अगर यह आज़ादी की दूसरी लड़ाई है, तो इसे आज़ादी की लड़ाई की तरह ही योजनाबद्ध तरीके से लड़ना होगा. अन्नाजी के सहयोगियों को सबकुछ हफ़्ते-दो हफ़्ते में पा लेने का दिवास्वप्न छोड़ना होगा. लंबी लड़ाई के लिए कमर कसनी होगी। सोनिया और कांग्रेस को धूल चटाने के बाद ही किसी सार्थक परिणाम की आशा की जा सकती है।

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