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    भारत की तटस्थ भूमिका पर दुनिया के देश अचरज में

    लिमटी खरे

    रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से पूरी दुनिया प्रभावित नजर आ रही है, पर सबसे ज्यादा चुनौति अगर कोई देश झेल रहा है तो वह है भारत। इस पूरे मसले में भारत तलवार की धार पर ही चलता प्रतीत हो रहा है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौति दुनिया के चौधरी अमेरिका और एक अन्य महाशक्ति रूस से अपने संबंध बरकरार रखने की है। रूस और यूक्रेन के बीच हो रही जग में लगभग डेढ़ माह तक तो भारत दोनों महाशक्तियों के साथ संबंध बरकरार रखने में पूरी तरह सफल रहा है। पर कब तक! अगर युद्ध समाप्त नहीं हुआ और रूस तथा अमेरिका के बीच रिश्तों में तल्खियां इसी तरह बढ़ती रहीं तो आखिर एक न एक दिन भारत को किसी एक का साथ देना मजबूरी न बन जाए।

    लगातार आ रही खबरों के अनुसार भारत पर अमेरिका जमकर दबाव बना रहा है। अमेरिका का दबाव है कि वह रूस के प्रति अपनी स्थिति स्पष्ट करे। ब्रहस्पतिवार को क्वाड की बैठक के उपरांत अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडन ने रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर दो टूक शब्दों में कह दिया कि इस संबंध में किसी भी देश की कोई बहाना या टालमटोल बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जानकार इस वक्तव्य को भारत के प्रति अमेरिका की चेतावनी के रूप में भी लेते दिख रहे हैं। क्वाड में शामिल आस्ट्रेलिया और जापान अमेरिका के दबाव में ही सही पर रूस की खुलकर आलोचना करते भी नजर आ रहे हैं।

    भारत जब आजाद हुआ उस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति सोवियत संघ हुआ करती थी। भारत में अंतरिक्ष, रक्षा, औघोगिक विकास, तकनीक, परमाणु उर्जा जैसे अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रूस के सहयोग को नकारा नहीं जा सकता है। इतना ही नहीं नई उभरती महाशक्ति चीन के साथ भी भारत, रूस एवं चीन के समूह में रूस ने भारत और चीन के बीच एक सेतु का काम भी किया है इस बात को भी भुलाया नहीं जा सकता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत और रूस के संबंध शुरूआती दौर से ही बहुत ज्यादा प्रगाढ़ रहे हैं। हाल ही में रूस के साथ भारत ने मिलकर दोनों ही देशों के सहयोग से मेक इन इंडिया की पहल से द्विपक्षीय संबंधों में खाद पानी डालने का जतन भी किया था।

    बहरहाल, रूस और यूक्रेन के युद्ध के चलते भारत पर काफी दबाव भी महसूस किया जा रहा है, पर भारत सदा की भांति इस समय भी जमकर डिमांड में है। भारत की तटस्थ नीति के कारण दुनिया भर के देशों में बेचैनी साफ तौर पर महसूस की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र मे भारत के द्वारा भले ही यूक्रेन का पक्ष लिया गया हो पर स्पष्ट तौर पर भारत रूस के खिलाफ भी नहीं गया है। दुनिया भर के विभिन्न देशों के मंत्रियों और अधिकारियों ने भारत की ओर रूख करना भी आरंभ किया है। जबसे इस युद्ध का बिगुल बजा है उसके बाद से दो चार दिनों के अंतराल में एक न एक देश के विदेश मंत्री अथवा विदेश सेवा के अधिकारी का पड़ाव नई दिल्ली बन रहा है। पिछले कुछ दिनों से यह भी महसूस किया जा रहा है कि अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन जैसे विकसित देश भारत पर न केवल लगातार नजर रखे हैं वरन वे भारत को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते भी दिख रहे हैं।

    आज का परिवेश हो या पुराना कोई समय, हर बार विश्व की महाशक्तियों को भारत के सहयोग की दरकार ही रहती आई है। हाल ही में रूस के विदेश मंत्री सर्गेव लावरोव भारत यात्रा पर हैं, ठीक उसी समय अमेरिका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दलीप सिंह भी भारत यात्रा पर हैं। दोनों की यात्राएं तफरीह के लिए कतई नहीं हैं। अमेरिका चाह रहा है कि भारत रूस की मदद न करे तो रूस की भी यही कोशिश होगी कि वह भारत को नाटो के साथ जाने से रोके। और तो और भारत के द्वारा अमेरिका की परवाह किए बिना ही रूस से तेल खरीदी को मंजूरी देकर सभी को चौंका दिया है।

    भारत, रूस और चीन के त्रिकोण में अब बर्फ पिघलती भी दिख रही है। रूस के विदेश मंत्री जब भारत आए थे तब वे बरास्ता चीन ही आए थे। इसके साथ ही चीन के विदेश मंत्री ने भी भारत का हाल ही में दौरा किया है। दरअसल, चीन को अपने उत्पाद खपाने के लिए भारत से बेहतरीन बाजार दूसरा नहीं मिल सकता, किन्तु ड्रेगन जिस तरह से बार बार भारत को आंखें दिखाता है उससे भारत चीन के व्यापारिक मसले प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। देखा जाए तो तकनीक, आईटी, पर्यटन, व्यापार आदि मामलों में भारत और अमेरिका की गलबहियां यूं ही नहीं बनीं। दरअसल, भारत और चीन के बीच जब भी रार हुई उस वक्त रूस के राष्ट्रपति पुतिन ज्यादातर मौकों पर चीन के सााथ दिखे, जिसके कारण भारत से उसकी कुछ दूरी बढ़ीं तो अमेरिका के साथ भारत की नजदीकियां भी बढ़ती गईं।

    आज जिस तरह के हालात दिखाई दे रहे हैं, उसे देखकर यही लग रहा है कि विश्व की व्यवस्थाएं अब एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर जाकर खड़ी हो चुकी हैं। आने वाले समय में विश्व की महाशक्ति कौन बनेगा, अमेरिका का दबदबा कायम रहेगा या रूस एक बार फिर सिरमौर बनेगा! यह कहा नहीं जा सकता है। भारत को सधे हुए कदमों से आगे बढ़ते हुए फिलहाल तो तटस्थ रवैया ही अख्तयार करना चाहिए। भारत को बहुत ही सोच समझकर कदम आगे बढ़ाना चाहिए। जहां तक रही रूस और यूक्रेन की बात तो दोनों ही देशों के साथ कूटनितिक रवैया रखते हुए अपना पक्ष मजबूत रखने की फिलहाल आवश्यका है। दरअसल, जिसे भी विश्व में महाशक्ति बनना है उसे भारत के सहयोग की दरकार होगी ही। यह सच है कि भारत के सहयोग के बिना कोई भी देश विश्व का चौधरी नहीं बन सकता . . .!

    लिमटी खरे
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    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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