देश चाहता “आपातकाल स्ट्राइक”

जब आंदोलनकारी आन्दोलनजीवी बन जाये तो शासन क्या करें? राष्ट्रीय व सामाजिक व्यवस्थाएं ठप्प होती रहें। नागरिकों के मौलिक व संविधानिक अधिकारों का हनन होता रहे। दैनिक दिनचर्याओं को बाधक बना दिया जाता रहे।फिर भी शासन-प्रशासन उदासीन बना रहे,क्यों?आज जब राष्ट्र में अराजकता का भीषण वातावरण बनाने के लिए भारतविरोधी तत्वों का दुःसाहस चरम पर है तो क्यों न उनपर अंकुश लगाया जाय। हमारे देश के विरुद्ध बार-बार अंतरराष्ट्रीय षडयन्त्र होते रहे और हम मौन रहें, कब तक?क्या ऐसे आन्दोलनजीवियों को नियंत्रित करने के लिए आपातकालीन व्यवस्था लगाने का निर्णय आवश्यक नहीं होगा? भारतीय संविधान में बिगड़ती हुए ऐसी भयानक स्थिति में आपातकाल की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। अतः राष्ट्रीय व सामाजिक सुरक्षा को सर्वोच्च मानते हुए व देशवासियों के अधिकारों का सम्मान करते हुए शासन को आपातकाल लगाने का कठोर निर्णय लेना होगा। जब शासन बार-बार वार्ताओं व अन्य लोकतांत्रिक व न्यायायिक उपायों से शांति स्थापित करने में आन्दोलनजीवियों की घृष्टता के कारण सफल नहीं हो पा रहा तो अपने सशक्त संविधानिक अधिकारों का सदुपयोग तो करना ही होगा। इसलिए वर्षों से देशद्रोहियों के बढ़ते हुए दुःसाहस को नियंत्रित करने के लिए “आपातकाल स्ट्राइक” तो करनी ही चाहिये।

आज सत्ता सुख के वियोग में तथाकथित विरासती नेताओं की तड़पती हुई महत्वाकांक्षाओं ने भारतीय लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवादियों का शासन विपक्षी दलों, संदिग्ध स्वयंसेवी संगठनों, विदेशी षड्यंत्रकारियों, आतकंवादियों,अलगाववादियों व नक्सलवादियों आदि को स्वीकार नहीं। इसी का परिणाम है कि लगभग सात वर्षों से राष्ट्रीय विकास को गति प्रदान करने वाली सरकार को घेरने के लिए सारे यत्न किये जा रहे है। यह सत्य है कि शासन-प्रशासन ने लोकतंत्र की मर्यादाओं का सम्मान बचाये रखते हुए बार-बार जिस धैर्य व संयम का परिचय दिया है उसका अभिप्राय यह नहीं होना चाहिये की विद्रोहियों को बार-बार ऐसे आन्दोलन करके देश में संकट बनाये रखना सरल बना रहे।

भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरते हुए देख कर अनेक देशद्रोही व भारत विरोधी तत्वों के गठबंधन जो वर्षो से षडयन्त्र करते आ रहे हैं अब और अधिक गति से सक्रिय हो गए हैं। देश के विकास के लिए और भारतीयता की रक्षार्थ किसी भी योजना को किर्यान्वित करने व अवरोध पैदा करने में भीड़तंत्र को उकसाकर व लालच देकर दुःसाहस करने वाले धीरे-धीरे सफल हो रहे है। लोकतांत्रिक प्रणाली का ऐसा अनुचित लाभ उठाने वालों पर शासन-प्रशासन की उदारता उन्हें और अधिक दुःसाहसी बना रही है। “नागरिकता संशोधन कानून” व “कृषि कानूनों” के सहारे देशवासियों को भड़काने में देश को विखंडित करने का सपना देखने वालों की जड़ों को खोदना होगा। शासन को संवैधानिक शक्तियों का पालन करके ऐसे तत्वों पर कठोर कार्यवाही करने के लिए किन्तुओं व परंतुओं के जाल से बाहर निकलना होगा।

आखिर कब तक भारत विरोधी मानसिकता से केंद्र में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का पालन करते हुए जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को ही उसी जनता द्वारा विरोध की आग में झुलसाया जाता रहे?क्या यह कहना अनुचित होगा कि संसद में पारित विधेयकों के विषय में बार-बार झूठा भ्रम फैलाकर देशवासियों को उकसा कर आन्दोलनों की आड़ में अराजकता फैलाने वालों के लिए यह एक प्रकार का नया उपक्रम/उद्योग बनता जा रहा है? इसको देशप्रेम मानने वाले आन्दोलनकारियों को यह समझना चाहिये कि यह स्पष्ट देशद्रोह है। केंद्र में चुनी हुई सरकार के विरोध में जब जनता ही आंदोलित हो जाएगी तो लोकतंत्र की रक्षा कैसे हो पाएगी? ऐसा प्रतीत होता है कि इन प्रतिकूल परिस्थितियों में देश में आपातकाल लगाने की अगर शासन पहल करें तो भारत का अधिकांश समाज इसका स्वागत करेगा। देश की एकता व अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए एवं भारतीयता के समक्ष बढ़ती ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए आपातकाल जैसी संवैधानिक व्यवस्था को अपनाने का साहस करना अनुचित नहीं होगा। देश की सीमाओं व सीमाओं के बाहर सर्जिकल व एयर स्ट्राइक का सशक्त व सफल प्रदर्शन करके विश्व में भारत की शक्ति का लोहा मनमाने वाली केंद्रीय सरकार को अब देश-विदेश में छिपे हुए इन आन्दोलनजीवियों व विद्रोहियों पर “आपातकाल स्ट्राइक” करके देशवासियों के मौलिक व संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखना होगा।

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