लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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अवाम बनाम वामपंथ की पत्रकारिता

– पंकज झा

एक सामान्य से सवाल पर गौर कीजिये. रावण से लेकर ओसामा बिन लादेन तक के व्यक्तित्व में क्या फर्क है? सभी काफी संपन्न, अति ज्ञानी, अपने विचारों के प्रति निष्ठावान, समर्पित. किसी के भी इन गुणों पर आप शायद ही कोई सवाल उठा सकें. लेकिन आखिर क्या कारण है इन तमाम गुणों के होते भी सभ्य समाज में उन सबको हिकारत की नज़र से, समाज पर एक बोझ की तरह ही देखा जाता है. क्या कारण है कि मानव समाज इन तमाम चरित्रों के मौत तक का उत्सव मनाते हैं? मेरी समझ से उसका सामान्य कारण यह है कि ज्ञान होते हुए भी उसके अहंकार से ग्रस्त होना, तमाम विपरीत विचारों के प्रति अव्वल दर्जे का असहिष्णु होना और मानव मात्र को अपने आगे कीड़े-मकोडों से बेहतर नहीं समझना. यही सब ऐसे अमानवीय अवगुण हैं जिसने इन्हें सर्वगुण संपन्न होते हुए भी दुर्गति तक पहुंचाया.

बात अगर पत्रकारिता या बौद्धिकता का करें तो यहां भी आपको ऐसे समूह मिलेंगे जिनकी विद्वता, निष्ठा या समर्पण किसी में भी उन्हें आप उन्नीस नहीं पायेंगे. लेकिन अफ़सोस यही कि उनकी सारी प्रतिभा और ताकत का उपयोग महज़ इतना है कि आखिर किस तरह देश-दुनिया को रहने के लिए एक बदतर जगह बना दिया जाय.

भारत के सन्दर्भ में भी आप यहां के बौद्धिक वर्ग को दो श्रेणी में वर्गीकृत कर सकते हैं. एक वो जिनके लिए ‘अवाम’ सब कुछ है और दुसरे वो जो ‘वाम’ की रक्षा के निमित्त अपनी भारत मां तक को सूली पर चढ़ा सकते हैं. तो वामपंथी कोई भी काम करें, ध्येय महज़ इतना होगा कि अवाम को कमज़ोर किया जाय. और यह कोई संयोग नहीं है. यह उनकी वैचारिक मजबूरी है. इसलिए कि उनकी विचारधारा कभी ‘राष्ट्र’ नाम के किसी इकाई के अस्तित्व में भरोसा नहीं करते. न किसी तरह के लोकतंत्र में और न ही संसदीय प्रणाली में. अगर वक्त की नजाकत देख कर कुछ वामपंथी समूहों ने इस प्रणाली को मजबूरन स्वीकार भी किया है तो महज़ इसलिए कि उनके पास दूसरा कोई चारा नहीं था.

ओसामावादी और साम्यवादी दोनों में यह समानता है कि वह मूर्खों के बनाए अपने ऐसे स्वर्ग में रहना चाहते हैं जहां विविधता के लिए कोई जगह नहीं है. एक ने दुनिया को दारुल इस्लाम और दारुल हरब में बांट रखा है तो दुसरे के लिए मानव की बस दो पहचान एक बुर्जुआ और दूसरा सर्वहारा. जिस तरह इस्लाम के नाम पर गंदगी फैलाने वालों के लिये दुनिया को दारुल इस्लाम बनाने, सारे काफिरों यानी गैर मुसलामानों को मोमीन बनाने हेतु क्रूरतम हिंसा समेत हर हथकंडे जायज हैं, उसी तरह ‘वाम’ के लिए हर कथित पूजीवादी समूहों का सफाया कर दुनिया को गरीबों की बस्ती बनाने का युटोपिया. और अपने इस दिवा स्वप्न को पूरा करने में सबसे बड़ा उपकरण दोनों के लिए हिंसा और केवल हिंसा. दोनों के लिए किसी भी तरह के विमर्श की केवल तभी तक अर्थ है जब तक वे कमज़ोर हों. ताकतवर होते ही बस दोनों का एक मात्र नारा ‘मानो या मरो.’

ऊपरी तौर पर अलग-अलग दिखने वाले ये दोनों समूह (जिनमें से एक लिए ‘मज़हब’ जान से भी बढ़ कर तो दूसरे के लिए धर्म अफीम होने के बावजूद) अपने इन्ही समानता के कारण आपको गाहे-ब-गाहे गलबहिया करते नज़र आयेंगे. अगर भरोसा नहीं हो तो गिलानी और अरुंधती दोनों को एक मंच पर भौकते देख लीजिए.

दोनों के एकीकरण का कारण यह कि उन दोनों के घोषित-अघोषित लक्ष्यों में जो सबसे बड़ा रुकावट है वह है ‘’राष्ट्र.’’ वह राष्ट्र जिसे हम भारत के नाम से जानते हैं. वह राष्ट्र जिसने कश्मीर से कन्याकुमारी तक को एक सूत्र में बाँध कर रखा है. वह राष्ट्र जिसके एकीकरण के निमित्त कभी सुदूर दक्षिण के केरल के ‘कालडी’ गांव से चलकर कोई तेजस्वी युवक देश के दूसरे छोड़ मिथिला तक की यात्रा कर उत्तर-दक्षिण-पुरब-पश्चिम में चार पीठों का निर्माण कर इस सांस्कृतिक इकाई को एक सूत्र में पिरोया. उस राष्ट्र को जिसके अग्रदूत भगवान राम ने सुदूर उत्तर मिथिला से अपनी यात्रा शुरू कर दक्षिण में लंका तक को एक भावनात्मक स्वरूप दिया. वह राष्ट्र जिसे श्री कृष्ण ने पूर्व में मथुरा से शुरू हो पश्चिम में द्वारिका तक जा कर ‘भारत’ के सारथी बनने में अपना योगदान दिया. और वह राष्ट्र जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भावनात्मकता पर आधारित एक भौतिक इकाई’’ कहा है.

तो रंग-रूप, रीति-रिवाज़, भेष-भूषा-भाषा, भोजन-भजन, आदि विभिन्न विविधताओं को एक सूत्र में पिरोने वाले सूत्र इस देश की धर्म-संस्कृति ही है. इसे नुकसान पहुचा कर ही वे दोनों समूह अपने-अपने मंसूबे में सफल हो सकते हैं. जब कोई व्यक्ति या विचार इस एकीकरण को मज़बूत करने का प्रयास करता है तो ऐसे विचारों के वाहक लोगों को अपनी दूकान बंद होती नज़र आती है.

ऐसे ही एक विद्वान सज्जन हैं जगदीश्वर चतुर्वेदी जी. उनकी विद्वता, अपने विचारों के प्रति निष्ठा आदि वैसी ही है जैसा ऊपर चरित्रों में वर्णित किया गया है. ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ में भरोसा करने वाले अपने जैसे लोग कई बार उनको पढ़ कर सोचने लगते हैं कि काश हम भी लक्ष्मण बन उनके पास जा कर अंतिम सांस गिनते रावण रूपी वामपंथ की कुछ अच्छी बातें सीख पाते. या कुमारिल भट्ट की तरह भले ही बाद में धान की भुसियों में खुद को जला लेना पड़े लेकिन हिंदू विरोधी तत्वों से लड़ने के लिए पहले उन्ही के पास जा कर शिक्षा ले पाते. भले अर्जुन नहीं लकिन एकलव्य ही बन अंगूठे की कीमत पर भी कौरव समूह द्रोण से भी धनुर्विद्या सीख पाते. लेकिन अफसोस यह कि इतने गुणों के बावजूद भी चतुर्वेदी जी अवाम के विरुद्ध अपनी सारी प्रतिभा झोंक देने वाले वामपंथियों से रत्ती भर भी अलग नहीं हो सके. रावण की तरह ही एक पंडित कुल में जन्म लेने के बाद भी उन्हें हर उस चीज़ से ऐतराज़ है जो देश को, हिंदुत्व को, यहां की संस्कृति को मज़बूत करता हो. ऐसे हर व्यक्ति, विचार या फैसला इनके लिए अमान्य जो भारत को ‘भारत’ बनाता हो. अपने इतने गुणों के बावजूद भी जैसा कि टिप्पणीकारों ने उनके लेखों पर लिखा है बहुधा कुतर्क और बकवास पर भी वे उतर आते हैं. कुतर्कों का सहारा इसलिए कि आखिर जब आप पूरी तरह दुर्भावना पर ही उतर आयेंगे तो लाख विद्वता के बावजूद इतने सही तर्क कहाँ से लायेंगे? तो बस अपने हिन्दी प्राध्यापक होने का फायदा उठाकर, अपनी कल्पनाशीलता को उपयोग कर झूठ पर झूठ गढ़े जाइये.

अभी हाल तक देश का साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखने वाला अयोध्या का फैसला इनके दुःख का कारण था तो अब इनका निशाना हैं बाबा रामदेव. कारण बस वही कि देश में ऐसा कोई न पैदा हो जो राष्ट्रवाद को मज़बूत करता हो. एकबारगी इन्हें बाबा रामदेव में अवगुण ही अवगुण दिखने लगे. बड़ी मुश्किल से मिहनत कर इन्होंने ‘रहस्योद्घाटन’ किया कि बाबा की कमाई चार सौ करोड तक पहुंच चुकी है. लेकिन वे जान-बूझकर इन तथ्यों को नज़रंदाज़ कर गए कि वह पैसा जबरन किसी को शीतल पेय पिला कर प्राप्त नहीं किया गया है. बल्कि उन कंपनियों द्वारा पिलाये गए ज़हर को रोक कर देश का स्वास्थ्य और बहुमूल्य विदेशी मुद्रा को बाहर जाने से रोक कर प्राप्त किया गया है. हज़ारों करोड की दवा कंपनियों के विरुद्ध अभियान चला कर प्राप्त किया गया है.

आज बाबा रामदेव ने बीजेपी जैसी पार्टी को मजबूर कर दिया कि वह अपने लोक लुभावन मुद्दों को छोड़ स्वीस बैंक में रखे गए देश की गाढ़ी लाखों करोड की कमाई को वापस लाने को मुद्दा बनाए. ख़बरों के अनुसार सरकार को इसमें आंशिक सफलता भी मिली है. सैद्धांतिक तौर पर स्विस सरकार ने पैसा वापस भेजने हेतु सहमति व्यक्त की है. आज उसी बाबा के कारण देश एक बार फ़िर अपनी संस्कृति की तरफ लौटने लगा है. भारत की सांस्कृतिक विरासत का पताका दुनिया में फ़िर लहरा रहा है. आस्था आदि चैनल पर देश के लाखों लोग मुफ्त में सुबह-सुबह उठ कर स्वास्थ्य और आध्यात्मिक खुराक विभिन्न ज्वलंत मुदों के साथ प्राप्त करते हैं.

आप सोचिये कि अगर चतुर्वेदी जी वास्तव में देश की आर्थिक स्थिति के प्रति चिंतित होते तो वृंदा करात जिस तरह रामदेव जी के पीछे पड़ मुंह की खाई थी उससे सबक लेकर अन्य मुद्दे पर अपना ध्यान आकृष्ट करते. ऐसे लोगों की नीयत आपको देखना हो तो सोचें….चार सौ करोड़ के लिए आंसू बहाने वाले पंडित जी को आपने कभी एक लाख करोड़ के कोमनवेल्थ के ‘खेल’ पर कभी सवाल उठाते देखा है? तकनीक का जम कर इस्तेमाल करने वाले इस विद्वान को आपने कभी साठ हज़ार करोड से अधिक के स्पेक्ट्रम घोटाले पर बात करते हुए कभी सुना? महंगाई बढ़ा कर किये जाने वाले अब तक के सबसे बड़े घोटाले के विरुद्ध, जमाखोरों बिचौलियों के विरुद्ध, हज़ारों किसानों के आत्महत्या के विरुद्ध कभी आवाज़ उठाते देखा? इसलिए आपने नहीं इन्हें इन मुद्दों पर नहीं पढ़ा क्योंकि इन सब चीज़ों से अंततः इन लोगों का मकसद ही पूरा होता है. इन चीज़ों से देश कमज़ोर होता है. और यही इन समूहों का ध्येय है.

आ. जगदीश्वर जी, जिस तरह लंका की लड़ाई रोकने के निमित्त शांति दूत बन भगवान राम गए थे. मात्र पांच गांव मांगने भगवान कृष्ण खुद कौरवों के पास गए थे. आपके गुणानुवाद के साथ यह लेख भी उसी तरह आपका आह्वान करता है कि आप भी देश के विरुद्ध लड़ाई को छोड़ अपना कुछ आर्थिक नुकसान भी उठाकर अपनी प्रतिभा का राष्ट्र कार्य हितार्थ उपयोग कीजिये. आप दुनिया को ही अपनी मां माने इसमें किसको आपत्ति होगा. हमलोग भी विश्व को अपना परिवार ही मानते हैं. लेकिन इसके लिए ये थोड़े ज़रूरी है कि अपने मां को गाली दी जाय? जो खुद की मां के प्रति श्रद्धा रखेगा वही भारत मां की बात करने का भी अधिकारी होगा. और जो भारत मां के प्रति उपेक्षा का भाव रखेगा वह दुनिया की बात करने का क्या ख़ाक अधिकारी होगा. आपने चाणक्य का सूत्र ज़रूर पढ़ा होगा ‘त्यजदेकं कुलस्यार्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत.’

अगर आप हमें समानता की बात सिखाना चाहते हैं तो हम तो उसी इशावास्योपनिषद की संतानें हैं जो कहता है कि ‘इशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच्य जगतां जगत’ यानी इश्वर इस जगत के कण-कण में विद्यमान हैं. अब इससे बड़ा साम्यवाद और क्या हो सकता है? हम और आप उस कणाद की संतान है जिसने कण-कण को एक दूसरे से सम्बंधित बताया जिस पर आइन्स्टाइन ने बाद में सापेक्षता का सिद्धांत दिया. तो क्या हमें इस सामान्य बात को सीखने के लिए भी ‘थ्येनआनमन’ में जाकर खून बहाना होगा? चीन के मानवाधिकारवादी की तरह प्रतारित होकर ही हम समानता का पाठ पढ़ सकते हैं? क्या आपकी समानता का सिद्धांत कभी दलाई लामा जैसे संत और उनके नेतृत्व में लाखों शांतिप्रिय तिब्बतियों का दर्द भी महसूस नहीं कर पाता?

हालांकि संभव भले ही नहीं हो लेकिन निवेदन यही है कि इस देश की पुनीत माटी ने, ब्रज की आवोहवा ने आपको जिस लायक बनाया है उसका क़र्ज़ उतारने, थोडा अपने स्वार्थ से पड़े जाकर खुद को राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होकर अपना जन्म कृतार्थ करें. अन्यथा यह नश्वर शरीर तो एक दिन खत्म ही होना है. रावण जैसे लोगों का भी अवसान यही तो सन्देश देता है कि ‘चोला माटी के राम एकर का भरोसा….सादर.’

15 Responses to “झूठ पर झूठ गढ़ रहे हैं चतुर्वेदीजी”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    rajesh kapoor

    पंकज जी आपको पुनः यहाँ पाकर बहुत सुखद लगा. विश्लेषण की आपकी प्रतिभा तो अद्भुत है ही . उसका लाभ देशभक्त शक्तियों को जहां-जहां भी संभव हो मिलना ही चाहिए. वैसे अब इन तामसिक ताकतों के दिन ही कितने रहे हैं ? अस्तित्व की अंतिम लड़ाई है इन बेचारों के लिए. अपनी सकारात्मक बात पर अधिक बल देने से ये अधिक दुर्बल स्वतः ही होंगे, ऐसी आशा मुझे है. अस्तु आगे भी आपको यहाँ पढ़ने का सुख प्राप्त होता रहेगा? निराश न करिएगा. बहुत अपने से लगते हैं कुछ लोग. शुभ कामनाएं!

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  2. Rekha singh

    झा जी आपका लेख चतुर्वेदी जी के लेख का सही जबाब है |चतुर्वेदी जी का लेख मैने पढ़ा तो मुझे समझने मे तनिक भी देर नहीं लगी |उसी समय मै भी वहा थी और हमारे दो मित्र पति पत्नी नामवर सिंह जी के साथ पी एच दी केर रहे थे |

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  3. पंकज झा

    पंकज झा.

    आ. दिनेश गौर जी. आपकी वृहत टिप्पणी के लिए आभार. आप सही कह रहे हैं कि ऐसे लेखकों को कितना समर्थन मिलता है, देश का मानस क्या है यह लेखों की टिप्पणियों से ही पता चलता है.
    आ. मधुसूदन जी ने अपने सारगर्भित टिप्पनियों में इनके मंसूबे की पोल खोल दी है. अब भी अगर यह चेतना ही नहीं चाहते तो कोई क्या कर सकता है सिवा सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करने के.
    लोकेन्द्र जी की सद्भावना काम आये. पंडित जी जैसे तत्व रास्ते पर आ जाय यही कामना.लेकिन उम्मीद तो वास्तव में नहीं है.
    शैलेन्द्र जी, आपका वामपंथ पर लिखने का सुझाव था. समग्र रूप से तो अभी तक नहीं लिख पाया हूँ. लेकिन टुकड़े-टुकड़े में इन लेखों के माध्यम से वामपंथ का चेहरा आप देख पा रहे होंगे.आपका मत बिलकुल दुरुस्त है कि ऐसे लेखकों की उपेक्षा ही एकमात्र उपाय है.
    प्रदीप जी, आप ही की तरह मुझे भी समझ नहीं आया कि आखिर रामदेव बाबा ने ऐसा क्या जुल्म कर दिया है कि उनपर आक्रमण करने के लिए जगदीश्वर जी को सीरीज लेखन पड़ा!
    अनिशा जी, हम सभी को इश्वर से एक दुसरे के लिए प्रार्थना करने की ज़रूरत है. जिनको भी भगवान दुर्बुद्धि वाला समझें उन्हें सुमति और सद्गति मिले…यही मेरी भी प्रार्थना परम पिता से.
    अज्ञानी जी, आप बहुत ज्ञानवान हैं. आपने ठीक कहा कि पंडित जी को अब सिवा विषय को इधर-उधर घुमाते रहने के और कोई काम नहीं है.
    शिशिर जी की आशंका से मैं भी खुद को नत्थी करता हूँ कि इस तरह से लेखक के पिल पड़ने का कारण केवल आर्थिक तो नहीं है?
    अतीत जी. बिलकुल ये बाज़ नहीं आने वाले. जबतक मैं आपको जबाब दे रहा हूँ तब-तक फ़िर पंडित जी ने राष्ट्र को लांछित करने वाला दो लेख और लिख डाला. राजीव जी welcome.
    आप टिप्पणीयां ही मेरा पाथेय है. आप सभी महानुभावों का ह्रदय से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ…सादर.

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  4. ateet Gupta

    धन्यवाद पंकज जी,
    चतुर्वेदी के सरे झूट एक एक बार में धो डाला अब फिर नए कुछ लिखेगा आखिर वाम का चमचा जो Thahra

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  5. shishir chandra

    chaturvedi sahab paise me bik gaye hain. unse ummeed karna bekar hai.
    i wanna ask mr chaturvedi to reply the questions asked by pankaj. i think he ( mr chaturvedi) is brainvashed now. he is like a manav bomb. if he is a professor of Hindi then has he right to write anything? has he possess any morality?
    mr pankaj i request you to not comment on mr chaturvedi in future. such persons are burden on society.

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  6. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.प्रो. मधुसूदन उवाच

    चतुर्वेदी जी का मंत्र निम्न है।
    सतो ऽ मा, असतम् गमय॥
    ज्योतिर्मा तमसोऽ गमय॥
    अमृतं मा मृत्योऽर्गमय॥
    और एक और सिद्धांत मुख पाठ कर लिया है।
    कि एक झूठ को बार बार कहने पर वह सच हो जाता है।
    वह झूठ दूसरों के बदले इन्ही पर हिप्नोसीस करता दिखाई देता है।
    उनका लेख मैंने पढना बंद कर दिया है।

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  7. Agyaani

    बहुत सुन्दर पंकज जी,
    आपकी अनुपस्थिति का एहसास आपके लेख को पढ़ कर हो गया! चतुर्वेदी जी जैसे कुछ लोग मुद्दे को इतना घुमाते फिराते हैं कि सही विषयवस्तु का अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो जाता है! जो निचोड़ आपने दिया है उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ!
    एक कॉन्वेंट पढ़ी लिखी महिला ने भी इसी तरह कि टिपणी करने का प्रयास किया है! भगवान इनको सद्बुद्धि दे!

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  8. anisha singh rajput

    पंकज जी भगवन आपको सद्बुद्धि दे.संस्कृति औत हिंदुत्व का जमाना चला गया..दुनिया सुधर जायेगी पर आप लोग नही सुधरोगे.संस्कृति का नाम लेकर कटते -मरते रहो.
    नए विचारो की क़द्र की कोई उम्मीद भी नही करना….ऐसे ही हिंदुत्व का झंडा उठाये रहो..

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  9. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.प्रो. मधुसूदन उवाच

    वामवादी “झूठ पर झूठ” कैसे गढ़ते हैं? एक उदाहरण पढें।
    ॥कुटिल वामवादियों का षड-यंत्र॥
    संभाजीनगर(औरंगाबाद) में, संघ प्रेरणासे, डॉ. अंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठानकी ओरसे हेडगेवार रुग्णालय २०+ वर्षॊंसे चल रहा है। जहां डॉक्टर और अन्य सभी व्यवसायी एक ही परिवारके सदस्यों की भांति काम करते हैं। डॉक्टर भी वहां न्य़ूनतम वेतन लेते हैं, और सभी सह-कर्मचारियों से एक परिवार की भांति व्यवहार करते हैं।
    वहां कुटिल वामवादियोंने, कैसे षड-यंत्र रचा, यह पढें। रुग्णालय के प्रारंभ के वर्ष में ही, वामवादियोंने अपने कुछ चुनंदा कर्मचारियों को वहां नौकरी लिवाकर, एक कर्मचारियों की संघटना स्थापित की। इस कम्य़ुनिस्ट संगठन ने कर्म चारियोंको भरमाकर हडताल करवाने की बहुत कोशिश की। रुग्णालय को बदनाम करने के लिए, वहां दलित नेताओं को हडताल के समर्थन के लिए मिले। कहा, कि इस संस्थामें “कर्मचारियों का बुरा शोषण होता है, और उन्हे कम वेतन दिया जाता है”। ऐसी झूठी शिकायतें करना शुरू किया।
    पर दलित नेताओं ने उलटे कहा, कि “ऐसा अन्याय होना, इस संस्थामें संभव ही नहीं है” जहां एक अच्छा काम चल रहा है, वहां ऐसा संघर्ष ना उकसाइए।” पर विघ्नसंतोषी तत्त्वोंने आग लगाने की पूरी कोशिश की, पर सफल ना हुए। क्यों कि, दलित नेताओं का भी, प्रत्यक्ष वैयक्तिक ठोस अनुभव विपरित ही था।

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  10. Pradeep arya

    Aadarneeya Pankaj ji jo vichar kai साथियों के मन में चल रहे the. aapne aapni lekhni se alankrit kar dye… vastav में मन में बड़ी पीड़ा hoti he chaturvedi jaise vichardhara के logon के vichar dekh kar… kyu inhe desh ki unnati or swabhiman par dard hota he.. esa kya jurm kar diya baba ram dev ने… मेरी तो इच्छा हे इन jaise logon ko तो ek baar vahi gulami wala jeevan bhogne kala pani jaisi jagah bhej diya jaye… ya baba ram dev se bat karke unke shiviron में bhijwakar ब्रेन वश करवाया जाये wo bhi bilkul free wali suvidha में…inko desh ki anya दुर्दशa nahi dikhai de rahi.. or jo desh ko sahi disha में le jakar badalna chahte hen unki dasha dikhane में lage हें… इन bhai sahab ko samjha do जिस योग or chikitsa padddhati ki ramdev ने punarjivit kiya हे use aaj bhart hi nahi desh के bahar के log bhi manne oe janne or pahchanne lage हें… aaj bharat wapas swabhiman ki or lot raha हे तो inko na jane konsi chinta sataye ja rahi हे.. inko salah do ki ye desh sudharna chahte हें तो apni profesari chhod kar ghar chhod kar ek baar un sthano par jakar dekhen jahan inki kalm or soch nahi jati par रामदेव की योग bhakti or desh bakti jati हे..kisi par bebak tippni krna aasan hota हे घर or pariwar chhod kar samaj की seva karne में dam nikal jayegi inki…apke is satya lekh के liye bahut sadhuwad pankaj ji

    Reply
  11. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    पंकज जी अब तो मैंने भी जगदीश्वर जी को टिप्पणी देना एकदम बंद कर दिया है क्योंकि अब वो इसके लायक नहीं रहें
    अब मुझे ऐसा लगता है की वो संघ का विरोध विचारधारा के आधार पर नहीं करते थे बल्कि उन्हें उल्टा पुल्टा लिखने में आनंद आता है या उन्हें इसके लिए पैसे मिलते है अब आप पाएंगे की श्रीराम तिवारी जी को भी ये भान हो गया है इसलिए वो इनके काल्पनिक लेखो पर टिप्पणी करने से बच रहें है
    पंकज जी संघ के खिलाफ कोई कुछ लिखता है तो गुस्सा आता है लेकिन पूर्व में एक संघ स्वयंसेवक होने के नाते हम सभी को ये शिक्षा दी गयी की सभी के विचारों का आदर करों और विरोधी को भी अपने विचारों से जीतों लेकिन यहाँ तो विचार है ही नहीं ये तो प्रायोजित प्रचार जैसा दिखता है
    मैं सभी राष्ट्रवादियों से अनुरोध करता हूँ कि जब तक जगदीश्वर जी के फाईनेंसर इनका साथ नहीं छोड़ देते और उनकी अक्ल ठिकाने पर नहीं आ जाती सभी संयम बरते और जगदीश्वर जी के लेखो पर किसी भी प्रकार कि टिप्पणी न करें
    हाँ आप एक टिप्पणी कर सकते है ” जगदीश्वर जी गेट वेल सून”

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  12. लोकेन्द्र सिंह राजपूत

    lokendra singh rajput

    पंकज जी आपके लेख से पूरी तरह सहमत। कई वामपंथी वापस आए हैं और सही रास्ते पर चले हैं। आशा है कि चतुर्वेदी जी भी एक दिन अपनी ऊर्जा का सही उपयोग करेंगे। सच मानिए कई बार जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की बातें कई बार बड़ी ऊटपंटाग लगतीं हैं। भारतीयता का विरोध करने के लिए वे कुछ भी लिख जाते हैं। बाबा रामदेव पर लिखकर तो उनकी समझ का स्तर ही समझ आ गया। ईश्वर उन्हें जल्द ही सद्बुद्धि प्रदान करे।

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  13. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.प्रो. मधुसूदन उवाच

    साम्यवादी बस, एक ही, औषधी के एजंट हैं। वह औषधी है, “क्रांति”। और क्रांति के लिए आवश्यक है अराजकता, वैमनस्य, परंपराओंका नाश। इसके बिना क्रांति नहीं होती। यह मानते हैं, कि, क्रांति के बाद जन्मती है नई व्यवस्था। इसके लिए यह लगे हुए हैं ८०-९० वर्षॊंसे समाजमें वैमनस्य फैलाने; सारी परंपराओं को नष्ट करने। इनका सकारात्मक, रचनात्मक कार्य क्रम बस एक ही है=> *परंपराएं नष्ट करो*। यह जो भी समस्या को सुलझाने हाथ डालते हैं, वहां कटुता, संघर्ष और समाज में वैमनस्य फैल जाते हैं।जब भी लिखेंगे, बोलेंगे, ऐसे शब्दोंका प्रयोग करेंगे, कि, प्रति-पक्षका तमस जगा देंगे। इन्होंने लिस्ट बनाके रखी है, संसदीय भाषा में भद्र गालियों की। इनके लेखन में आप यह सारा पढ पाएंगे।”शब्दों के चयन” से यह पहचाने भी जाएंगे।
    यह वाद विवाद जीतने के लिए करते हैं।संवाद करना इन्हे नहीं आता। कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता जिन प्रश्नोंको हाथ में लेते हैं, वहां प्रायः समस्या सुलझे बिना असंतोष और संघर्ष फैल जाता है। जनता को राहत मिलती नहीं पर उनके मनमें कडवाहट और विफलता की भावना फैल जाती है।
    बाबा रामदेव के योग से परंपरा पुनर्स्थापित होगी, तो इनकी क्रांति क्या होगा?
    पंकज भाई अब यह फुत्कारने लगे तो अचरज नहीं होगा।

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  14. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय पंकज भाई आपका यह लेख पढ़ कर आप जैसे राष्ट्र भक्त के आगे मै ह्रदय से नतमस्तक हूँ| आपके द्वारा चतुर्वेदी जी के पिछले सात लेखों का उत्तर एक लेख में दिया जाना सच में प्रशंनीय है|

    इन महानुभाव के पिछले सात लेखों में इन्होने जिस प्रकार स्वामी रामदेव जी के विरुद्ध जो जहर उगला है वह निंदनीय है| इनके लेखों पर पाठकों ने भिन्न भिन्न प्रकार की टिप्पणियाँ की| अगर मै गलत नहीं हूँ तो शायद एक दो ही ऐसे थे जो इनके समर्थन में अपनी एक दो टिप्पणियों के साथ हाजिरी लगा कर पता नहीं कहाँ खो गए थे अपने इस पुरोधा को प्रवक्ता.कॉम के पाठकों के विरोध का सामना करने के लिये|

    चतुर्वेदी जी भी बड़ी जिद्द के साथ एक के बाद एक लेख से स्वामी रामदेव जी के खिलाफ जहर उगल रहे थे| मैंने भी इनके शुरूआती लेखों में इन्हें टिप्पणियां दी थी| इन्होने स्वामी जी, योग और आयुर्वेद को अवैज्ञानिक बताया| मैंने खुद का उदाहरण देकर यह बताया था कि किस प्रकार यह विद्या कारगर है| किन्तु अपनी जिद्द के अनुसार चतुर्वेदी जी लगे रहे| श्री आर सिंह जी कि एक टिप्पणी बहुत भाई| जिसमे उन्होंने लिखा कि “एक मुर्ख को समझाना बहुत आसान है, उसे भी बुद्धिमान बनाया जा सकता है, किन्तु जब कोई मुर्ख स्वयं को बुद्धिमान समझने लगे तो ब्रह्मा जी भी उसे खुश नहीं कर सकते| चतुर्वेदी जी के इन लेखों से यह सिद्ध होता है कि इन्हें मानव मूल्यों कि कोई परवाह नहीं है| इनका काम केवल विरोध करना ही है|

    श्री राम जन्म भूमि का निर्णय आने के बाद सब ने उसका स्वागत किया| हिन्दू मुस्लिम सभी ने इस निर्णय को स्वीकार| देश कि जनता खुश थी कि चलो सब कुछ शान्ति से निबट गया, कोई दंगा फसाद देखने को नहीं मिला| जो लोग इस निर्णय से नाखुश थे वे भी शांतिपूर्वक अपने आगे की रणनीति को कार्यान्वित कर रहे थे| ऐसे में इन महाशय को शायद यह शान्ति बर्दाश्त नहीं हुई| उस समय भी इनके हिन्दू विरोधी लेखों कि एक सीरीज आई थी जिसमे देश की शान्ति को भंग करने का पूरा मैटीरियल था| मतलब साफ़ है वामपंथियों को देश से, उसकी संस्कृती से, मानव मूल्यों से, भावनाओं से कोई लेना देना नहीं है| ये लोग अपने वामपंथी विचार सब पर थोपना चाहते हैं| जब राम जन्म भूमि मुद्दा ठंडा हुआ तो यह नया मुद्दा उठा लाये|

    स्वामी रामदेव जी की महानता को ये लोग क्या ललकारेंगे जो खुद विदेशी विचारों में पले बढे हैं| स्विस बैंक में जमा भारत के नेताओं के काले धन को राष्ट्रीय सम्पंत्ति घोषित करने का स्वामी जी का प्रयास प्रशंसनीय है| मैंने एक बार भारत स्वाभिमान के एक सम्मलेन में स्वामी जी और श्री राजीव दीक्षित का व्याख्यान सुना था जिसमे वे एक और प्रयास की तरफ इशारा कर रहे थे कि २०० वर्षों ने अंग्रेजों ने भारत से जो कुछ भी लूटा है उसे अंग्रेजों से वापस कैसे लिया जाए| इस के लिये वे सभी Comman Wealth Countries को इकट्ठे प्रयासों के लिये आमंत्रित कर रहे हैं| इन महान व्यक्ति की महानता को ये वामपंथी क्या समझेंगे|

    आदरणीय पंकज भाई आपका लेख पढ़ कर शायद इन महानुभाव को कुछ शर्म आ जाए|

    बहुत बहुत धन्यवाद|

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