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    संस्कृति के हत्यारे

    राजेन्द्र जोशी (विनियोग परिवार)

    पांच सौ साल पहले यह दुनिया आज की तुलना में सुखी और हिंसा रहित थी। लेकिन 1492 में एक ऐसी घटना घटी जिसने सारे विश्व के प्रवाह को मोड़ दिया। पहले देश-विदेश से वस्तु के आयात-निर्यात का काम जहाजों से होता था। ऐसे जहाजों को यूरोप के लुटेरे लूट लेते थे और उसके बंटवारे को लेकर उनमें विवाद होता था। इन विवादों को निपटाने के लिए वे अपने धर्म गुरुओं की शरण लेते थे, जो उनके झगड़े निपटाते थे। यूरोप के धर्म गुरु पोप थे, जो पहले रोम में रहते थे, परन्तु आजकल उन्होंने वेटिकन नाम का एक स्वतन्त्र राष्ट्र बना लिया है। उस राष्ट्र के राजनीतिक प्रमुख होने के साथ-साथ पोप कैथोलिक क्रिश्चियन समुदाय के धर्म गुरु भी हैं।

    1493 में किसी बात पर स्पेन और पुर्तगाल में विवाद हो गया और पोप ने पूरे विश्व को दो हिस्सों में बांट दिया। पूर्व का हिस्सा उन्होंने पुर्तगाल को और पश्चिम का हिस्सा स्पेन को दे दिया। इस आदेश के साथ-साथ ये आदेश भी दिया गया कि आज से विश्व में एक ही धर्म रहेगा, ईसाई धर्म और एक ही प्रजा रहेगी गोरी प्रजा। अन्य जातियों व धर्मों का नाश होगा। इस उद्देश्य को लेकर ईसाई देश संपूर्ण विश्व पर कब्जा करने में लग गये। पोप के नेतृत्व में उन्होंने भारत में प्रवेश के लिए 100-100 साल के पांच चरण बनाए।

    पहला चरण 100 साल का यह बना कि जिस देश को खत्म करना है, पहले उसकी पूरी जानकारी लेनी है। इस दौरान यूरोपियन पर्यटक हमारे देश के कोने-कोने में घूमे और हमारी कमजोरियों, भौगोलिक परिस्थितियों, कृषि पद्धति आदि का अध्ययन किया।

    दूसरे चरण में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जरिए देश में व्यापार करने की इजाजत मांगी गई। किसी भी देश को चलाने के लिए चार आधार होते हैं। राजकीय, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक। अग्रेजों ने पहले यहां की राजसत्ता पर कब्जा किया, फिर हमारे इतिहास को बदल कर राजाओं और व्यापारियों का नकारात्मक चित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने ब्राह्मणों और क्षत्रियों को उनके काम से बेदखल किया। धीरे-धीरे उन्होंने हमारी आर्थिक संरचना को भी तोड़ डाला।

    अंतिम चरण में उन्होंने हमारी धार्मिक संरचना पर प्रहार किया जो अभी भी जारी है। इसके लिए उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था पर शिकंजा कस लिया है। हमारी आर्थिक संरचना को नष्ट करने के लिए उन्होंने गोवंश और उस पर आधारित कृषि को निशाना बनाया। दरअसल, इस देश में गायों की हत्या मुसलमानों ने शुरू नहीं की। अंग्रेज सैनिकों को मांस देने के लिए यहां गो हत्या शुरू हुई और बाद में अंग्रेजों ने ही इसे सांप्रदायिक मामला बनाकर पूरे देश को दो हिस्सो में बांट दिया।

    कृषि को नष्ट करने के लिए रासायनिक खाद को बढ़ावा दिया गया। जनता को भुलावे में डालने के लिए एक हउआ खड़ा किया गया कि हमारे यहां अनाज का उत्पादन बहुत कम है। अगर हम इस उत्पादन को नहीं बढ़ाएंगे तो देश में अकाल पड़ेगा। वास्तव में 1931 का अकाल मैन मेड अकाल था। अंग्रेजों ने जानबूझ कर यहां अकाल पैदा किया था। अकाल का डर दिखाकर केमिकल फर्टिलाइजर के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया। इसका दुष्परिणाम अब सामने आ रहा है। हमारी जमीन प्रदूषित है, हमारा अनाज प्रदूषित है और यहां तक की पेयजल भी प्रदूषित है।

    हमारी देशी गाय को खत्म करना एक अन्तरराष्ट्रीय षडयंत्र है। इस षडयंत्र पर नजर रखने की जरूरत है। मात्र गोबर, गोमूत्र से औषधि बनाने से ये काम नहीं होगा। कृषि पद्धति को बदलने और गोचर भूमि को बचाने के साथ-साथ गाय को मारने के पीछे कौन हैं, जब तक हम इसकी पहचान नहीं कर लेंगे और उसका कोई उपाय नहीं निकाल लेंगे, तब तक गाय की रक्षा करना बहुत मुश्किल है।

    3 COMMENTS

    1. राजेन्द्रजी के इस लेख में दिए गए तथ्यों की प्रमाणिकता पर संदेह होता है… या यूं कहें की विश्वास ही नहीं होता की इतनी बड़ी प्लानिंग इतने सालों पहले हुयी और उस पर शब्दशा अमल हो रहा है…. अनिलजी की बातों में दम लगता है…. कांग्रेस भी हिंदुत्व का विनाश चाहती है…

    2. राजेन्द्र जूशी जी ने आचा प्रयास किया है. पर इस लेख पर आई अनिल गुप्ता जी की टिपण्णी सागर में गागर के सामान है. इतिहास के तथ्य और उनका सारगर्भित विश्लेषण प्रशंसनीय है. साधुवाद !

    3. श्री जोशी ने लेख की शुरुआत ठीक ठाक की लेकिन विषय को पूरी तरह से विकसित नहीं कर पाए.किस प्रकार से कोलंबस से लेकर वास्को डी गामा और अल्बू कर्क आदि ने जहाँ जहाँ वो गए वहां की संस्कृति को समूल नष्ट करने का काम किया यह एक भयानक कहानी है. भारत इन युरिपियाँ हमलो से बहुत प्रभावित हुआ. लेकिन इससे भी ज्यादा नुकसान उस अंग्रेजी शिक्षा से हुआ जिसे लार्ड मकाले ने १८३५ में शुरू किया और अब काले देसी अंग्रेजों ने पूरी शिद्दत से उसे आगे बढाया. आज कोई भी राष्ट्रीय शिक्षा की बात करे तो उस पर भगवाकरण का ठप्पा लगाकर उसके खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो जाता है. ये सब इस देश को जल्दी से जल्दी ईसाई साम्राज्य का हिस्सा बनाने की साजिश के तहत किया जा रहा है. कुछ वर्ष पूर्व बेंगकोक में वर्ल्ड चर्च कोंसिल की बैठक हुई और उसमे इस बात पर अफ़सोस जाहिर किया गया की इतने लम्बे समय से प्रयास के बावजूद अभी तक भारत के केवल २ प्रतिशत लोग ही ईसाई बन पाए हैं. और भारत के ज्यादा से ज्यादा लोगों को ईसाई बनाया जाना आवश्यक है. सोनिया गाँधी और उनकी मंडली( जिसमे ज्यादातर ईसाई ही हैं) इस देश को ज्यादा से ज्यादा ईसाई बनाने के इस अभियान में पूरी ताकत से जुटे हैं. लेकिन हम हैं की सोनिया गाँधी को सर पर बैठाये हैं.अब भी नहीं जागे तो शायद फिर मौका भी नहीं मिल पायेगा.

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