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    Homeकला-संस्कृतिरोगनाशक, ग्रहदोष निवारक, पवित्र रक्तपुष्पक पलाश

    रोगनाशक, ग्रहदोष निवारक, पवित्र रक्तपुष्पक पलाश

    -अशोक “प्रवृद्ध”

    झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, छतीसगढ़ आदि प्रदेशों सहित सम्पूर्ण भारत के जंगल इन दिनों पलाश के पेड़ों में लदे लाल- लाल रक्ताक्ष फूलों से पुष्पित हो रहे हैं। वसंत काल में वायु के झोंकों से हिलती हुई पलाश की शाखाएँ वन की ज्वाला के समान लग रहीं हैं और इनसे ढकी हुई धरती लाल साड़ी में सजी हुई कोई नववधू के समान लग रही हैं। पत्ते झड़े पेड़ अर्थात पर्णहीन वृक्ष पर लदे पलाश के लाल फूल देखने वालों को सुखद, नयनाभिराम और आकर्षक प्रतीत हो रहे हैं। छोटे अर्द्ध चंद्राकार गहरे लाल पलाश पुष्प मध्य फाल्गुण से ही जंगलों में दिखाई देने लगे हैं, जो चैत्र मास के अंत तक दिखाई देंगे। आमतौर पर इसके फूल को टेसू कहा जाता है। वसंत काल में पलाश का पत्रहीन परन्तु लाल फूलों से लदा हुआ वृक्ष अत्यंत नेत्रसुखद होते ही हैं। इसीलिए संस्कृत, हिन्दी, बंगला सहित अन्य भाषाओँ के कवि व साहित्यकारों ने वसंत काल में इसकी सौंदर्यता के वर्णन में वृहत पद्य व गद्य साहित्य का निर्माण किया है। इसके फूल अत्यंत सुंदर होने के बावजूद गंधहीन हैं। पलाश एक वृक्ष है, जिसे पलास, छूल, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू अदि नामों से भी जाना जाता है। संस्कृत में यह किंशुक नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा का शब्द पलाश दो शब्दों के योग से बना है- पल और आश। पल का अर्थ है- मांस और अश का अर्थ है- खाना। इस प्रकार पलाश का अर्थ हुआ- ऐसा पेड़ जिसने माँस खाया हुआ है। इसके ही पर्याय किंसुक, पर्ण, याज्ञिक, रक्तपुष्पक, क्षारश्रेष्ठ, वात-पोथ, ब्रह्मावृक्ष, ब्रह्मावृक्षक, ब्रह्मोपनेता, समिद्धर, करक, त्रिपत्रक, ब्रह्मपादप, पलाशक, त्रिपर्ण, रक्तपुष्प, पुतद्रु, काष्ठद्रु, बीजस्नेह, कृमिघ्न, वक्रपुष्पक, सुपर्णी, केसूदो,ब्रह्मकलश हैं। खिले हुए लाल फूलों से लदे हुए पलाश की उपमा संस्कृत लेखकों ने युद्ध भूमि से की है। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव और पार्वती का एकांत भंग करने के कारण अग्निदेव को शापग्रस्त होकर पृथ्वी पर पलाश के वृक्ष के रूप में जन्म लेना पड़ा। पलाश वृक्ष भारत के सुंदर फूलों वाले प्रमुख वृक्षों में से एक है। ऋग्वेद में सोम, अश्वत्‍थ के साथ ही पलाश वृक्षों की विशेष महिमागान किया गया है। वैदिक ग्रन्थों के साथ ही श्रौतसूत्रों में इसका उल्लेख मिलता है। पौराणिक मान्यतानुसार इससे प्राप्त लकड़ी से दण्ड बनाकर द्विजों का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। श्रौतसूत्रों में पलाश की लकड़ी से कई प्रकार के यज्ञपात्रों के निर्माण की विधि अंकित है। गृह्यसूत्र के अनुसार उपनयन के समय में ब्राह्मण कुमार को पलाश की लकड़ी का दंड ग्रहण करने की विधि है। पलाश वृक्ष को भारत में पवित्र माना जाता है। पलाश के पेड को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति को पलाश वृक्ष की पूजा करने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। प्राचीन काल से ही पलाश का प्रमुख उपयोग यज्ञ कर्मों के लिए किया जाता था। कौशिकसूत्र में पलाश के पेस्ट का प्रयोग जलोदर अर्थात पेट में सूजन के लिए किये जाने का वर्णन अंकित है। बृहत्रयी के अनुसार पलाश का प्रमुख रूप से प्रमेह अर्थात डायबिटीज, अपतानक, अर्श या पाइल्स, अतिसार या दस्त, कान-नाक से खून बहने की बीमारी रक्तपित, कुष्ठ आदि की चिकित्सा में उपयोग किया जाताहै।ऐसी भी मान्यता है कि इस फूल का पलाशी नाम प्लासी के युद्ध के कारण पड़ा है। मान्यता है कि पलाश के वृक्ष में सृष्टि के प्रमुख देवता- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास है। अत: पलाश का उपयोग ग्रहों की शांति हेतु भी किया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में ग्रहों के दोष निवारण हेतु और धार्मिक अनुष्ठानों में पलाश के वृक्ष का अधिक प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में पलाश के अनेक गुण बताते हुए इसके पाँचों अंगों- तना, जड़, फल, फूल और बीज से दवाएँ बनाने की विधियाँ बताई गई हैं। इसका ब्यूटिया नाम अठारहवीं सदी के पादप वर्गिकी के एक संरक्षक ब्यूट के अर्ल जोहन की स्मृति में रखा गया था। इसका प्रजाति है- मोनोस्पर्मा, जो ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- एक बीज वाला। इसके फूल अत्यंत आकर्षक होते हैं। इसके आकर्षक फूलों के कारण इसे जंगल की आग की संज्ञा से भी अभिहित किया गया है। पलाश का फूल उत्तर प्रदेश का राज्य पुष्प है, और भारतीय डाक तार विभाग के द्वारा भी इसे डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित किया जा चुका है। फाल्गुण- चैत्र मास के मध्यकाल में खिलने वाले पलाश के फूलों के अत्यंत गहरे लाल रंग के होने के कारण अन्य गहरी लाल वस्तुओं को लाल टेसू कहने की परम्परा चल पड़ी है। अत्यंत प्राचीन काल से ही होलिकोत्सव के रंग इसके फूलों से तैयार किये जाने की परम्परा रही है। फूल झड़ जाने पर गोल और चपटे बीजों को समेटे चौड़ी- चौ़ड़ी फलियाँ भी सुहावनी प्रतीत होती हैं। फलियों को पलाश पापड़ा अथवा पापड़ी और बीजों को पलाश बीज कहते हैं।

    भारतबर्ष के सभी प्रदेशों और सभी स्थानों में पाया जाने वाला पलाश का वृक्ष मैदानों- जंगलों के साथ ही चार हजार फुट ऊँची पहाडी की चोटियों तक में किसी न किसी रूप में उगा मिल जाता है। यह वृक्ष, क्षुप और लता- तीनों रूपों में प्राप्य है। लता पलाश दो प्रकार का होता है- लाल पुष्पों वाला और सफेद पुष्पों वाला। सफेद पुष्पों वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। एक पीले पुष्पों वाला पलाश भी होता है। लता रूप में यह कम मिलता है, लेकिन बगीचों में यह वृक्ष रूप में और जंगलों और पहाड़ों में अधिकतर क्षुप रूप में पाया जाता है। पत्ते, फूल और फल तीनों रूपों अर्थात भेदों के समान ही होते हैं। वृक्ष ऊँचा नहीं बल्कि मध्यम अर्थात मझोले आकार का 12- 15 मीटर लंबा होता है। क्षुप झाड़ियों के रूप में अर्थात एक स्थान पर समीप में ही बहुत से उगते हैं। पीठ की ओर सफ़ेद और सामने की ओर हरा रंग लिए इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं । पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन- तीन होते हैं। इसके पत्ते बड़े और एक वृंत पर मात्र तीन की संख्या में ही निकलने के कारण ही ढाक के तीन पात वाली मुहाबरा प्रसिद्ध हो चली है। इसके पल्लव धूसर या भूरे रंग के रेशमी और रोयेंदार होते हैं। इसका तना सीधा, अनियमित शाखाओं और खुरदुरे तने वाला होता है। इसकी छाल राख के रंग की मोटी और रेशेदार, लकड़ी बड़ी टेढ़ी-मेढ़ी, कठिनाई से चार -पाँच हाथ सीधी मिल पाती है।

    पलाश के सभी भाग, समस्तांग- जड़, तना, पत्ती फूल, फल और बीज मानव के लिए उपयोगी सिद्ध हुए हैं। पलाश वृक्ष के फूल में 1.5 प्रतिशत इसोबूट्रिन, 0.37 प्रतिशत ब्यूटेइन और 0.04 प्रतिशत ब्यूटिन के अतिरिक्त फ्लेवोनाइड और स्टेरायड पाए जाते हैं। एक अध्ययन से पता चला है कि फूल के सूखने पर इसोब्यूट्रिन धीरे ब्यूट्रिन में परिवर्तित हो जाती है। इन फूलों में कोरोपसिन, ईसोकोरोपसिन, सल्फ्यूरिन मोनोस्पर्मोसाइड और ईसोमोनोपर्मोसाइड की संरचना मिलती है। इसकी जड़ों में ग्लूकोज, ग्लिसरीन, ग्लूकोसाइड और सुगंधित यौगिक मिलते हैं। इसकी बीजों में तेल पाया जाता है और फूलों का लाल रंग इनमें पाए जाने वाले चाकोन और औरोन्स के कारण होता है। इसके पत्ते पत्तल और दोने, तंबाकू की बीड़ियाँ आदि बनाने के काम आती हैं। फूल व बीज औषधि रूप में प्रयोग होते हैं। पलाश के बीज में पेट के कीड़े अर्थात क्रीमी नाशक गुण पाया जाता है। इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है। काम शक्तिवर्धक और शीघ्रपतन की समस्या को दूर करता है। पलाश फूल से स्नान से ताजगी का अहसास, लू से बचाव तथा गर्मी का अहसास नहीं होता। इसके फूल को उबालने से लाली लिए हुए एक प्रकार का ललहुन्द पीला रंग निकलता है, जिसका होली अथवा अन्य अवसरों पर लोगों अथवा कपड़ों को रंगने में प्रयोग किया जाता है। इसके फूलों को पीसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है। फली की बुकनी कर लेने से वह अबीर का रूप ग्रहण कर लेती है। छाल से निकलने वाले रेशे से जहाज के पटरों की दरारों में भरकर भीतर पानी आने से रोकने का प्रबंध किया जाता है। जड़ की छाल से निकलने वाली रेशा से रस्सियों, दरी और कागज आदि का निर्माण किया जाता है। इसकी पतली डालियों को उबालकर एक प्रकार का कत्था तैयार किया जाता है। मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार करते हैं। छाल पर बछने लगाने से एक प्रकार का गोंद -चुनियाँ गोंद अर्थात पलाश का गोंद निकलता है। वैद्यक में इसके फूल को स्वादु, कड़वा, गरम, कसैला, वातवर्धक शीतज, चरपरा, मलरोधक तृषा, दाह, पित्त कफ, रुधिरविकार, कुष्ठ और मूत्रकृच्छ का नाशक, फल को रूखा, हलका गरम, पाक में चरपरा, कफ, वात, उदररोग, कृमि, कुष्ठ, गुल्म, प्रमेह, बवासीर और शूल का नाशक; बीज को स्तिग्ध, चरपरा गरम, कफ और कृमि का नाशक और गोंद को मलरोधक, ग्रहणी, मुखरोग, खाँसी और पसीने को दूर करने वाला लिखा है। वर्तमान में व्यवसायिक तौर पर वृहत रूप से पलाश का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन, कमरकस आयुर्वेदिक औषधि, पत्तियों से पत्रावली आदि का निर्माण भी किया जाने लगा है। पलाश वृक्ष भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, थाईलैंड, कम्बोडिया, मलेशिया, श्रीलंका आदि में बहुतायत में आज भी देखा जा सकता है। पुराणों और इतिहास में वर्णित आख्यानों के अनुसार गंगा-यमुना के दोआब से लेकर मध्यप्रदेश तक पलाश वृक्ष के जंगल के भरमार होने की पुष्टि होती है, लेकिन उन्नीसवीं शताव्दी के प्रारंभ से ही इनकी तेज़ी से कटाई शुरू होने और इनके संवर्द्धन, परिवर्द्धन,पुष्पण व संरक्षण हेतु नीति के अभाव के कारण अब ये कहीं-कहीं लुप्त होने की कगार पर पहुँच गए हैं।

    अशोक “प्रवृद्ध”
    अशोक “प्रवृद्ध”
    बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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