लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

Posted On by &filed under महिला-जगत.


राजीव गुप्ता

अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी ।

ममेदनु क्रतुपतिरू सेहनाया उपाचरेत !! ( ऋग्वेद ) 

( ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है “मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ),तीव्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों का मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं ! ” )

संक्रमण काल के इस दौर में तथाकथित प्रसिद्धि पाने की होड़, प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के नाम पर बदलाव के दहलीज पर खड़े हम स्त्री के उस जाज्वल्यमान आभा की प्रतीक्षा कर रहे है जो सनातन से ही भारतीय मनीषियों के चिंतन का विषय रहा है ! भारतीय मनीषियों ने सदैव से ही स्त्री-पुरुष को न केवल एक दूसरे का पूरक माना अपितु मनु स्मृति में स्त्री को पूजनीय कहकर समाज में प्रतिष्ठित किया गया !

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ! 

यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: !!

( जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है वहां समृद्धि का राज्य होता है. जहां महिलाऑ का अपमान होता है, वहां की सब योजनाएं/ कार्य विफल हो जाते हैं )

.विश्व की इस अद्वितीय भारतीय संस्कृति में ही हम स्त्री को पूजनीय कह सकते है तभी तो पुरुष उनकी ही बदौलत आज भी महिमा मंडित हो रहा है ! भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण अखंड मातृसत्ता अदिति भी नारी है और वेद माता गायत्री है ! नारी की महानता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :-

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्‍मीस्‍तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्‍स! न त्‍यजन्ति गृहं हितत्।।

( जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते। )

भारत में हमेशा से ही नारी को उच्च स्थान दिया गया । भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूप में किया गया है !आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। आज भी आदर्श-रूप में भारतीय नारी में तीनों देवियाँ सरस्वती,लक्ष्मी और दुर्गा की पूजा होती है ! भला ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श को कौन नहीं जानता ? किसी भी मंगलकार्य में नारी की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है ! नारी की अनुपस्थिति में किये गए कोई भी मांगलिक कार्य को अपूर्ण माना गया। उदहारण के लिए हम सत्यनारायण भगवान् की कथा को ही ले लेते है ! वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। माँ तो प्रेम, भक्ति तथा श्रध्दा की आराध्य देवी है। तीनों लोकों में ‘माता’ के रूप में नारी की महत्ता प्रकट की गई है। जिसके कदमों तले स्वर्ग है, जिसके हृदय में कोमलता, पवित्रता, शीतलता, शाश्वत वाणी की शौर्य-सत्ता और वात्सल्य जैसे अनेक उत्कट गुणों का समावेश है, जिसकी मुस्कान में सृजन रूपी शक्ति है तथा जो हमें सन्मार्ग के चरमोत्कर्ष शिखर तक पहुँचने हेतु उत्प्रेरित करती है, उसे ”मातृदेवो भव” कहा गया है ! नारी के प्रति किसी भी प्रकार के असम्मान को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है चाहे नारी शत्रु पक्ष की ही क्यों ना हो तो भी उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा भारत में है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा भी है कि भगवान श्री राम बालि से कहते हैं-

अनुज बधू, भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्‍या सम ए चारी।।

इन्‍हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।

(छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पापनहीं है।)

किसी लेखक ने नारी की महानता की व्याख्या करते हुए लिखा है कि भारत की यह परम्परा रही है कि छोटी आयु में पिता को, विवाह के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व है। यही कारण था कि हमारी संस्कृति में प्राचीन काल से ही महान नारियों की एक उज्ज्वल परम्परा रही है। सीता, सावित्री, अरून्धती, अनुसुइया, द्रोपदी जैसी तेजस्विनी; मैत्रेयी, गार्गी अपाला, लोपामुद्रा जैसी प्रकाण्ड विदुषी, और कुन्ती,विदुला जैसी क्षात्र धर्म की ओर प्रेरित करने वाली तथा एक से बढ़कर एक वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। वर्तमान काल खण्ड में भी महारानी अहल्याबाई, माता जीजाबाई, चेन्नमा, राजमाता रूद्रमाम्बा, दुर्गावती और महारानी लक्ष्मीबाई जैसी महान नारियों ने अपने पराक्रम की अविस्मरणीय छाप छोड़ी । इतना ही नहीं, पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति और पन्ना के त्याग से भारत की संस्कृति में नारी को “ध्रुवतारे” जैसा स्थान प्राप्त हो गया। “इस धर्म की रक्षा के लिए अगर मेरे पास और भी पुत्र होते तो मैं उन्हें भी धर्म-रक्षा, देश-रक्षा के लिए प्रदान कर देती।” ये शब्द उस ‘माँ’ के थे जिसके तीनों पुत्र दामोदर, बालकृष्ण व वासुदेव चाफेकर स्वतंत्रता के लिये फाँसी चढ़ गये। भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ कभी भी नारी के इस महान आदर्श को नहीं भूल सकती। भारतीय संस्कृति में नारी की पूजा हमेशा होती रहेगी। प्राचीन भारत की नारी समाज में अपना स्थान माँगने नहीं गयी, मंच पर खड़े होकर अपने अभावों की माँग पेश करने की आवश्यकता उसे कभी प्रतीत ही नहीं हुई। और न ही विविध संस्थायें स्थापित कर उसमें नारी के अधिकारों पर वाद-विवाद करने की उसे जरूरत हुई। उसने अपने महत्वपूर्ण क्षेत्र को पहचाना था, जहाँ खड़ी होकर वह सम्पूर्ण संसार को अपनी तेजस्विता, नि.स्वार्थ सेवा और त्याग के अमृत प्रवाह से आप्लावित कर सकी थी। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व संसार को अपना-अपना भाग मिलता है- नारी से, फिर वह सर्वस्वदान देने वाली महिमामयी नारी सदा अपने सामने हाथ पसारे खड़े पुरुषों से क्या माँगे और क्यों माँगे? वह हमारी देवी अन्नपूर्णा है- देना ही जानती है लेने की आकांक्षा उसे नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि भारतीय नारी ने कभी भी अपने ‘नारीधर्म’ का परित्याग नहीं किया नहीं तो आर्य-वर्त कहलाने वाला ‘हिन्दुस्थान’ अखिल विश्व की दृष्टि में कभी का ख़त्म हो गया होता। और तो और इतिहासकारों का भी यही मत है कि प्रायः पुरुष शिकार पर जाते थे और नारी घर पर रहती थी ! कुछ दानो को जमीन पर बिखराकर नारी ने ही नव-पाषण काल में खेती की खोज कर अस्थायी बस्तियों को स्थाई बनाकर एक क्रांति को जन्म दिया जिसके बाद में ही शहरीकरण की स्थपाना हुई ! अतः यह कहना सही होगा कि प्राचीन काल में भी स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना जाता था ऐसा इतिहासकार भी मानते है ! स्टीफन. आर. कोवे ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक ‘सेवन हैबिट्स आफ हाइली इफेक्टिव पीपल’ के प्रारंभ में लिखा है-”Interdependence is better than Independence.” वास्तव में अंतर्निर्भरता ही जीवन का मूल है। स्त्री पुरुष के संदर्भ में अंतर्निर्भरता और सहजीवन एक संपूर्ण सत्य है। यह जीवन की स्वाभाविकता का मूल आधार है व उनकी एकात्मता नैसर्गिक है। गांधी जी का भी यही चिंतन था कि – ”जिस प्रकार स्त्री और पुरुष बुनियादी तौर पर एक हैं, उसी प्रकार उनकी समस्या भी मूल में एक होनी चाहिए। दोनों के भीतर वही आत्मा है। दोनों एक ही प्रकार का जीवन बिताते हैं। दोनो की भावनाएं एक सी हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों एक-दूसरे की सक्रिय सहायता के बिना जी नहीं सकते। और इस स्त्री, पुरुष नाम के दोनों पहलुओं को एक इकाई की तरह जान लेना, समझ लेना और जीने की कोशिश करना ही विवाह नामक व्यवस्था का उद्देश्य हो सकता है।

परन्तु वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रभाव से भारत में भी नारी के अधिकार का आन्दोलन चल पड़ा है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का और इक्कीसवी सदी का यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण का काल है। आजकल मनुष्य जाति के इतिहास में ‘वस्त्र सभ्यता’ ने बड़ी धूम मचा रखा है ! भारत की राजधानी दिल्ली में अभी हाल में ही एक “बेशर्म मोर्चा” निकाला गया जो कि टोरंटो से शुरू होकर यहाँ पहुंचा था ! शायद किसी दबाव में बदलकर बाद में ये इस मोर्चे का केंद्र-बिदु “महिला-सशक्तिकरण ” हो गया बहरहाल पहले तो इस मार्च का उद्देश्य था कि ” लड़कियों को हर प्रकार के कपडे पहनने की आजादी होनी चाहिए चाहे वो छोटे हो हो अथवा बड़े, पुरुष की नियत में खोट होता है उनके कपड़ों में नहीं !” मुझे समझ नहीं आया कि ये आन्दोलन पुरूषों की सोच व उनकी गलत मानसिकता के खिलाफ था अथवा उनके परिवार के सदस्य जैसे माता-पिता , भाई-बहन आदि के खिलाफ था जो उनके बाहर निकलने से पहले उनके परिधान को लेकर टोक देते है ! शायद घर में डर-वश कुछ बोल ना पाती हो इसलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर आ गयी जहा उन्हें मीडिया का अटेंशन तो मिलेगा ही और रविवार छुट्टी का दिन होने के करण कनाट प्लेस घूमने आये लोगों की भीड़ भी मिलेगी !

बाजारवाद का यह मूल मन्त्र है कि “जो दिखता है वो बिकता है !” शायद इसलिए नारी को को लगभग हर विज्ञापन से जोड़ दिया जाता चाहे वो विज्ञापन सीमेंट का हो, चाकलेट का हो, अन्तः वस्त्र का हो, अथवा किसी मोबाईल के काल रेट का जो दो पैसे में दो लड़कियां पटाने की बात करता है ! और तो और विज्ञापन – क्षेत्र में करियर चमकाने की स्त्री की लालसा को आज का बाजार लगभग उसी पुरा पाषण-काल के दौर में ले जाने को आतुर है जहा लोगों को कपडे का अर्थ तक नहीं पता था पहनने की बात तो दूर की है ! यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आजकल की स्त्री वही कपडे पहनती जो बाजार चाहता था ! एक दिन मेरे कालेज में एक लड़की एक टी शर्ट पहनकर आई जिस पर यह वाक्य लिखा था- Virginity is not a dignity , It is lack of opportunity. अर्थात ‘कौमार्य या यौन शुचिता सम्मान की बात नहीं है, यह अवसर की कमी है।’ मैंने सोचा कि आजकल की यह अवधारणा, आंदोलन या क्रांतिकारिता का रूप भी ले सकती है ! सेक्स और बाजार के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों अर्थात “एडवरटाइजमेंट” पर ही निर्भर है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। यह कहना गलत ना होगा कि स्त्री आज बाजारू संस्कृति का खिलौना मात्र बनकर गयी है जो कि शरीर ढंकने, कम ढंकने, उघाड़ने या ओढ़ने पर जोर देता है। आजकल कलंक की भी मार्केटिंग होती है क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से नारी को रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। बट्रर्ड रसल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ”विक्टोरियन युग में स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिखता था तो बिजली दौड़ जाती थी, अब स्त्रियां अर्धनग्न घूम रही हैं, कोई बिजली नहीं दौड़ती।” प्रसिद्द नारीवादी विचारक एवं लेखिका सिमोन द बोवुआर का एक प्रसिध्द वाक्य है- ‘स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है।’ मातृत्व की अवधारणा और अन्यायपूर्ण श्रम विभाजन पर सिमोन ने क्रांतिकारी नजरिया प्रस्तुत किया है। उनका मानना था कि स्त्रियोचित प्रकृति स्त्रियों का कोई आंतरिक गुण नहीं है। यह पितृसत्ता द्वारा उन पर विशेष प्रकार की शिक्षा-दीक्षा, मानसिक अनुकूलन और सामाजीकरण के द्वारा आरोपित किया जाता है। सिमोन द बोवुआर कहती हैं, स्त्रियों का उत्पीड़न हुआ है और स्त्रियां खुद प्रेम और भावना के नाम पर उत्पीड़न की इजाजत देती हैं।” सिमोन के इस नजरिए को क्रांतिकारी नारीवादी सोच (Radical Feminist approach) कहा गया। मगर अपनी प्रसिध्द पुस्तक- ‘द सेकेंड सेक्स’ की अंतिम पंक्ति में सिमोन द बोवुआर यह सदिच्छा व्यक्त करती हैं, ”नि:संदेह एक दिन स्त्री और पुरुष आपसी समता और सह-अस्तित्व की जरूरत को स्वीकार करेंगे।” सिमोन द बोवुआर और जान स्टुअर्ट मिल के विचारों को जानते हुए हमें पश्चिम की औरतों की स्थिति का भी आभास मिलता है जहा भारत के विपरीत कभी भी सम्मान की दृष्टि से स्त्री को नहीं देखा गया ! कहा जाता है कि वहां स्त्रियों की स्थिति लगभग दोयम दर्जे की रही है। परन्तु समस्या तब और जटिल हो जाती है जब नारी की आजादी का मतलब ‘देह’ को केन्द्र में रखने, उसकी नुमाइश और लेन-देन से समृध्दि, सम्पन्नता, अधिकार एवं वर्चस्व प्राप्त करने तक पहुंच जाता है। आज स्त्री अस्मिता के संघर्ष में ‘दैहिक स्वतंत्रता और पुरुष का विरोध’ ही दो प्रमुख पहलू नजर आते हैं। परिणाम यह हुआ है कि स्त्री देह अब केवल ‘कामोत्तेजना’ नहीं बल्कि ‘काम विकृति’ के लिए भी इस्तेमाल होने लगी है। वह लगभग ‘वस्तु’ के रूप में क्रय-विक्रय के लिए बाजार में मौजूद हो गई है। यह समूची स्त्री जाति का न केवल अपमान है बल्कि यह दुर्भाग्य भी है कि अब स्त्री की देह ही सब कुछ है। उसकी आत्मा का कोई मूल्य नहीं है। आत्महीन स्त्री की मुक्ति और स्वतंत्रता के मायने क्या हो सकते हैं? कोई किसी तस्वीर या मूर्ति को बेड़ी में बांधकर रखे या हवा में खुला छोड़ दें तो क्या फर्क पड़ने वाला है? पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन , शैतान की कृति,पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह कोई पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं ,यह भी विवाद का विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है। हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। मुझे कभी कभी डर भी लगता है कहीं किसी गाने की ये पंक्तियाँ ” औरत ने जन्म दिया पुरुषो को , पुरुषों ने उसे बाज़ार दिया ” सच ना साबित हो जाय ! औरत की देह इस समय दूरदर्शन के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। अब यह देह की बाधाएं हटा रहा है, जो सदैव से गोपन रहा उसको अब ओपन कर रहा है।

केवल अपने लिए भोग करने वाला मानव तो पशु के समान शीघ्र ही जीवन समाप्ति की ओर पहुंच जाता है। भोग और कामोपभोग से तृप्ति उसे कभी नहीं मिलती है ! गांधीजी का चिंतन था कि – ”अगर स्त्री और पुरुष के संबंधों पर स्वस्थ और शुध्द दृष्टि से विचार किया जाय और भावी पीढ़ियों के नैतिक कल्याण के लिए अपने को ट्रस्टी माना जाय तो आज की मुसीबतों के बड़े भाग से बचा जा सकता हैं।” फिर यौनिक स्वतंत्रता का मूल्य क्या है, यह केवल स्वच्छंदता और नासमझी भरी छलांग हो सकती है, अस्तित्व का खतरे में पड़ना जिसका परिणाम होता है। इसी तरह यौन शुचिता या कौमार्य का प्रश्न भी है। यह केवल स्त्रियों के लिए नहीं होना चाहिए। यह जरूरी है कि पारस्पारिक समर्पण एवं निष्ठा से चलने वाले वैवाहिक या प्रतिबध्द जीवन के लिए दोनो ओर से संयम का पालन हो। और इसकी समझ स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से अनिवार्य एवं आवश्यक हो। पुरुष को भी संयम एवं संतुलन के लिए प्रेरित करने में स्त्री की भूमिका सदा से रही है। इसलिए स्त्री संयम की अधिष्ठात्री है। उसे स्वाभाविक संयम एवं काम प्रतिरोध की क्षमता प्राकृतिक रूप से भी उपलब्ध है। सिमोन द बोवुआर ने भी स्त्री की संरचना में उसकी शिथिल उत्तेजकता को स्वीकार किया है। यह भी पारस्परिकता का एक महत्वपूर्ण बिंदु है। यौन शुचिता जीवन के रक्षण का ही पर्याय है और यौन अशुचिता नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से भी हमें विनष्ट करती है। संयम सदैव ही सभी समाजों में शक्ति का पर्याय माना जाता रहा है। कहावत भी है- ‘सब्र का फल मीठा होता है।’ इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य की दशा एक कस्तूरी मृग जैसी हो गयी है, जो भागता है सुगंध के लिए परन्तु अतृप्त हो कर थक जाता है । सुगंध स्वयं उसके भीतर है। उसका आत्म उसके आनंद का केन्द्र है। देह तो एक चारदीवारी है, एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है । भवन को अस्तित्व मान लेना भ्रांति है। और भवन पर पेंट कर, रंग-रोगन कर उसे चमका लेना भी क्षणिक आनंद भर मात्र है। उससे दुनिया जहान को भरमा लेना भी कुछ देर का खेल तमाशा है। भवन को गिरना है आज नहीं तो कल , यही सत्य है ।

वर्तमान दौर में नारी को उसे आधुनिक समाज ने स्थान अवश्य दिया है पर वह दिया है लालसाओं की प्रतिमूर्ति के रूप में, पूजनीय माता के रूप में नहीं। अवश्य ही सांस्कृतिक-परिवर्तन के साथ हमारे आचार-विचार में और हमारे अभाव-आवश्यकताओं में परिवर्तन होना अनिवार्य है। परन्तु जीवन के मौलिक सिद्धान्तों से समझौता कदापि ठीक नहीं। एक लेखक ने तो यहाँ तक लिखा है कि जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूंजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है। परन्तु पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों का बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता, वात्सल्य, उदारता, धैर्य,लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ‘ कामायनी ‘ का रचनाकार ” नारी तुम केवल श्रृद्धा हो” से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-” स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ ” उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋग्वेद ) !

एक लेखक ने भारत में वर्तमान समय में स्त्री की स्थिति का चित्रण करते हुए लिखा है कि अब स्त्रियां गांव, चौपाल, गलियों, सड़कों, बाजारों से लेकर स्कूल-कालेज, छोटे-बड़े दफ्तरों और प्रतिष्ठानों, सभी जगह पर निर्द्वन्द्व रूप से अपनी सार्थक एवं सशक्त उपस्थिति से सबको चमत्कृत कर रही हैं। कांग्रेस में श्रीमति सोनिया गांधी सर्वोच्च पद पर पहुंची जिनके हाथ में अघोषित तौर पर देश की बागडोर रहने के आरोप लगते रहे हैं। बाद में देश को 2007 में पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति के तौर पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल मिलीं। इसके उपरांत लोकसभा में पहली महिला अध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार भी मिल गईं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी श्रीमति सुषमा स्वराज हैं। स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री साठ के दशक में सुचिता कृपलानी थीं। इसके बाद उड़ीसा में नंदिनी सत्पथी मुख्यमंत्री बनीं। मध्य प्रदेश में उमा भारती भी मुख्यमंत्री रहीं। सत्तर के दशक में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी की शशिकला काकोडकर ने केंद्र शासित प्रदेश गोवा में मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। अस्सी के दशक मंे अनवरा तैमूर मुख्यमंत्री बनीं तो इसी दौर में तमिलनाडू में एम.जी. रामचंद्रन की पत्नि जानकी रामचंद्रन ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। सुषमा स्वराज दिल्ली, राबड़ी देवी बिहार, वसुंधरा राजे राजस्थान तो राजिन्दर कौर भट्टल पंजाब में सफल मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।

वर्तमान में दिल्ली की गद्दी श्रीमति शीला दीक्षित, उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती हैं। अब आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तो तमिलनाडू मंे जयललिता मुख्यमंत्री बन महिला शक्ति को साबित करने वाली हैं। 2004 के बाद यह दूसरा मौका होगा जब देश के चार सूबों में महिला मुख्यमंत्री आसीन होंगी। इसक पूर्व 2004 में एमपी में उमा भारती, राजस्थान में वसुंधरा राजे, दिल्ली में शीला दीक्षित तो तमिलनाडू में जयललिता मुख्यमंत्री थीं। 1236 में रजिया सुल्तान की ताजपोशी से आरंभ हुआ लेडी पावर का सिलसिला 775 सालों बाद 2011 में भी बरकरार है। आने वाले साल दर साल यह और जमकर उछाल मारेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एसी मातृ शक्ति को समूचा भारत वर्ष नमन करता है !

महिलाओ के बगैर यह श्रृष्टि अधूरी है ! नारी न सिर्फ जननी है बल्कि भाग्य विधाता भी है ! पूरे परिवार की नीवं एक नारी ही है ! किसी ने सच ही कहा है कि –

माँ बनके ममता का सागर लुटाती हो,

बहन हो हक और स्नेह जताती हो,

पत्नी बन जीवनभर साथ निभाती हो,

बन बेटी, खुशी से दिल भर जाती हो,

तुम में अनंत रूप, असंख्य रंग हैं …

हर मोड़ पे साथ निभाती हो !

तुमसे है घर-द्वार, तुमसे संसार है,

सृष्टि भी बिना तुम्हारे लाचार है,

गुस्सा है तुम से और तुम से ही प्यार है,

हो साथ तुम तो क्या जीत क्या हार है,

बिना तुम्हारे न रहेगी ये दुनिया …

तुम्हारे ही कंधो पर सृष्टि का भार है !

इतिहास में मैंने पढ़ा था कि एक दौर में मातृ सत्ता हुआ करती थी. तब महिलाओं की तूती बोलती थी. फिर वक्त बदला और पुरूषों ने सत्ता पर कब्जा जमा डाला और महिलाओं के शोषण की ऐसी काली किताब लिखी कि लाख धोने पर भी शायद ही धुले ! मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी ! आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरूषों के साथ भी वही सबकुछ नहीं होने लगा है. उदहारण के लिए आर्टिकल 498 – A को भला आज कौन नहीं जानता ? भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जा सकता है ! लेनिन ने कहा था कि सत्ता इंसान को पतित करती है या यूं कहें पावर जिसके पास होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता. लेकिन क्या ऐसे कभी समानता आ सकती है? या फिर ये चक्र ऐसे ही घूमता रहेगा. कभी हम मरेंगें, कभी तुम मरोगे !

समय करवट ले रहा है ! विचारक ‘जोड’ ने एक पुस्तक में लिखा है- ”जब मैं जन्मा था तब पश्चिम में होम्स थे, अब हाउसेस रह गए हैं क्योंकि पश्चिमी घरों से स्त्री खो गई है।” कही यह दुर्गति भारत की भी ना हो जाय क्योंकि भारत में यदि भारतीय संस्कृति यहाँ का धर्म और विचार अगर बचा है तो नारी की बदौलत ही बचा है ! अतः नारी को इस पर विचार करना चाहिए ! कही देर ना हो जाय अतः इस स्थिति से उबरने का एकमात्र उपाय यही है कि नारी अब अन्धानुकरण का त्याग कर ,भोगवादी व बाजारवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे। अपनी लाखों , करोड़ों पिछड़ी अनपढ़ बेसहारा बहनों के दुखादर्दों को बांटकर उन्हें शैक्षिक , सामाजिक, व आर्थिक स्वाबलंबन का मार्ग दिखाकर सभी को अपने साथ प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना सिखाये । तभी सही अर्थों में नारी इक्कीसवीं सदी की समाज की नियंता हो सकेगी । अब स्त्री को खुद को सोचना है कि वह कैसे स्थापति होना चाहती है पूज्या बनकर या भोग्या बनकर !

12 Responses to “वर्तमान स्त्री : पूज्या या भोग्या”

  1. सूरज पाल सिंह

    बहुत अच्छा लेख लिखा है।

    धन्यवाद…..

    Reply
  2. Pawan

    लेखक जी ने बहुत अच्छा लेख लिखा हैं पर कुछ लोगो की आदत हैं की हर अच्छी बात का विरोध कर के अपने को अधिक
    बुद्धिमान जतलाना जैसा की एक रीडर बी के सिन्हा जी
    हालाकि सबको अपनी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता हैं पर इसका ये मतलब को नहीं की किसी की किसी अच्छी बात की बड़ाई न करके और उसके विरोध मै दो चार लाइन लिख कर कोई भी मुर्ख विद्वान हो सकता हैं
    बी के सिन्हा जी ने फ्रायड का अच्छा उधाहरण दिया पर क्या उन्हें पूरी जानकारी हैं उसके बारे मै तो उनके लिए ये ही कहूँगा
    ” अधजल गगरी छलकत जाए ”
    और रही बात इस बहुदा टी शर्ट स्लोगन की जिसकी वकालत ये कर रहे हैं तो वैसे हे टी शर्ट उन्हें अपने घर की महिलाओं के
    लिए भी खरीदनी चाहिए .

    Reply
  3. Avinash lall

    औरत को हम फकत जिस्म समझ लेते है,
    रूह भी होती है उसमे ये कंहा समझते है….अवि

    Reply
  4. B K Sinha

    राजीव आपका लेख पढ़ा आप कहना क्या चाह रहे है यह स्पष्ट नहीं हुआ लेख तो खींच तान कर लम्बा किया गया है गैर जरूरती बातों को भर कर शुरुआत में अपनी संस्कृति में नारी का क्या स्थान था उसकी प्रशंशा में गीत गाये फिर आधुनिक काळ के बाजारवाद के दौर में नारी का उपयोग कमोडिटी की तरह करना इस बारे बताया और इसकेलिए सारा दोष स्त्रिओं के माथे मढ़ दिया जहाँ तक slut मार्च का सवाल है इसके समर्थक और विरोधी दोनों के जेहन में देह केंद्र में है बर्ट्रेंड रसेल और सिमोन द बौआर के उद्हर्नो को आपने दिया है माफ़ कीजियेगा गलत माने आपने लगाया है विक्टोरिया युग में लड़कियों के पैर तो क्या कुर्सी टेबलों के पैर भी नग्न नहीं रहते थे अब बताइए नग्नता दिमाग में है या कुर्सी टेबलों के पैरों में यदि दिमाग में है तो करेंट तो दौड़ेगा ही स्त्री हो या पुरुष दोनों ही देहवाद में सने हुए है एक देखना चाहता है दूसरा दिखाना चाहता है दोनों ने देह को ही महत्व दिया देह से भी आगे भी कुछ है यह जानने की जरूरत नहीं समझी जिस काळ खंड की स्त्रियों की प्रशंशा में आपने गीत गाये है वह काळ खंड स्त्रियों के गुलामी का प्रतीक है जहाँ स्त्रिओं को माता बहन इत्यादि नाम दे कर उनका शोषण किया जाता था स्त्री की व्यथा को समझे -जन्म लिया तो पिता के अधीन शादी हुई तो पति के अधीन और वृद्ध हुए तो पुत्र के आधीन नारी जीवन तो यही है न मैथली शरण गुप्ता की दो लाइने मै देना चाहूँगा —अबला नारी हाय तुम्हारी यही कहानी अंचल मै है दूध और आँखों मे पानी.
    लेखक महोदय को कॉलेज की उस लड़की की टी शर्ट पर लिखा वाक्य अच्छा नहीं लगा परन्तु उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाये तो पता चलेगा की वह यही चाहते थे वर्ना उस पर इतना ध्यान केन्द्रित क्यों हुआ उन्नीस सौ चौहत्तर के आस पास एक फिल्म आई थी “फिर भी’
    उसमे एक लड़की कहानी है जिसे सेक्स सम्बन्धी बातों से घबडाहट होती थी उसकी माँ बायोलोजी की प्रोफ़ेसर थी और वह लड़की उनकी स्टुडेंट थी क्लास मे सेक्सुअल आर्गन के बारे मे जब पढाई होती तो उसे मुश्किल होती दरअसल वह बचपन से ही अपने पिता से प्यार करती थी उनके अतिरिक्त किसी पुरुष की कल्पना उसके लिए असह्य थी फिर एक दिन उसके पिता की म्रत्यु एक दुर्घटना मे झील मे डूब कर मर जानेसे हो गयी जब की वे लोग पिकनिक मानाने के लिए गाये हुए थे .धीरे धीरे दिन बीतते गये फिर उसकी माँ के जीवन मे एक पुरुष सहयोगी प्रोफ़ेसर आ जाता है जो सदैव लड़की की माँ से उसके पीछे मे मिलाने आने लगता है यह बात उसे यानि लड़की को सिगरेट के टोटे जो ड्राइंग रूम मे पड़े होते थे उससे पता चला उसने अपनी माँ से तो कुछ नहीं कहा इस बीच वह टेलेफोन आपरेटर की नौकरी करने लगी वहीँ एक युवा टेलेफोन इंजिनियर भी था .रोज लिफ्ट से ऊपर जाते वक्त उससे मुलाकात होती और वह इंजिनियर उससे इन्तिमेसी बढाने की कोशिश करता लेकिन वह उससे रूखापन ही दिखाती थी उसके सामने पिता का चेहरा याद आ जाता उअर वह उसका रिप्लेश्मेंट नहीं बन पाता लेकिन जब वह सोने जाती तो अपनी माँ के सहयोगी प्रोफ़ेसर की बात याद आ जाती स्वप्न मे वह उसी इंजिनियर से सम्भोग रत होती कभी पिता के साथ बचपन का द्रश्य आता कभी इस इंजिनियर के साथ सम्भोग का द्रश्य यह फिल्म दमित वासना को आधार बना कर फिल्मी गयी थी फ्रायड ,एक प्रसिद्द मनोविश्लेषक , ने कहा की लड़का अपनी माँ की तरफ ज्यादा आकर्षित होता है और लड़की पिता की तरफ यह बेसिक इंस्टिंक्ट है हमारे मन का विशाल हिस्सा अवचेतन मन कहलाता है उअर वही बेसिक इंस्टिंक्ट का मालिक है बहुत छोटा हिस्सा चेतन मस्द्तिस्क का है यह चेतन मस्तिस्क समाज द्वारा दिया हुआ है जहाँ डू और डोंट्स होते है यह चेतन मस्तिस्क अवचेतन को रोकता है जब हम जगे हुए रहते है नींद मे चेतन मस्तिस्क एक्टिव नहीं रहता है तब अवचेतन मस्तिस्क से वे सारी बाते स्वप्न के माध्यम से सामने आ जाती है जिसे जागी हुई स्थिति मे सोचा भी नहीं जा सकता इसलिए ये दमित इछाये कहलाती है सारा लेख लेखक महोदय की दमित इच्छा का प्रतिफलन है सिमोन द बौअर ज्य़ा पल सार्त्र के साथ बराबर रही लेकिन पत्नी बन कर नहीं क्या आप अपने लिए आदर्श इस्थिति मानेगे शयद नहीं फिर उनका उल्लेख आपने क्यों किया? विखंडित व्यक्तित्व के शिकार न हो जाये आप सावधान करता हूँ मै
    बिपिन कुमार सिन्हा

    Reply
  5. swamisamvitchaitanya

    कोई भी व्यक्ति शारीर के अधर पर भोगी या पूज्य नहीं बनता ये उसके कर्म और सुन्दर संस्कारो से ही पता चलता है

    Reply
  6. Manthan

    राजीव जी का अदभुत लेख पढ़कर एक आशा सी बंध जाती है भविष्य की तरफ से |ईश्वर करे की आप नवयूवायों के सुंदर विचारों के अग्रडी होकर अपने ज्ञान की ज्योती इसी तरह बिखेरते रहे |जानकारी पूर्ण लेख के लिए धन्यबाद |.

    Reply
  7. kuldeep singh

    बहुत ही अषा और सुंदर तरह से आपने नारी के लिए लिहाका हे

    Reply
  8. Satyarthi

    राजीव गुप्ताजी का लेख बहुत अच्छा है. आशा है की प्रवक्ता पर हमें उनके लेखों से लाभान्वित होने का अवसर मिलता रहेगा . संपादक जी से मेरा निवेदन है की लेखक परिचय में संपर्क साधन जैसे लेखक का टेलेफोन, ईमेल एड्रेस इत्यादि अवश्य दिया करें. एक और प्रतिभावान युवा लेखक के प्रवक्ता में आने पर बधाई तथा शुभ kamnayen

    Reply
  9. vimarsh

    एक बहुत ही उन्नत और उत्तम लेख लिखा है युवा राजीव गुप्ता ने… बधाई…ll
    “नारी: पूज्या या भोग्या” विषय पर उनका लेख जहाँ विस्तृत रूप में प्रकाश डालता है वहीँ महिलाओं की स्थिति पर मुखर होकर विमर्श करने को भी प्रेरित करता है..ll

    Reply
  10. आर. सिंह

    आर.सिंह

    राजीव गुप्त की लेखनी की परिपक्वता उनकी उम्र से बहुत ज्यादा है और यहाँ भी वह दृष्टिगोचर हो रहा है.ऐसे तो यह लेख इतना विवेचना पूर्ण और सार गर्भित है की इस लेख के लिए लेखक की जितनी प्रशंसा की जाये वह कम है,पर इस लेख के शीर्षक के विषय में दो शब्द कहना चाहूंगा की नारी न केवल पूज्या है न भोग्या.इसका संतुलन ही नारी की पूर्ण परिभाषा है.माँ ,बहन ,बेटी इत्यादि के रूप में यदि वह पूज्या है,तो पत्नी के रूप में भोग में भी बराबर की भागीदार है.दूसरी बात जो सामने आती है,वह यह है की आज की नारी के दुर्दशा का जिम्मेदार अगर पुरुष है तो नारियां भी कुछ हद तक दोषी कही जासकती हैं,जिसकी परिणति सलट वाक् है.किसीने कनाडा में कुछ कह दिया तो आप इंडिया में उसके प्रतिकार स्वरूप नंगी या अधनंगी होने को तैयार हो गयी.आखिर इस प्रतिक्रिया में खडी औरतें क्या प्रमाणित करना चाहती हैं?कोई भी पहनावा शालीनता का प्रतीक होना चाहिए न की फूहड़पन का?यह बात नारी और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए. यह तो हुआ लेख से हट कर अपना विचार,पर लेख के सम्बन्ध में एक बात कहना मैं आवश्यक समझता हूँ. जब राजीव जी यह लिखते हैं की,
    “देह तो एक चारदीवारी है, एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है । भवन को अस्तित्व मान लेना भ्रांति है। और भवन पर पेंट कर, रंग-रोगन कर उसे चमका लेना भी क्षणिक आनंद भर मात्र है। उससे दुनिया जहान को भरमा लेना भी कुछ देर का खेल तमाशा है। भवन को गिरना है आज नहीं तो कल , यही सत्य है ।” तो मेरे विचार से वे शरीर के महत्त्व को कम करके दिखा रहे हैं. .यह तो सत्य है की शरीर को आज या कल गिरना है,पर इसको स्वस्थ रखना (शारीरिक और मानसिक रूपसे) हमारी एक ऎसी जिम्मेदारी है,जिसको हम भूलते जारहे है.
    अंत में मैं यह कहना चाहूंगा की मेरे विचार से युवा लेखक का यह लेख इनकी अपनी पीढी और आने वाली पीढी के लिए मील का एक पत्थरसाबित होगा और सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा.

    Reply
  11. BK Sinha

    अत्यन्त सारगर्भित, तथ्यात्मक और उत्कृष्ट लेख है. इस लेख को भारत की सभी महिलाओं समस्त पुरुषों को पढ़ना चाहिए. लेखक से अनुरोध है कि इसका अंग्रेजी अनुवाद करके या कराके अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में भी छपवाएं, क्योंकि सारी खुराफ़ात वही से शुरु होती है. इतनी सुन्दर और कल्याणकारक रचना के लिए प्रवक्ता और श्री राजीव गुप्ता जी को बहुत-बहुत बधाई!

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *