संघ एवं सेवा के सुमेरु थे दर्शनलाल जैन

  • ललित गर्ग –
    वीर प्रसूता भारत माता की कोख से ऐसे अनगिनत लाल जन्में, जिन्होंने देश हित में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। राष्ट्रसेवी, समाजसेवी एवं संघसेवी दर्शनलाल जैन उनमें से एक हैं, जिन्होंने अपने जीवन के 94 वर्षों में जब से उनकी प्रज्ञा जागृत हुई, एक-एक क्षण राष्ट्र, समाज एवं व्यक्ति उत्थान एवं उन्नयन के लिये जीया। सेवा का अनूठा इतिहास रचते-रचते 8 फरवरी 2021 को उनका निधन हो गया, उनका निधन न केवल हरियाणा प्रांत के लिये, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिये, शिक्षा जगत के लिये बल्कि समाजसेवा के क्षेत्र लिये एक बड़ा आघात है, अपूरणीय क्षति है। हम उनके निधन को समाजसेवा के क्षेत्र में चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के एक युग की समाप्ति कह सकते हंै।
    सामाजिक कार्यों के लिए पद्मभूषण सम्मान पाने वाले समाजयोद्धा दर्शनलाल जैन का जन्म 12 दिसंबर 1927 को जगाधरी में एक धार्मिक और उद्योगपति जैन परिवार में हुआ था। 1944 में संघ के संपर्क में आए तथा 1946 में प्रचारक के रूप में संघ कार्य करने का निश्चय किया, उम्र बढ़ने के साथ, उनमें देशभक्ति की भावना बढ़ती गयी और इसी कारण आरएसएस में उनकी सक्रियता एवं सहभागिता तीव्रतर होती गयी। 15 साल की उम्र में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। जैन कई सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए थे। उन्हें युवा और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जब यमुनानगर आए थे तब उन्होंने सार्वजनिक मंच पर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। समाज सेवा के कामों में आगे रहने वाले जैन का सक्रिय राजनीति में शामिल होने की ओर कभी झुकाव नहीं रहा। 1954 में जनसंघ द्वारा एमएलसी सुनिश्चित सीट के लिए मिले प्रस्ताव को उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। बाद में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा राज्यपाल के पद की पेशकश भी की गई, लेकिन उन्होंने गवर्नर का पद भी स्वीकार नहीं किया।
    ‘बाबूजी’ नाम से पुकारे जाने वाले दर्शनलाल जैन जुझारू एवं जीवट वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हरियाणा प्रांत के पूर्व प्रांत संघचालक रहे, वे संघ एवं समाजसेवा के सुमेरु थे, जिन्होंने कर्मयोगी की भांति जीवन जीया। यह सच है कि वे हरियाणा के थे यह भी सच है कि वे संघ के थे किन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि वे राष्ट्र के थे, राष्ट्रनायक थे। समाजसेवा के क्षेत्र के वे दुर्लभ व्यक्तित्व थे। उदात्त संस्कार, लोकजीवन से इतनी निकटता, इतनी सादगी-सरलता, इतना संस्कृतिप्रेम, इतना समाजसेवा का संस्कार और इतनी सचाई से समाज निर्माण के संकल्प ने उनके व्यक्तित्व को बहुत और बहुत ऊँचा बना दिया था। वे अन्तिम साँस तक देश की सेवा करते रहे। उनका निधन एक राष्ट्रवादी सोच के सेवाआयाम का अंत है। वे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की श्रृंखला के प्रतीक थे। उनके निधन को सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, संस्कृति की, सेवा की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा सकता है।
    दर्शनलाल जैन ने नौ दशक तक निस्वार्थ भाव से सक्रिय सेवा की, राजनीति एवं राजनीतिक पदों से दूर रहकर उन्होंने एक नया इतिहास रचा, पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे। घाल-मेल से दूर एवं बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। उनके जीवन से जुड़ी सेवाभावना, विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया। भले ही लोगों ने उन्हें यूं ही बाबूजी नाम से पुकारना शुरू कर दिया हो लेकिन हरियाणा के लिए सचमुच वे ‘बाबूजी’ यानी सबके प्रिय एवं चेहते थे।
    जिस प्रकार सतयुग में भगीरथजी ने कठिन तप और परिश्रम करने के बाद गंगाजी को नदी के रूप में धरती पर अवतरित किया था, ठीक उसी तर्ज पर आज कलियुग में दर्शनलाल जैन के भरसक प्रयासों से ही विलुप्त सरस्वती नदी का प्रवाह पुनः सम्भव हुआ। यह उनकी कठिन मेहनत, दूरदर्शी सोच एवं परिश्रम का ही परिणाम है कि उनकी निशानदेही पर सरकार ने समय के साथ-साथ लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी की धारा को यमुनानगर के मुगलवाली गांव एवं आदिबद्री से खोज निकाला। सरस्वती की पवित्र धारा को धरा पर लाने का श्रेय इनको प्राप्त है। सरस्वती को पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने दो दशक तक लम्बा संघर्ष किया। उनके प्रयासों से ही 21 अप्रैल 2014 को रूलाखेड़ी गांव में सरस्वती नदी की पहली धारा बही। वे सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष भी हैं। इसके लिए हर संभव प्रयास किए। तब धरा पर पवित्र नदी की जलधारा फूटी। सरकार भी इस प्रोजेक्ट पर गंभीरता से काम कर रही है।
    दर्शनलालजी ने हरियाणा के पानीपत में शहीद स्मारक बनाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था। इनके प्रयास से ये कार्य सफल हो पाया। ये उनकी जीत थी। उन्होंने शिक्षा और इतिहास क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किए। वे हरियाणा में सरस्वती विद्या मंदिर, जगाधरी (1954), डीएवी कॉलेज फॉर गल्र्स, यमुनानगर, भारत विकास परिषद हरियाणा, विवेकानंद रॉक मेमोरियल सोसाइटी, वनवासी कल्याण आश्रम हरियाणा, हिंदू शिक्षा समिति हरियाणा, सहित विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के संस्थापक थे। गीता निकेतन आवासीय विद्यालय, कुरुक्षेत्र, और नंद लाल गीता विद्या मंदिर, अंबाला (1997) भी उनके द्वारा स्थापित है। जरूरतमंदों की सहायता करते हुए, नये राजनीतिक चेहरों को गढ़ते हुए, मुस्कराते हुए और हंसते हुए छोटों से स्नेहपूर्ण व्यवहार और हम उम्र लोगों से बेलौस हंसी-मजाक करने वाले दर्शनलालजी की जिंदगी प्रेरक, अनूठी एवं विलक्षण इस मायने में मानी जाएगी कि उन्होंने जिंदगी के सारे सरोकारों को छुआ। वे समाजसेवी थे तो उन्होंने पर्यावरण व संस्कृति उत्थान की भी अलख जगायी।
    जैन ने शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान दिया। कई स्कूल खुलाए। इतिहास के प्रति युवाओं में रुचि बढ़े इसके लिए पाठ्य पुस्तकें तैयार कराई। स्कूल खोलने का उद्देश्य था कि बच्चे शिक्षित हो सकें। इस सोच के साथ स्कूल खोलने में भूमिका निभाई। संघ में अनुशासन की शिक्षा दी जाती है। संघ के संपर्क में आने वाले व्यक्ति के अंदर खुद-ब-खुद देशभक्ति की भावना घर कर जाती है, संघ कोई राजनीतिक संगठन नहीं है, बल्कि सेवा एवं परोपकार में जुटा मिशन है, आन्दोलन है। दर्शन लाल कहते हैं कि 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लगी थी। उनको भी जेल यात्रा करनी पड़ी। हालांकि उसमें उनका कोई दोष नहीं था। 2007 में, दर्शनलाल ने राष्ट्र के विस्मृत नायकों को याद करने के लिए योद्धा सम्मान समिति का गठन किया। समिति ने पानीपत के दूसरे युद्ध नायक, हेमाचंद्र विक्रमादित्य के राज्याभिषेक समारोह सहित कई समारोह आयोजित किए।

दर्शनलाल जैन ने अपनी सादगी एवं सरलता से समाज एवं राष्ट्र को एक नया दिशाबोध दिया। वे हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत को जीवंतता देने एवं हरियाणा की संस्कृति, पर्यावरण एवं अस्तित्व-अस्मिता के लिए अपनी आवाज उठाने और उसके हक में लड़ने वाले विशिष्ट समाजसेवियों में से एक थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हरियाणा संगठन के लिए एक धरोहर थे। उन्होंने संघ को हरियाणा में मजबूत करने के लिए कठोर परिश्रम किया। वे अपने क्षेत्र की जनता के लिए हमेशा सुलभ रहते थे। वे युवावस्था में ही सार्वजनिक जीवन में आये और काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की। वे नंगे पांव चलने वाले एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाले समाजसेवियों में थे, उनके दिलो-दिमाग में हरियाणा एवं वहां की जनता हर समय बसी रहती थी। काश! सत्ता के मद, करप्शन के कद, व अहंकार के जद्द में जकड़े-अकड़े रहने वाले राजनेता उनसे एवं उनके निधन से बोधपाठ लें। निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया।
दर्शनलाल जैन संघ के एक रत्न थे। उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने या पद के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। पद्मभूषण के लिए नाम चयनित होने के बाद उन्होंने कहा कि मुझे केवल राष्ट्र भक्ति नजर आती है और देश में जो सेवा का रचनात्मक सृजनात्मक संसार रच रह रहे हैं वे मेरा परिवार है। मैंने किसी अवार्ड के लिए काम नहीं किया। इसका श्रेय साथ काम करने वाले दोस्तों और समाज सेवा में सहयोग करने वालों को जाता है। जिसकी बदौतल मैं अपने मिशन में कामयाब होता चला गया।
दर्शनलाल जैन के जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें। बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वे उनके बीच में ना हों। इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिलों पर छाये रहे। उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आदर्श व्यक्तित्व हैं जिन्हें संस्कृति, समाजसेवा और सुधारवाद का अक्षय कोश कहा जा सकता है। उनका आम व्यक्ति से सीधा संपर्क रहा। यही कारण है कि आपके जीवन की दिशाएं विविध एवं बहुआयामी रही हैं। आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया। यही कारण है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आपके जीवन से अछूता रहा हो, संभव नहीं लगता। आपके जीवन की खिड़कियाँ राष्ट्र एवं समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। इन्हीं खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा के झोंकों का अहसास भारत की जनता सुदीर्घ काल तक करती रहेगी।

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